आरा कोर्ट ब्लास्ट: हाईकोर्ट में पहली बार डेथ रेफरेंस की ऐसी समीक्षा, संवैधानिक कसौटी पर परखी जाएगी फांसी की सजा

पटना हाईकोर्ट की खंडपीठ ने मृत्युदंड की सजा पाए दोषियों के मामले में एक महत्वपूर्ण 'डेथ रेफरेंस' की सुनवाई शुरू कर दी है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यह प्रक्रिया केवल सजा की पुष्टि तक सीमित नहीं है, बल्कि यह न्यायिक विवेक और संवैधानिक संतुलन की अंति

आरा कोर्ट ब्लास्ट: हाईकोर्ट में पहली बार डेथ रेफरेंस की ऐसी

Patna/arrah - आरा कोर्ट ब्लास्ट के दोषियों को मिली मृत्युदंड की सजा की वैधानिक समीक्षा अब पटना हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच कर रही है। इस दौरान पीठ ने एक ऐतिहासिक टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया कि यह सुनवाई केवल दंड की पुष्टि (Confirmation) तक सीमित नहीं होगी। हाईकोर्ट के इतिहास में यह संभवतः पहली बार है जब पीठ ने इतने कड़े शब्दों में स्पष्ट किया है कि वह न्यायिक विवेक और संवैधानिक संतुलन की अंतिम कसौटी पर पूरे मामले को फिर से परखेगी। यानी, फांसी की सजा को कायम रखने से पहले अदालत यह देखेगी कि क्या यह 'दुर्लभ से दुर्लभतम' मामले के सिद्धांतों पर पूरी तरह खरी उतरती है। 

वर्चुअल पेशी और 'कोर्ट मित्र' की नियुक्ति

सुनवाई के दौरान अदालत के निर्देश पर जमुई जेल अधीक्षक वर्चुअल माध्यम से उपस्थित हुए। उनके साथ मृत्युदंड से दंडित मुख्य दोषी लंबू शर्मा को भी ऑनलाइन पेश किया गया। अदालत ने एक पारदर्शी प्रक्रिया अपनाते हुए लंबू शर्मा को अवगत कराया कि उसकी ओर से अधिवक्ता प्रतीक मिश्रा को 'कोर्ट मित्र' (Amicus Curiae) नियुक्त किया गया है। लंबू शर्मा ने कोर्ट की इस व्यवस्था पर अपनी सहमति जताई और कोई आपत्ति नहीं की। 

सभी दोषियों की अनिवार्य उपस्थिति का सख्त निर्देश

पीठ ने पाया कि इस मामले के अन्य दोषी अलग-अलग जेलों में बंद हैं। इस पर राज्य सरकार को कड़ा निर्देश दिया गया कि अगली सुनवाई में सभी दोषियों की वर्चुअल उपस्थिति हर हाल में सुनिश्चित की जाए। अदालत का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सजा के निर्धारण जैसे संवेदनशील मामले में किसी भी दोषी की उपस्थिति और पक्ष रखने के अधिकार का उल्लंघन न हो। 

जेलों में तैनात होंगे अधिवक्ता: दोषियों को समझाई जाएगी कानूनी स्थिति

न्याय की पारदर्शिता को अगले स्तर पर ले जाते हुए हाईकोर्ट ने एक अभूतपूर्व आदेश दिया। पीठ ने निर्देश दिया कि अगली सुनवाई के समय प्रत्येक दोषी के साथ जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के पैनल से एक अधिवक्ता भौतिक रूप से जेल में मौजूद रहेंगे। ये वकील दोषियों को अदालती कार्यवाही और उनकी वर्तमान कानूनी स्थिति के बारे में विस्तार से समझाएंगे। यह कदम यह सुनिश्चित करने के लिए उठाया गया है कि जेल की सलाखों के पीछे बैठा व्यक्ति अपनी सजा की समीक्षा की प्रक्रिया को पूरी तरह समझ सके।