Bihar News : पटना हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: मधेपुरा डीएम से अधिवक्ता को जारी अवमानना नोटिस किया रद्द, कहा भूमि अर्जन प्राधिकारी को अधिकार नहीं

Bihar News : पटना हाईकोर्ट ने मधेपुरा के जिलाधिकारी द्वारा एक अधिवक्ता के खिलाफ अवमानना की कार्रवाई शुरू करने के उद्देश्य से जारी किए गए नोटिस को निरस्त कर दिया है.......पढ़िए आगे

Bihar News : पटना हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: मधेपुरा डीएम से अध
डीएम का नोटिस रद्द - फोटो : SOCIAL MEDIA

PATNA : पटना हाईकोर्ट ने मधेपुरा के डीएम की ओर से एक अधिवक्ता को अवमानना केस चलाने का जारी नोटिस को रद्द कर दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि भूमि अर्जन प्राधिकार के रूप में कार्य कर रहा डीएम को अवमानना कानून के तहत अवमानना की कार्रवाई शुरू करने का अधिकार नहीं है। जस्टिस आलोक कुमार की एकलपीठ ने अधिवक्ता सुशांत प्रवीर की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई के बाद यह आदेश दिया। आवेदक की ओर से अधिवक्ता आयुष अभिषेक ने कोर्ट को बताया कि आवेदक 2010 से हाईकोर्ट में वकालत कर रहा हैं और मधेपुरा डीएम के समक्ष भूमि अर्जन वाद संख्या 04/2023 में पैरवी कर रहा था। उनका कहना था कि 5 जुलाई, 2024 को व्यक्तिगत कठिनाई बताते हुए मंगलवार के बजाय शुक्रवार को तारीख देने का अनुरोध किया था। इस पर मधेपुरा के डीएम नाराज हो गए और चिल्लाने लगे।उन्होंने बॉडीगार्ड से बाहर फेंकवाने की धमकी दी।

इस घटना की जानकारी 11 जुलाई ,2024 को रजिस्टर्ड डाक से हाईकोर्ट के महानिबंधक सहित बिहार बार काउंसिल के अध्यक्ष, मुख्य सचिव एंव एसोसिएशन के अध्यक्ष को शिकायत भेजी। इसके बाद 26 जुलाई 2024 को शाम 5 बज कर 7 मिनट पर  डीएम कोर्ट के कोर्ट मास्टर के मोबाइल नंबर से उनके व्हाट्सएप पर शोकॉज नोटिस भेजा गया। ये पूछा गया कि क्यों नहीं अवमानना कानून की  धारा 12 के तहत कार्यवाही की जाए। उन्होंने कोर्ट को बताया कि डीएम ने बदले की भावना से यह नोटिस की है। सच मे नोटिस देना था ,तो घटना के दिन 6 जुलाई को नोटिस जारी करना चाहिए था। लेकिन नोटिस   26 जुलाई को भेजा गया। 

उनका यह भी कहना था कि अवमानना कानून के तहत डीएम के कोर्ट को कोर्ट नहीं माना जा सकता। वही राज्य सरकार की ओर से कोर्ट को बताया गया कि मुख्य सचिव ने 2 अगस्त, 2024 को कोसी प्रमंडल आयुक्त से घटना की जांच कराई और 16 अगस्त 2024 की रिपोर्ट में डीएम के दुर्व्यवहार का आरोप प्रमाणित नहीं पाया गया।

हाईकोर्ट ने आयुक्त के जांच रिपोर्ट के बाद विवाद को समाप्त माना, लेकिन अवमानना नोटिस के अधिकार पर कहा कि अवमानना अधिनियम 1971 के तहत दंड देने का अधिकार केवल सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट को है।  पारंपरिक अधीनस्थ सिविल और क्रिमिनल कोर्ट भी स्वतंत्र रूप से नोटिस नहीं दे सकते, उन्हें हाईकोर्ट से अनुमति लेना होता हैं।ऐसे में भूमि अर्जन प्राधिकारी तो बिल्कुल भी अवमानना कार्यवाही नहीं चला सकते।कोर्ट ने व्हाट्सएप पर भेजी गई नोटिस को निरस्त कर दिया।साथ ही रिट याचिका को निष्पादित कर दिया।