Bihar News : पटना हाईकोर्ट ने रिटायर्ड सहायक अभियंता महेंद्र राम को दी राहत, 7 साल से रुकी पेंशन और ग्रेच्युटी भुगतान का दिया आदेश
Bihar News : पटना हाईकोर्ट ने जल संसाधन विभाग के अधिकारियों और अनुशासनिक प्राधिकारी की मनमानी और सुस्त रवैये पर कड़ा रुख अपनाया है.....जानिए क्या है पूरा मामला
PATNA : पटना हाईकोर्ट ने जल संसाधन विभाग के अफसरों और अनुशासनिक प्राधिकारी की मनमानी और सुस्त रवैये पर कडा रुख अपनाया है। 7 साल से लंबित विभागीय कार्रवाई और पेंशन-ग्रेच्युटी रोके जाने के मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस पूर्णेंदु सिंह की एकल पीठ ने सख्त रुख अपनाया है। कोर्ट ने साफ कर दिया कि यदि 6 सप्ताह के भीतर विभागीय कार्रवाई का अंतिम निपटारा नहीं किया गया, तो पूरी प्रक्रिया स्वतः समाप्त मान ली जाएगी और राज्य सरकार को अगले दो सप्ताह में सभी बकाया सेवानिवृत्ति लाभ का भुगतान करना होगा। लखीसराय में जल संसाधन विभाग के कमांड एरिया डेवलपमेंट सब-डिवीजन में सहायक अभियंता के पद से 30 अप्रैल, 2020 को सेवानिवृत्त हुए। महेंद्र राम को पिछले 5 सालों से अपने ही पैसे और पेंशन के लिए दर-दर भटकना पड़ रहा था। साल 2019 में उन पर बैंक ऑफ इंडिया, लखीसराय शाखा से ₹48,000 की अवैध निकासी और वित्तीय नियमों की अनदेखी का आरोप लगाकर विभागीय जांच शुरू की गई थी। जांच अधिकारी की रिपोर्ट में यह बात सामने आई कि ₹48,000 की अवैध निकासी एकाउंट क्लर्क (धनंजय कुमार) ने की थी, जिसे बाद में बर्खास्त भी कर दिया गया। यानी मुख्य आरोप में याचिकाकर्ता दोषमुक्त हो चुके थे।
इसके बावजूद, विभाग ने उन्हें केवल 90% प्रोविशनल पेंशन दी और बाकी 10% पेंशन, पूरी ग्रेच्युटी तथा लीव एनकैशमेंट रोक कर रखा। 7 साल बाद (अप्रैल 2026 में) बीपीएससी को पेंशन कटौती का प्रस्ताव भेजकर मामले को लटकाए रखा गया। सुनवाई करते हुए जस्टिस पूर्णेंदु सिंह ने देश की सुप्रीम कोर्ट के मील के पत्थर साबित हुए फैसलों—पी वी महादेवन,डा हीरा लाल और डी एस नकारा —का हवाला दिया और कहा कि पेंशन कोई खैरात नहीं ,बल्कि संविधान के अनुच्छेद 300-A के तहत संपत्ति का अधिकार है। कोर्ट ने अपने आदेश में अति-महत्वपूर्ण टिप्पणी दर्ज करते हुए कहा कि जांच अधिकारी द्वारा रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्यों के आधार पर निकाले गए निष्कर्षों के आलोक में, जिसमें उन्होंने पाया है कि ₹48,000 की कथित अवैध निकासी से संबंधित आरोप संख्या 1 याचिकाकर्ता के विरुद्ध सिद्ध नहीं हुआ है। उन्हें भारत के संविधान के अनुच्छेद 300 (ए) के तहत निहित संपत्ति के रूप में—जैसा कि माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा डी एस नकारा के मामलें में व्यवस्था दी गई है कि पेंशन कोई खैरात नहीं है—उनके सेवानिवृत्ति लाभों से वंचित नहीं किया जा सकता है।
विभागीय कार्यवाही के लंबे समय तक लंबित रहने का एक अप्रत्यक्ष दंडात्मक प्रभाव होता है; उत्तरदाताओं का यह दायित्व है कि वे विभागीय कार्यवाही को कम से कम संभव समय में समाप्त करें, जैसा कि सुप्रीम कोर्ट ने पी वी महादेवन और डॉ. हीरालाल के मामलों में व्यवस्था दी है। अन्यथा, प्रतिशपथ पत्र में दी गई जानकारी के आधार पर, यह देरी बिना किसी स्पष्टीकरण के बनी रहती है, जो कि याचिकाकर्ता के कारण नहीं हुई है और इससे उन्हें गंभीर प्रतिकूल प्रभाव पहुंचा है। प्रतिस्पर्धी परिणामों को संतुलित करने के लिए, अनुशासनिक प्राधिकारी की मनमानी कार्रवाई के कारण साम्य/इक्विटी याचिकाकर्ता के पक्ष में है, जिन्होंने बिना किसी कानूनी अधिकार के वैधानिक अवधि से परे विभागीय कार्यवाही में देरी की है, जिसमें इस न्यायालय के हस्तक्षेप की आवश्यकता है।
हाईकोर्ट ने कड़े शब्दों में आदेश जारी करते हुए कहा कि जल संसाधन विभाग और संबंधित प्राधिकारी 6 सप्ताह के भीतर विभागीय जांच/कार्रवाई पर अंतिम निर्णय लें।यदि 6 सप्ताह में अंतिम निर्णय नहीं लिया जाता है, तो यह जांच प्रक्रिया अपने आप बंद मानी जाएगी। इसके बाद अगले 2 हफ्तों के भीतर याचिकाकर्ता के पेंशन, ग्रेच्युटी और लीव एनकैशमेंट सहित सभी रिटायरल ड्यूज का पूर्ण भुगतान करना होगा।