Patna High Court Bail:बिहार में बेल याचिकाओं पर बड़ा फैसला,बार-बार तारीख लेने पर लगेगी लगाम,पुलिस-डॉक्टरों की जवाबदेही हो गई तय

Patna High Court Bail: बिहार में जमानत याचिकाओं के निपटारे में होने वाली देरी पर लगाम लगाने के लिए पटना हाईकोर्ट ने सख्त कदम उठाया है।

Patna High Court New Bail SOP

Patna High Court Bail: बिहार में जमानत याचिकाओं के निपटारे में होने वाली देरी पर लगाम लगाने के लिए पटना हाईकोर्ट ने सख्त कदम उठाया है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुपालन में तैयार नई मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) का मकसद अदालतों में लंबित बेल अर्जियों का जल्द निपटारा करना और पुलिस, अभियोजन तथा स्वास्थ्य विभाग की जवाबदेही सुनिश्चित करना है। इस व्यवस्था के तहत केस डायरी, मेडिकल रिपोर्ट और अन्य जरूरी दस्तावेज समय पर उपलब्ध कराने पर जोर दिया गया है। साथ ही, जमानत याचिकाओं के निस्तारण में देरी की निगरानी के लिए समयबद्ध व्यवस्था बनाने की बात कही गई है।

नई SOP को व्यक्तिगत स्वतंत्रता और न्यायिक प्रक्रिया में पारदर्शिता के लिहाज से अहम माना जा रहा है। जमानत की अर्जी दाखिल होने के बाद दस्तावेजों की कमी, केस डायरी उपलब्ध नहीं होने या मेडिकल रिपोर्ट में देरी के कारण सुनवाई लंबे समय तक टलती रहती है। नई व्यवस्था का उद्देश्य ऐसे अड़ंगों को दूर कर न्यायिक प्रक्रिया को अधिक जवाबदेह बनाना है।

1. केस डायरी डिजिटल माध्यम से भेजने पर जोर

नई व्यवस्था के तहत पुलिस से केस डायरी समय पर उपलब्ध कराने की प्रक्रिया को तेज किया जाएगा। संबंधित पुलिसकर्मियों और कोर्ट नायाब को लोक अभियोजक (PP) तथा सहायक लोक अभियोजक (APP) के साथ डिजिटल माध्यम से दस्तावेज साझा करने की जिम्मेदारी दी गई है। इसके लिए व्हाट्सऐप और ईमेल जैसे माध्यमों के इस्तेमाल का प्रावधान बताया गया है। डीएसपी स्तर के नोडल अधिकारियों के जरिए इसकी निगरानी की जाएगी।

2. मेडिकल और फॉरेंसिक रिपोर्ट के लिए समय-सीमा

चोट से संबंधित रिपोर्ट, पोस्टमार्टम रिपोर्ट और फॉरेंसिक दस्तावेजों में देरी को दूर करना भी इस पहल का अहम हिस्सा है। उपलब्ध विवरण के मुताबिक, ऐसी रिपोर्ट पांच दिनों के भीतर प्रस्तुत करने की समय-सीमा निर्धारित की गई है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि जरूरी चिकित्सकीय साक्ष्य के अभाव में जमानत की सुनवाई अनावश्यक रूप से लंबित न रहे।

3. 30, 60 और 90 दिनों के आधार पर निगरानी

जमानत याचिकाओं की लंबित स्थिति पर नजर रखने के लिए अदालतों के सॉफ्टवेयर में विशेष चिह्न या रेड फ्लैग व्यवस्था का प्रावधान बताया गया है। इसके जरिए 30, 60 और 90 दिनों से लंबित मामलों की पहचान की जा सकेगी। 60 दिनों से पुराने मामलों को प्राथमिकता देने और देरी के कारणों की समीक्षा करने पर जोर रहेगा।

हालांकि, 60 दिन की अवधि को हर मामले में जमानत मिलने या स्वतः मंजूरी की गारंटी नहीं समझना चाहिए। इसका मकसद सुनवाई और निस्तारण में हो रही देरी की निगरानी करना है।

4. बार-बार तारीख लेने पर लगेगी लगाम

नई प्रक्रिया के तहत सुनवाई टालने की प्रवृत्ति पर नियंत्रण रखने की कोशिश की जाएगी। असाधारण परिस्थितियों में ही स्थगन दिए जाने और उसके कारण दर्ज करने पर जोर है। इसके अलावा, याचिका में मौजूद कमियों को दूर करने के लिए अधिकतम 72 घंटे की समय-सीमा तय किए जाने की जानकारी दी गई है।

5. पीड़ित और शिकायतकर्ता को नोटिस

जमानत की सुनवाई से संबंधित मामलों में पीड़ित या शिकायतकर्ता को नोटिस भेजने तथा उसकी तामील की रिपोर्ट पांच दिनों के भीतर अदालत में प्रस्तुत करने की व्यवस्था भी बताई गई है। इससे संबंधित पक्षों को सुनवाई की जानकारी समय पर देने में मदद मिल सकती है।

6. निचली अदालतों के जजों की जवाबदेही

निचली अदालतों के जजों को हर महीने जिला जज के समक्ष जमानत याचिकाओं की प्राप्ति और निस्तारण का ब्योरा प्रस्तुत करना होगा। दो महीने से अधिक लंबित मामलों में देरी की वजह दर्ज करने पर भी जोर दिया गया है। इससे न्यायिक कामकाज की समीक्षा और लंबित मामलों की पहचान आसान हो सकती है।

7. पुलिस और स्वास्थ्य विभाग की निगरानी

जिला स्तरीय बैठकों में रिपोर्ट देने में लापरवाही बरतने वाले पुलिसकर्मियों, जांच अधिकारियों और संबंधित कर्मियों के मामलों को प्रशासनिक अधिकारियों के सामने रखने की व्यवस्था बताई गई है। अस्पतालों और मेडिकल कॉलेजों से रिपोर्ट समय पर मंगाने के लिए स्वास्थ्य विभाग के स्तर पर नोडल अधिकारियों की नियुक्ति पर भी जोर दिया गया है।

8. हाईकोर्ट में जमानत मामलों की सूचीबद्धता

पटना हाईकोर्ट में जमानत याचिकाओं के बोझ को बांटने के लिए सभी एकल न्यायाधीश पीठों के समक्ष प्रतिदिन पांच से दस जमानत अर्जियां सूचीबद्ध करने का प्रावधान बताया गया है। इसका उद्देश्य मामलों की सुनवाई में तेजी लाना और लंबित अर्जियों का दबाव कम करना है।

व्यक्तिगत आजादी और समय पर न्याय पर जोर

नई SOP का मूल मकसद यह है कि जमानत से जुड़े मामलों में अनावश्यक देरी के कारण किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता प्रभावित न हो। पुलिस, अभियोजन, चिकित्सकीय संस्थानों और अदालतों के बीच बेहतर तालमेल से सुनवाई की प्रक्रिया अधिक प्रभावी हो सकती है।