सरकारी कर्मी को एक साथ नहीं दी जा सकती छोटी और बड़ी सजा, DSP की याचिका पर आदेश रद्द, पटना हाई कोर्ट का बड़ा फैसला

पटना हाई कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में कहा है कि सरकारी कर्मचारियों को एक ही अपराध के लिए छोटी और बड़ी सजा एक साथ नहीं दी जा सकती। कोर्ट ने भागलपुर के पूर्व एसडीपीओ पर लगे पांच साल के दंड को कानून के खिलाफ बताते हुए रद्द कर दिया है।

सरकारी कर्मी को एक साथ नहीं दी जा सकती छोटी और बड़ी सजा, DSP

Patna : पटना हाई कोर्ट ने सेवा कानून की व्याख्या करते हुए स्पष्ट किया है कि अनुशासनात्मक कार्यवाही के दौरान किसी भी अधिकारी को एक साथ संयुक्त दंड (बड़ी और छोटी सजा) देना स्वीकार्य नहीं है. अदालत ने माना कि किसी पुलिस अधिकारी के खिलाफ सजा के आदेश में संशोधन या निर्धारण करते समय प्राधिकारी एक साथ दोनों प्रकार की सजाएं नहीं थोप सकते.

यह मामला 45वीं बीपीएससी परीक्षा के माध्यम से डीएसपी बने मनोज कुमार सुधांशु से जुड़ा है, जो भागलपुर के कहलगांव में एसडीपीओ के पद पर तैनात थे. उन पर आरोप था कि वर्ष 2018 के एक अवैध खनन और ओवरलोडिंग मामले की पूरक जांच के दौरान उन्होंने संदिग्ध आचरण दिखाया. डीएसपी पर आरोप लगाया गया था कि उन्होंने अभियुक्तों के जब्त बैंक खातों को डीफ्रीज करने के लिए ट्रायल कोर्ट में अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) प्रस्तुत किया, जिससे अवैध धनराशि जारी हो गई.

कर्तव्य में लापरवाही और अनियमितताओं के आरोप में उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही शुरू की गई थी. भागलपुर डीआईजी की प्रारंभिक जांच रिपोर्ट और पुलिस मुख्यालय की सिफारिश के बाद, विभाग ने दंड स्वरूप उनकी पांच वार्षिक वेतन वृद्धियां रोक दी थीं और पदोन्नति पर भी पांच वर्षों के लिए रोक लगा दी गई थी.

डीएसपी ने इस आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती देते हुए दलील दी कि सेवा नियमों के तहत एक साथ दो तरह की सजाएं नहीं दी जा सकतीं. हाई कोर्ट ने इस तर्क से सहमति जताई और पाया कि बिहार लोक सेवा आयोग ने भी इस सजा पर सहमति देते समय संयुक्त दंड के कारणों का उल्लेख नहीं किया था. अदालत ने कानून की इस गंभीर त्रुटि को देखते हुए डीएसपी के खिलाफ पारित सजा के आदेश को पूरी तरह निरस्त कर दिया है.