धारा 313 CrPC महज औपचारिकता नहीं, 'फेयर ट्रायल' की बुनियाद; पटना हाईकोर्ट ने रद्द की 16 साल पुरानी सजा
हाईकोर्ट ने दोहराया 'फेयर ट्रायल' का सिद्धांत: धारा 313 CrPC के पालन में चूक को गंभीर मानते हुए पटना हाईकोर्ट ने सीतामढ़ी के एक मामले में निचली अदालत के दोषसिद्धि के फैसले को पलटा और आरोपी को बाइज्जत बरी किया।
Patna : पटना हाईकोर्ट ने एक ऐतिहासिक आदेश जारी करते हुए स्पष्ट किया है कि आपराधिक मामलों में धारा 313 CrPC के तहत आरोपी से पूछताछ केवल एक कानूनी औपचारिकता नहीं है, बल्कि यह निष्पक्ष न्याय की आधारशिला है। इस प्रक्रियात्मक चूक को गंभीर मानते हुए कोर्ट ने सीतामढ़ी के एक 16 साल पुराने मामले में निचली अदालत द्वारा दी गई सजा को रद्द कर दिया।
क्या है पूरा मामला?
यह कानूनी विवाद सीतामढ़ी जिले के बाजपट्टी थाना (कांड संख्या 18/2002) से जुड़ा है। अभियुक्त रमेश सिंह पर आरोप था कि उन्होंने एक फायरिंग की घटना के दौरान शिकायतकर्ता की बेटी के साथ अभद्र व्यवहार किया था। इस मामले में ट्रायल कोर्ट ने वर्ष 2010 में आरोपी को धारा 354 IPC के तहत दोषी पाया था और दो साल के कारावास की सजा सुनाई थी।
हाईकोर्ट की कड़ी टिप्पणी: ट्रायल में हुई गंभीर चूक
जस्टिस आलोक कुमार पांडेय की एकलपीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए पाया कि निचली अदालत ने धारा 313 CrPC के अनिवार्य प्रावधानों का उल्लंघन किया है। कोर्ट ने कहा कि आरोपी के सामने ऐसे आरोप रखे गए जिनका उल्लेख न तो मूल एफआईआर में था और न ही अभियोजन के गवाहों ने अपनी गवाही में उन बातों का समर्थन किया था।
धारा 313 CrPC का महत्व और सुप्रीम कोर्ट का हवाला
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के पुराने आदेशों का संदर्भ देते हुए रेखांकित किया कि ट्रायल कोर्ट का यह अनिवार्य कर्तव्य है कि वह आरोपी के विरुद्ध प्रत्येक प्रतिकूल परिस्थिति को स्पष्ट, पृथक और सटीक रूप से उसके सामने रखे। यदि आरोपी को अपने विरुद्ध साक्ष्यों को स्पष्ट करने का सही मौका नहीं मिलता, तो पूरा ट्रायल ही दूषित हो जाता है। साक्ष्यों में विरोधाभास होने के बावजूद सजा देना "फेयर ट्रायल" की अवधारणा के विरुद्ध है।
अदालत का अंतिम फैसला: आरोपी को किया बरी
उच्च न्यायालय ने पाया कि अभियोजन पक्ष के साक्ष्यों में पहले से ही काफी विरोधाभास थे और ऊपर से प्रक्रियात्मक खामियों ने केस को और कमजोर कर दिया। इन तथ्यों के आधार पर पटना हाईकोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को कानूनी और तथ्यात्मक रूप से त्रुटिपूर्ण माना। कोर्ट ने रमेश सिंह की दोषसिद्धि को रद्द करते हुए उन्हें सभी आरोपों से बाइज्जत बरी करने का आदेश दिया।
धारा 313 CrPC क्या है? (संक्षेप में)
जब अभियोजन (Prosecution) के सभी गवाहों की गवाही पूरी हो जाती है, तब अदालत आरोपी को व्यक्तिगत रूप से अपने विरुद्ध आए साक्ष्यों की व्याख्या करने का अवसर देती है। इसका उद्देश्य आरोपी को यह बताना होता है कि उसके खिलाफ क्या सबूत मिले हैं, ताकि वह अपनी सफाई पेश कर सके।