Ramdhari Singh Dinkar : रामधारी सिंह दिनकर राष्ट्रवाद, गांधी और मार्क्स के बीच समन्वय के कवि, न कि संकीर्णता के प्रतीक : गजेंद्र कान्त शर्मा
Ramdhari Singh Dinkar : अक्सर 'स्थापनाओं के कवि' कहे जाने वाले दिनकर के व्यक्तित्व में गांधीवाद, मार्क्सवाद और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का एक अनूठा संगम मिलता है....जानिए राष्ट्रकवि को....
PATNA : रामधारी सिंह दिनकर के सम्बन्ध में लगभग एक स्थापना-सी बन चुकी है कि वे थोड़े-थोड़े सबको अच्छे लगते हैं। उनमें राष्ट्रवाद के भी तत्व हैं, गांधीवाद और मार्क्सवाद के भी तत्व हैं। दिनकर के प्रायः आलोचक उन्हें थोड़ा गांधीवादी भी मानते हैं और थोड़ा मार्क्सवादी भी, थोड़ा राष्ट्रवादी भी और थोड़ा हिंदूवादी भी। संभवतः उनके मूल्यांकन की इसी प्रवृत्ति के कारण टुकड़ों-टुकड़ों में वे सबको अच्छे लगते हैं। कमाल तो यह कि उन्हें वे भी पसंद करते हैं जिन्हें दिनकर ने अपने जीवन में कभी पसंद नहीं किया। दिनकर के मूल्यांकन की इस खंडित प्रवृत्ति का नतीजा है कि आज हिंदुत्ववादी शक्तियां दिनकर को ‛अपना’ बताने का अभियान चला रही हैं। अपने राजनीतिक स्वार्थों की सिद्धि के लिए विरोधी विचारधारा पर प्रहार करते हुए दिनकर को उनके व्यापक सन्दर्भों से काटकर उनका दुरुपयोग कर रही हैं। ऐसे समय में, दिनकर को लेकर उनके पाठकों में एक ठोस समझ विकसित करने की आवश्यकता है ताकि राहु के ग्रसने से दिनकर को बचाया जा सके। दिनकर हिंदुत्ववाद के बिल्कुल ख़िलाफ़ थे। दिनकर को गांधी और नेहरू दोनों पसंद थे। अनेक अवसरों पर गांधी और नेहरू से उनकी असहमतियां भी प्रकट हुई हैं। उनकी कविताओं में दोनों की तीखी आलोचनाएं भी मिलती हैं। इसके बावजूद उन दोनों की विराटता से वे न केवल अवगत थे, बल्कि अभिभूत भी थे। 1947 में दिनकर की चार कविताओं का एक कव्य-संग्रह ‛बापू’ नाम से छपा। उसमें गांधी की विराटता के प्रति दिनकर की अगाध श्रद्धा देखी जा सकती है। वे कहते हैं ‛बापू मैं तेरा समयुगीन, है बात बड़ी, पर कहने दे / लघुता को भूल तनिक गरिमा के महासिंधु में बहने दे।’ दिनकर के लिए गांधी गरिमा के महासिंधु थे। क्योंकि वे एक ऐतिहासिक परिघटना के रूप में सत्य और अहिंसा के बल पर ब्रिटिश साम्राज्यवाद को न सिर्फ चुनौती दे रहे थे, बल्कि उसे शिकस्त भी दे रहे थे। दिनकर ने ‛बापू’ में लिखा कि ‛विस्मय है, जिस पर घोर लौह-पुरुषों का कोई बस न चला / उस गढ़ में कूदा दूध और मिट्टी का बना हुआ पुतला।’ किन्तु ‛बापू’ के प्रकाशन के छह महीने के भीतर दिनकर के ‛दूध और मिट्टी का बना हुआ पुतला’ हिंदुत्ववादियों के हाथों मार दिया गया।
गांधी की हत्या से दिनकर को बहुत आघात पहुँचा था। उनकी हत्या के तत्काल बाद ‛बापू’ का दूसरा संस्करण छपा। इसमें दिनकर ने इन हिंदुत्ववादियों को लताड़ लगाते हुए लिखा कि ‛लिखता हूँ कुंभीपाक नरक के पीव कुण्ड में कलम बोर / बापू का हत्यारा पापी था कोई हिन्दू ही कठोर।’ गांधी की हत्या पर हिंदुत्ववादियों के विरुद्ध इतनी तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करने वाला हिंदी का शायद ही कोई दूसरा कवि हो ! उन्होंने आगे लिखा है कि ‛कहने में जीभ सिहरती है / मूर्च्छित हो जाती कलम / हाय, हिन्दू ही था वह हत्यारा।’ दिनकर की राष्ट्रीय भावनाओं से ओतप्रोत कविताओं के आधार पर दिनकर को ‛अपना’ बताने वाले गोड्से पूजक हिंदुत्ववादियों को उनकी इन पंक्तियों से निश्चय ही छठी का दूध याद आता होगा। फासीवादी दौर का जर्मन चिंतक वाल्टर बेंजामिन कहता था कि फासीवादी शक्तियों से जीवितों के मुक़ाबले मृतकों को अधिक खतरा रहता है क्योंकि ये मृतकों को सबसे अधिक कलंकित करते हैं। आज गांधी और नेहरू को सबसे अधिक कलंकित किया जा रहा है जबकि दिनकर को गांधी और नेहरू दोनों ही व्यक्तित्व सर्वाधिक पसंद थे। अनेक अवसरों पर गांधी और नेहरू से उनकी असहमतियां भी प्रकट हुई हैं। उनकी कविताओं में दोनों की तीखी आलोचनाएं भी मिलती हैं। इसके बावजूद उन दोनों की विराटता से वे न केवल अवगत थे, बल्कि अभिभूत भी थे। 1947 में दिनकर की चार कविताओं का एक कव्य-संग्रह ‛बापू’ नाम से छपा। उसमें गांधी की विराटता के प्रति दिनकर की अगाध श्रद्धा देखी जा सकती है। वे कहते हैं ‛बापू मैं तेरा समयुगीन, है बात बड़ी, पर कहने दे / लघुता को भूल तनिक गरिमा के महासिंधु में बहने दे।’ दिनकर के लिए गांधी गरिमा के महासिंधु थे। क्योंकि वे एक ऐतिहासिक परिघटना के रूप में सत्य और अहिंसा के बल पर ब्रिटिश साम्राज्यवाद को न सिर्फ चुनौती दे रहे थे, बल्कि उसे शिकस्त भी दे रहे थे। दिनकर ने ‛बापू’ में लिखा कि ‛विस्मय है, जिस पर घोर लौह-पुरुषों का कोई बस न चला / उस गढ़ में कूदा दूध और मिट्टी का बना हुआ पुतला।’ किन्तु ‛बापू’ के प्रकाशन के छह महीने के भीतर दिनकर के ‛दूध और मिट्टी का बना हुआ पुतला’ हिंदुत्ववादियों के हाथों मार दिया गया।
गांधी की हत्या से दिनकर को बहुत आघात पहुँचा था। उनकी हत्या के तत्काल बाद ‛बापू’ का दूसरा संस्करण छपा। इसमें दिनकर ने इन हिंदुत्ववादियों को लताड़ लगाते हुए लिखा कि ‛लिखता हूँ कुंभीपाक नरक के पीव कुण्ड में कलम बोर / बापू का हत्यारा पापी था कोई हिन्दू ही कठोर।’ गांधी की हत्या पर हिंदुत्ववादियों के विरुद्ध इतनी तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करने वाला हिंदी का शायद ही कोई दूसरा कवि हो ! उन्होंने आगे लिखा है कि ‛कहने में जीभ सिहरती है / मूर्च्छित हो जाती कलम / हाय, हिन्दू ही था वह हत्यारा।’ दिनकर की राष्ट्रीय भावनाओं से ओतप्रोत कविताओं के आधार पर दिनकर को ‛अपना’ बताने वाले गोड्से पूजक हिंदुत्ववादियों को उनकी इन पंक्तियों से निश्चय ही छठी का दूध याद आता होगा। हिंदी के अधिकांश पाठक यह जानते हैं कि नेहरू ने दिनकर की प्रसिद्ध गद्य कृति ‛संस्कृति के चार अध्याय’ की भूमिका लिखी है किंतु कमतर लोग यह जानते हैं कि दिनकर ने नेहरू को ‛लोकदेव’ की उपाधि देकर ‛लोकदेव नेहरू’ नाम की एक पुस्तक लिखी थी। नेहरू के प्रति दिनकर के विचारों को 1955 ई. में लिखे ‛शांति की समस्या’ नामक उनके एक लेख से समझा जा सकता है जिसमें उन्होंने बल देकर कहा था कि ‛आनेवाला विश्व सिकन्दर और हिटलर का विश्व नहीं, बुद्ध, ईसा, गांधी और जवाहर का संसार होगा।’ इसी लेख में उन्होंने ‛पंचशील’ पर आधारित नेहरू की विदेश नीति का समर्थन करते हुए लिखा कि ‛प्रत्येक देश की वैश्विक नीति उसके राष्ट्रीय चरित्र की परछाईं होती है। हमारा राष्ट्रीय चरित्र योद्धा का नहीं, शांति सेवक का रहा है।’ किन्तु देश में आज दिनकर के विचारों के विपरीत स्थितियां देखने के लिए मिल रही हैं।
दिनकर हिंदी समाज में सर्वाधिक उद्धरित होने वाले आधुनिक कवियों में एक हैं। परन्तु इधर उन्हीं की काव्य-पंक्तियों को उनके वास्तविक सन्दर्भों से काटकर हिंदुत्ववादियों द्वारा अंधराष्ट्रवाद और युद्धोन्माद के लिए सबसे ज्यादा इस्तेमाल किया जा रहा है। दिनकर अंधराष्ट्रवाद और युद्धोन्माद के बिल्कुल विरोधी थे। उनमें युद्ध और शांति को लेकर एक असमंजस अवश्य दिखाई पड़ता है। वे कभी युद्ध के पक्ष में तो कभी शांति के पक्ष में खड़े दिखते हैं। 1930 ई. में नमक सत्याग्रह के जरिये गांधी ने ब्रिटिश हुकूमत पर एक भारी दबाव बनाया था। लेकिन उसके बाद जब 1931 ई. में वे गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने चले गये तो अपेक्षाकृत युवा कवि दिनकर गांधी से नाराज होकर 1933 ई. में ‛हिमालय’ नामक कविता में गांधी के लिए कह डाला कि ‛रे रोक युधिष्ठिर को न यहाँ / जाने दे उसको स्वर्ग धीर / पर, फिरा हमें गांडीव-गदा / लौटा दे अर्जुन-भीम वीर।’ तब दिनकर गांधी के सत्य और अहिंसा की जरूरतों को सिरे से खारिज करते हुए भगत सिंह और चन्द्रशेखर आजाद की क्रांतिकारी धारा के पक्ष में खड़े हो जाते हैं। क्या चन्द्रशेखर आजाद और भगत सिंह युद्धोन्मादी और अंधराष्ट्रवादी थे ? वे क्रांतिकारी थे। उनके पास भावी भारत के स्वप्न और स्वरूप थे। भगत सिंह अपना आदर्श लेनिन को मानते थे। वे कार्ल मार्क्स के वैज्ञानिक चिंतन के रास्ते भारत में समाजवादी क्रांति करना चाहते थे। दिनकर गांधी की जगह भगत सिंह की समाजवादी क्रांति के पक्ष में खड़े होते हैं। भारत-चीन युद्ध के बाद भी वे ‛परशुराम की प्रतीक्षा’ करते हैं। परंतु इसका आशय यह नहीं कि वे अंधराष्ट्रवाद और युद्धोन्माद के पक्ष में खड़े हैं। वे द्वितीय विश्वयुद्ध के समय प्रचार विभाग में उपनिदेशक के पद पर कार्यरत थे। इस दौरान उन्होंने साम्राज्यवाद की कुटिलता और युद्ध की भयावहता को बहुत नजदीक से देखा-समझा था। संभवतः इसलिए उनकी कविताओं का बहुत बड़ा हिस्सा युद्ध के ख़िलाफ़ है। दिनकर अंधराष्ट्रवाद और युद्धोन्माद के कवि कदापि नहीं हैं। वे राष्ट्रीय अस्मिता के साथ पौरुष, प्रेम, शांति और सौंदर्य के कवि हैं। दिनकर जातिवाद के विरुद्ध थे। सन 1961 ई. में किन्हीं रामसागर चौधरी को उनके पत्र के जवाब में लिखे पत्र में वे कि “प्रिय रामसागर चौधरी जी, सच ही, मैं आपको नहीं जानता ....अगर आप भूमिहार-वंश में जनमे या मैं जनमा तो यह काम हमने अपनी इच्छा से तो नहीं किया, उसी प्रकार जो लोग दूसरी जातियों में जनमते हैं, उनका भी अपने जन्म पर अधिकार नहीं होता। हमारे वश की बात यह है कि भूमिहार होकर भी हम गुण केवल भूमिहारों में ही नहीं देखें।” उन्होंने अपनी प्रसिद्ध काव्य-कृति ‛रश्मिरथी’ में जाति-गोत्र की सत्ता को नकारते हुए ज्ञान और योग्यता के महत्व को स्थापित किया है। जाति-भेद के कारण सदियों से समाज में उपेक्षित कर्ण को पहली बार दिनकर की वजह से ‛रश्मिरथी’ में उसकी योग्यता के आधार पर उसे ऊँचे आसन पर आसीन होने का अवसर मिला था। इस काव्य में न जाने कितनी बार ‛जाति’ शब्द का प्रयोग हुआ है और न जाने कितनी पंक्तियां जाति-व्यवस्था’ के विरोध में खर्च हुई हैं !
दिनकर को अपनाने को लेकर हिंदुत्ववादी शक्तियों के दावे बढ़े हैं। ऐसे में, दिनकर के उन संदर्भों की पड़ताल करनी चाहिए जो हिन्दू-मुस्लिम संबंधों को लेकर लिखे गये हैं। इसके लिए उनकी सबसे उपयुक्त पुस्तक ‛संस्कृति के चार अध्याय’ है। इस पुस्तक का महत्व इसलिए भी है कि इसमें हिन्दू और इस्लाम के बीच के जटिल संबंधों की पड़ताल की गयी है। सबसे पहले कि इस्लाम धर्म के प्रति दिनकर की समझ क्या थी और वे हिंदुओं में इस्लाम की कैसी समझ विकसित करना चाहते थे ? दिनकर के विचार हैं कि ‛हिन्दुओं को भी इस बात का ज्ञान प्राप्त करना है कि इस्लाम का भी अर्थ शांति-धर्म ही है।इस धर्म का मौलिक रूप अत्यंत तेजस्वी था तथा जिन लोगों ने इस्लाम की ओर से भारत पर अत्याचार किये, वे शुद्ध इस्लाम के प्रतिनिधि नहीं थे। दिनकर धर्म और राजनीति को अलग-अलग चीज समझते थे। वे मुस्लिम आक्रांताओं को इस्लाम का प्रतिनिधि नहीं मानते जबकि हिंदुत्ववाद का पूरा जोर उन आक्रांताओं के बहाने भारतीय मुसलमानों के प्रति हिंदुओं के मन में घृणा पैदा करने पर है। दिनकर हिन्दू-मुस्लिम एकता के पक्षधर थे परंतु इसके लिए वे ऐतिहासिक तथ्यों में छेड़छाड़ के पक्षधर नहीं थे। वे ‛संस्कृति के चार अध्याय’ में लिखते हैं कि ‛हिन्दू-मुस्लिम एकता को बढ़ावा देने के लिए इतिहास की घटनाओं पर पर्दा नहीं डाला जा सकता। न यही योग्य है कि हम इस्लाम पर पड़ने वाले हिन्दू प्रभाव अथवा हिंदुत्व पर पड़नेवाले मुस्लिम प्रभाव को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करें। जो बातें जैसी हैं, इतिहास में उनका वर्णन वैसा ही रहेगा।’ वे भारत में इस्लाम के आगमन को भारत के लिए एक सांस्कृतिक अध्याय के रूप में देखते हैं। इसमें इस्लाम ने हिन्दू जीवन को प्रभावित किया और हिन्दू जीवन ने इस्लाम को। दिनकर ने ‛बाबर का वसीयतनामा’ के जरिये यह दिखाने की कोशिश की है कि बाबर ने हुमायूँ को इस देश में सारे धर्मों के साथ बराबरी का व्यवहार करने की शिक्षा दी थी। उसी ‛बाबर’ के बहाने भारतीय मुसलमानों को ‛हिन्दू-विरोधी’ घोषित कर उनसे उनकी राष्ट्रीयता का सबूत मांगा जा रहा है। संभवतः इसीलिए दिनकर ने अक़बर इलाहाबादी, चकबस्त, जोश मलीहाबादी, जमील मज़हरी, सागर निज़ामी और सीमाब अकबराबादी के लेखन को सामने लाकर दिखाया कि किस तरह इनकी रचनाओं में राष्ट्रीयता के स्वर मुखरित हुए हैं। दिनकर ने भारतीय मुसलमानों की राष्ट्रीयता पर संदेह करने के विचारों को खारिज किया था। दिनकर के दृष्टिकोण को परस्पर दो ही विचारधाराओं के परिप्रेक्ष्य में रखकर समझा जा सकता है और ये दोनों विचारधाराएँ हिंदुत्ववाद के विरोधी हैं। उनके दृष्टिकोण का पहला ध्रुव है मार्क्सवाद और दूसरा ध्रुव गांधीवाद है। वे विचारधाराओं के इन्हीं दो ध्रुवों के बीच आजीवन आवाजाही करते रहे हैं। उनके सामने एक तरफ गांधी के सत्याग्रह आंदोलन और ब्रिटिश राज से होने वाले समझौते थे तो दूसरी तरफ भगत सिंह के क्रांतिकारी मार्क्सवादी विचार और उनके आमूलचूल परिवर्तन के पक्ष में होने वाले हस्तक्षेप थे। दिनकर के भीतर इनमें किसी एक के चुनाव को लेकर सदैव असमंजस बना रहा है। उनके असमंजस को उन्हीं के जरिये समझा जा सकता है ‛अच्छे लगते मार्क्स, किंतु है अधिक प्रेम गांधी से / प्रिय है शीतल पवन, प्रेरणा लेता हूँ आंधी से।’ दिनकर ने स्वयं स्वीकार किया है कि उन्हें गांधी से प्रेम है और कार्ल मार्क्स उनकी प्रेरणा के स्रोत हैं। इसलिए उनमें गांधीवाद और मार्क्सवाद दोनों के तत्व हैं। उनमें गांधी के सत्य, अहिंसा और शांति से प्रेम भी है और कार्ल मार्क्स के साम्राज्यवाद विरोधी तथा सर्वहारा क्रांति के विचार भी हैं। इन्हीं दो विचारधाराओं के आधार पर वे भविष्य के स्वप्न देख रहे थे। ज्ञानपीठ पुरस्कार लेते समय अपने वक्तव्य में उन्होंने अपनी प्रेरणाओं के श्रोत के संबंध में कहा था कि ‛जिस तरह मैं जवानी भर इक़बाल और रवींद्र के बीच झटके खाता रहा हूँ, उसी प्रकार मैं जीवन भर गांधी और मार्क्स के बीच झटके खाता रहा हूँ। इसलिए उजले को लाल से गुणा करने पर जो रंग बनता है, वही रंग मेरी कविता का है। मेरा विश्वास है कि अंततोगत्वा यही रंग भारत के भविष्य का रंग होगा।’
मौजूदा समय में दिनकर की ‛राष्ट्रवाद’ संबंधी समझ को दृढ़ता के साथ रेखांकित करने की जरूरत है क्योंकि उनकी ‛राष्ट्रवाद’ संबंधी समझ को हिंदुत्ववादी राष्ट्रवाद के पूरक के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिशें चल रही हैं। उनकी राष्ट्रीय भावों की ओजपूर्ण कविताओं के सहारे अंधराष्ट्रवाद के अभियान को हवा दिया जा रहा है। ऐसे में, यह देखना होगा कि आख़िर राष्ट्रवाद को लेकर दिनकर की अपनी समझ क्या थी ? दिनकर की ‛राष्ट्रवाद’ संबंधी समझ को उनकी प्रमुख कृति ‛संस्कृति के चार अध्याय’ के संदर्भों से काफी हद तक समझा जा सकता है। इसमें वे लिखते हैं कि ‛सांस्कृतिक, भाषाई और क्षेत्रीय विभिन्नताओं के बावजूद भारत एक देश है। इसकी विभिन्नता ही इसकी खूबसूरती है।’ वे भारत को विभिन्नताओं के बावजूद एक एकीकृत राष्ट्र के रूप में देख रहे थे। उनकी दृष्टि में विविधताएं कहीं से भी भारतीय राष्ट्र की एकता में बाधक नहीं हैं। बल्कि वे इन बहुसांस्कृतिकता, बहुधार्मिकता, बहुभाषिकता, बहुक्षेत्रीयता जैसे विविध तत्वों को भारतीय राष्ट्र की खूबसूरती के रूप में देख रहे थे। भारतीय राष्ट्र में पायी जाने वाली विविधताओं के पारस्परिक संबंधों के विषय में दिनकर कहते हैं कि ‛सारा भारत, आरंभ से ही, संसार के सभी धर्मों की सम्मिलित भूमि रहा है...भारत ने विभिन्न विचारों, मतों, धर्मों और संस्कृतियों के बीच पूरा सामंजस्य बिठा दिया और इन्हीं विभिन्नताओं का समन्वित रूप हमारा सबसे बड़ा उत्तराधिकार है।’ दिनकर की दृष्टि में भारत एक ऐसा राष्ट्र है जिसकी भूमि पर सभी धर्मों के लोगों का समान अधिकार है। वे यहाँ के सभी धर्मों, विचारों, मतों तथा संस्कृतियों के बीच आपसी सामंजस्य देख रहे थे। उनके लिए भारतीय राष्ट्र न सिर्फ विविधताओं का समन्वित रूप था बल्कि उत्तराधिकार में मिले इस समन्वित रूप का संरक्षण करना एक उत्तरदायित्व भी था। दिनकर का ‛राष्ट्रवाद’ बहुवचनीय है। उन्होंने इसकी खोज भारतीय चिंतनधाराओं में की थीं। उन्हें उत्तरदायित्वस्वरूप जो बहुलतावादी संस्कृति मिली थी, उसकी जड़ें उन्हें जैन धर्म के अनेकांतवादी दर्शन में दिखाई पड़ी थीं । वे कहते हैं कि ‛अनेकांतवादी वह है जो दूसरों के मतों को आदर से देखना और समझना चाहता है। अशोक और हर्ष अनेकांतवादी थे, जिन्होंने एक धर्म में दीक्षित होते हुए भी सभी धर्मों की सेवा की। अकबर अनेकांतवादी था, क्योंकि सत्य के सारे रूप उसे किसी एक धर्म में दिखाई नहीं दिए और संपूर्ण सत्य की खोज में वह आजीवन सभी धर्मों को टटोलता रहा। परमहंस रामकृष्ण अनेकांतवादी थे, क्योंकि हिन्दू होते हुए भी उन्होंने इस्लाम और ईसाइयत की साधना की थी। और गांधी जी का सारा जीवन ही अनेकांतवाद का मुक्त अध्याय था।’ इस प्रकार से दिनकर की विविधता के साथ एकता वाले ‛राष्ट्रवाद’ संबंधी समझ पर महावीर के अनेकांतवाद का भी असर देखा जा सकता है।
दिनकर के ‛राष्ट्रवाद’ में सभी धर्मों, संप्रदायों, मतों, विचारों एवं संस्कृतियों को बराबर की प्रतिष्ठा हासिल है। उनकी दृष्टि में यह बहुवचनीयता भारतीय राष्ट्र को सशक्त भी करती है और सुंदर भी बनाती है। परंतु इधर कुछ वर्षों से दिनकर के बहुवचनीय ‛राष्ट्रवाद’ को ‛हिन्दुत्व राष्ट्रवाद’ की भीषण चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। हिंदुत्ववादी उनके विचारों पर सुनियोजित तरीके से निरंतर आघात कर रहे हैं। ताज़्जुब यह कि इसके बावजूद ये दिनकर के ‛राष्ट्रवाद’ को ‛हिन्दुत्व राष्ट्रवाद’ के समानार्थी रुप में प्रस्तुत करने का षड़यंत्र भी कर रहे हैं ! जबकि दोनों के ‛राष्ट्रवाद’ संबंधी चिंतन में न केवल जमीन-आसमान का फ़र्क है बल्कि दोनों एक-दूसरे के विरोध में भी खड़े हैं। एक का ‛राष्ट्रवाद’ बहुवचनीय है तो दूसरे का ‛राष्ट्रवाद’ एकवचनीय है। दिनकर के राष्ट्रवाद में ‛सर्व धर्म समभाव’ है तो हिन्दुत्व राष्ट्रवाद में ‛एकोहं द्वितीयोनास्ति’ पर जोर है।’ हिन्दुत्व राष्ट्रवाद के मुताबिक भारत एक हिंदू राष्ट्र है, जिसमें गैर-हिंदुओं के लिए कोई स्थान नहीं है या फिर है भी तो दोयम दर्ज़े का। सावरकर ने स्वयं कहा है कि ‛हिन्दुत्व के लक्षण हैं - एक राष्ट्र, एक जाति, एक संस्कृति।’ सावरकर ‛बहुलतावादी राष्ट्रवाद’ के विरुद्ध धर्माधारित ‛एकरूपतावादी राष्ट्रवाद’ के हिमायती थे। राष्ट्रवाद को लेकर दिनकर और हिंदुत्ववाद की समझ के बीच के विरोधी संबंधों को भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में रख कर देखने से बखूबी समझा जा सकता है। यही वह दौर है जिसमें ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्ध भारत में ‛राष्ट्रवाद’ के विचार विकसित हुए हैं। दुनिया में ‛राष्ट्रवाद’ की अनेक अवधारणाएँ हैं और उन अवधारणाओं की आलोचनाएँ भी हैं। कमोबेश यही स्थिति भारत में भी देखी जा सकती है। इस दौर में यहाँ भी ‛राष्ट्रवाद’ की दो प्रमुख अवधारणाओं को आपस में टकराते हुए देख सकते हैं। एक अवधारणा ‛बहुलतावादी राष्ट्रवाद’ की थी तो दूसरी ‛एकरूपतावादी राष्ट्रवाद’ की। इस दूसरी अवधारणा के तहत धर्माधारित राष्ट्र के निर्माण का विचार है जिसका प्रतिनिधित्व एक तरफ़ ‛इस्लामी राष्ट्रवाद’ के रूप में पाकिस्तान के निर्माण के लिए मुस्लिम लीग कर रही थी तो दूसरी तरफ़ ‛हिन्दुत्व राष्ट्रवाद’ के रूप में हिन्दुस्थान के निर्माण के लिए राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ। परंतु आपस में एक-दूसरे के विरोधी दिखने वाले व ऊपर-ऊपर ब्रिटिश उपनिवेशवाद से मुक्ति की आकांक्षा का भ्रम पैदा करने वाले ‛राष्ट्रवाद’ के ये दोनों ही विचार मूलतः ब्रिटिश साम्राज्यवाद द्वारा निर्मित व पोषित थे और ये दोनों ही उसे मजबूत कर रहे थे। इन दोनों अवधारणाओं के इतिहास-भूगोल पर अलग से बात करने की जरूरत है और इन पर बात करने के लिए संभव है कि विदेशी श्रोतों का सहारा लेना पड़े। फ़िलहाल इतना ही कि इन्हीं धर्माधारित ‛राष्ट्रवाद’ के विचारों का नतीजा था - भारतीय राष्ट्र का विभाजन और भीषण रक्तपात। दूसरी अवधारणा ‛बहुलतावादी राष्ट्रवाद’ की थी जो स्वतंत्रता आंदोलन के रूप में भारतीय समाज में राजनीतिक, सामाजिक, धर्मिक व सांस्कृतिक आदि जागृति का विचार विकसित कर रही थी। इसका प्रतिनिधित्व गाँधी, नेहरू, टैगोर, मौलाना आज़ाद के साथ भगत सिंह व चन्द्रशेखर आज़ाद आदि कर रहे थे। स्वतंत्रता आंदोलन के विचारों के साथ विकसित होने वाले इसी ‛बहुलतावादी राष्ट्रवाद’ के बरक्स दिनकर के ‛राष्ट्रवाद’ संबंधी विचारों को समझा जाना चाहिए।
दिनकर स्वतंत्रता अंदोलन के धर्मनिरपेक्ष, जनतांत्रिक व समाजवादी मूल्यों के रचनाकार लेखक थे। ये ही मूल्य ‛संस्कृति के चार अध्याय’ में उनकी लेखकीय दृष्टि के रूप में प्रतिफलित हुए हैं। वे इस पुस्तक का सार रूप प्रस्तुत करते हुए लिखते हैं कि ‛ मेरी पुस्तक का विषय भारत की सामासिक संस्कृति का जन्म और विकास है। मेरी धारणा यह है कि भारत में जब आर्य और आर्येतर जातियों का मिलन हुआ, तब वही मिश्रित जनता भारत की बुनियादी जनता हुई और उसका मिश्रित संस्कार ही भारत का बुनियादी संस्कार हुआ। इस बुनियादी संस्कृति में पहली क्रांति महावीर और बुद्ध ने की। फिर, जब मुसलमान आये तब उस संस्कृति में नई सामासिकता उत्पन्न हुई और जब यूरोप भारत पहुँचा तब हमारी संस्कृति फिर से नवीन हो गयी।’ इस कथन से भारतीय संस्कृति के प्रति उनके न केवल उदार दृष्टिकोण का पता चलता है बल्कि इससे इस बात का भी अंदाज़ा लग सकता है कि वे कितने विशाल राष्ट्र की अवधारणा प्रस्तुत कर रहे थे। क्या हिन्दुत्ववादी राष्ट्रवाद के आकांक्षी इस पुस्तक की स्थापनाओं को कभी पचा पाएंगे ? यदि ये इसे पचा ही पाए होते तो सन 1962 ई0 में ‛संस्कृति के चार अध्याय’ के तीसरे संस्करण की भूमिका में दिनकर भला यह क्योंकर लिखते कि ‛ मेरी स्थापनाओं से सनातनी भी दुःखी हैं और आर्यसमाजी तथा ब्रह्मसमाजी भी। उग्र हिंदुत्व के समर्थक तो इस ग्रंथ से काफी नाराज हैं।’ यह भूमिका ‛परशुराम की प्रतीक्षा’ के रचना-काल के क़रीब की है। जिस ‛परशुराम की प्रतीक्षा’ के हवाले हिंदुत्ववादी सदैव अपने राजनीतिक विरोधियों पर रंग जमाते रहते हैं, उसी के रचना-काल में हिंदुत्ववादियों द्वारा ‛संस्कृति के चार अध्याय’ के किये गये विरोधों को उजागर कर दिनकर ने इनकी दुखती रगों पर अपना हाथ रख दिया था। यह तीसरे संस्करण की भूमिका उसी ‛संस्कृति के चार अध्याय’ की है, जिसे कुछ सालों से हिंदुत्ववादी अपने सिर पर इस तरह से उठाये फिर रहे हैं मानों यह ग्रन्थ इन्हीं के ‛हिंदुत्ववादी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ को जायज ठहराने के लिए लिखा गया हो !
दिनकर ने ‛संस्कृति के चार अध्याय’ में भारत के सांस्कृतिक जीवन में युगान्तकारी परिवर्तन लाने वाले चार महत्वपूर्ण अध्यायों को सामने रखा है। उनमें क्रमशः आर्यों का भारत में आना, बुद्ध का आविर्भाव, भारत में इस्लाम का आगमन एवं भारत में अंग्रेज़ों का प्रवेश है। दिनकर ने जिस इतिहास दृष्टि से भारतीय सांस्कृतिक जीवन को इन चार अध्यायों में रख कर समझा था, उसे हिंदुत्वादी शक्तियां झूठा कहकर खारिज कर रही हैं। वे ‛संस्कृति के चार अध्याय’ में भारत की बहुलतावादी संस्कृति के निर्माण में भारत के बाहर से आये हुए आर्यों तथा भारत की मूल आर्येतर जातियों की भूमिका को इस रूप में रेखांकित करते हैं कि ‛भारतीय संस्कृति सामासिक है - इसका निर्माण भारत की मूल जाति नीग्रो, आग्नेय, द्रविड़ आदि के साथ आर्यों (विदेशियों) के मिलन से हुआ।’ वे भारत की मूल जाति नीग्रो, आग्नेय, द्रविड़ आदि को मानते हैं और आर्यों को बाहरी अथवा विदेशी। परंतु हिंदुत्ववादी तो आर्यों को बाहरी मानने से साफ इनकार करते हैं। ये आर्यों के बाहरी होने के प्रश्न को अपनी अस्मिता से जोड़ कर देखते हैं। इनकी दृष्टि में सिर्फ इस्लाम बाहरी हैं। इस्लाम के विषय में इनकी समझ है कि ये न सिर्फ बाहरी हैं बल्कि बाहरी आक्रमणकारी भी हैं। जबकि दिनकर ने इस्लाम और आक्रमणकारियों में फ़र्क करते हुए कहा है कि ‛ जिन लोगों ने इस्लाम की ओर से भारत पर अत्याचार किए, वे शुद्ध रूप से इस्लाम के प्रतिनिधि नहीं थे। इन अत्याचारों को इसलिए हमें भूलना है कि उसका कारण ऐतिहासिक परिस्थितियां थीं...और इसलिए भी कि उन्हें भूले बिना हम देश में एकता स्थापित नहीं कर सकते।’ वे इसे और अधिक स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि ‛जिस मुसलमान के कारण इस्लाम भारत में उतना बदनाम हुआ, वह ईरानी कम, तुर्क या हूण अधिक था और अरबी तथा ईरानी संस्कृति की उदारता उसमें नहीं थी।’ दिनकर इतिहास के कंटीले रास्तों पर वर्तमान को नहीं ले जाना चाहते थे। वे भारतीय राष्ट्र को इतिहास के उन अनुभवों के साथ जोड़ कर आगे बढ़ाना चाहते थे जो राष्ट्रीय एकता व अखंडता को मजबूत कर सके। जबकि हिन्दुत्ववादी बार-बार इतिहास के उन्हीं अध्यायों को उद्घाटित करते रहते हैं जिससे कच्चे हिन्दू मनों में भारतीय मुसलमानों के प्रति घृणा पैदा हो सके। दिनकर राष्ट्रकवि हैं, उन्होंने गद्य-पद्य में काफी कुछ लिखा है। परंतु उनका एक भी ऐसा उद्धरण देखने के लिए नहीं मिलता जिसमें उन्होंने अपने आप को हिंदुत्ववादी कहा हो या फिर इस्लाम के प्रति किसी भी रूप में दुराग्रह के कोई संकेत दिये हों। बल्कि ठीक इसके विपरीत, अनेक ऐसे प्रसंग हैं जिनमें उन्होंने हिंदुत्ववाद की कड़ी आलोचना की है। दिनकर भारतीय संस्कृति के निर्माता के रूप में बुद्ध और महावीर को देखते हैं। ये दोनों ही भारतीय दार्शनिक परंपरा के अंतर्गत नास्तिक दर्शन के प्रतिपादक थे। बुद्ध ने स्थापित वर्णाश्रम व्यवस्था के साथ वैदिक मान्यताओं को खारिज किया था। उन्हें सत्य, अहिंसा, करुणा और प्रेम को सर्वोत्तम मानवीय मूल्य के रूप में प्रतिष्ठित करने का श्रेय जाता है। दिनकर बुद्ध के विचारों के इतने कायल थे कि वे चाहते थे कि भारत बुद्ध के रास्ते आगे बढ़े। जबकि सावरकर का मनना था कि बुद्ध के कारण ही देश गुलाम हुआ, उनका बुद्ध के संबंध में कथन है कि ‛उनका गौरव हमारा है तो पतन भी तो हमारा है।’ हिंदुत्ववाद का पूरा जोर भारतीय समाज पर बुद्ध के विचारों के विपरीत वैदिक मान्यताओं व वर्णाश्रम व्यवस्था को स्थापित करना तथा ‛मनुस्मृति’ के रूप में एक आचार संहिता को थोपने पर है।
हिंदुत्ववाद की पूरी दिमागी कसरत ‛संस्कृति’ पर है और ‛संस्कृति’ भी क्या ? हिन्दू संस्कृति ! वास्तव में ‛हिन्दू संस्कृति’ जैसी कोई एक चीज इस देश में है भी नहीं। इस भारतीय उपमहाद्वीप में क्या हिंदुओं की कोई एक संस्कृति है ? क्या हिमाचल के हिंदुओं की संस्कृति और केरल के हिंदुओं की संस्कृति एक है ? क्या गुजरात के हिंदुओं की वही संस्कृति है जो बंगाल के हिंदुओं की है ? जब एक क्षेत्र के हिंदुओं की संस्कृति दूसरे क्षेत्र के हिंदुओं की संस्कृति से भिन्न है, तब भारत को एक ‛हिन्दू सांस्कृतिक राष्ट्र’ कैसे बनाया जा सकता है ? हिंदुत्ववाद अर्थशास्त्र के मामलों में ‛खाली हाथ’ है। अन्यथा यह ‛हिंदुत्ववादी राष्ट्रवाद’ की आड़ में राष्ट्रीय संपत्तियों को बहुत तेजी के साथ पूंजीपतियों के हाथों औने-पौने दामों में क्यों बेच रहा है ? शेष सार्वजनिक संस्थाओं को सुनियोजित तरीके से क्यों कमजोर कर रहा है ? इस बीच एक भी कायदे का सार्वजनिक संस्थान या उद्योग खड़ा करने का उदाहरण क्यों नहीं मिलता ? यह कैसा ‛राष्ट्रवाद’ है जो हर दिन राष्ट्रीय संपत्तियों को निजी हाथों में बेचता रहता है ? क्या राष्ट्र की अर्थव्यवस्था को बेहाल करना भी कोई ‛राष्ट्रवाद’ है ? क्या ऐसा ‛राष्ट्रवाद' कभी राष्ट्रकवि दिनकर का ‛राष्ट्रवाद’ हो सकता है ! दिनकर की चिंता में सर्वप्रथम देश है, राष्ट्रवाद बाद में। यानि उनमें देश-प्रेम की वज़ह से ‛राष्ट्रवाद’ है, ‛राष्ट्रवाद' की वज़ह से देश-प्रेम नहीं है। जबकि हिंदुत्ववाद का आदि भी ‛राष्ट्रवाद’ है और अंत भी। इसके आदि और अंत के बीच कोई ‛मध्य’ नहीं आता क्योंकि इसका ‛राष्ट्रवाद' खास किस्म का एक कार्यक्रम है। यह भारत की सांस्कृतिक बहुलता को खत्म कर हिंदुत्व की सांस्कृतिक अवधारणाओं को भारतीय राष्ट्र में जोर-जबरदस्ती के साथ लागू करने का लक्ष्य लेकर चलता है। इस प्रकार की प्रवृति से ‛अंधराष्ट्रवाद’ पैदा होता है और यह ‛अंधराष्ट्रवाद’ अंतर्राष्ट्रीय समुदायों के बीच दो किस्म के संबंध कायम करता है, एक मित्र-राष्ट्र के रूप में और दूसरा शत्रु-राष्ट्र के रूप में। राष्ट्रीय समुदायों के बीच भी जोर-जबरदस्ती के साथ यही काम करता है। अपने नागरिकों को दो खेमों में बांटता है, एक खेमा देशभक्त के रूप में और दूसरा देशद्रोही के रुप में। ऐसा नहीं है कि यह कभी देश-प्रेम की बात नहीं करता हो। यह अपना समूचा कार्यक्रम देश-प्रेम की खाल ओढ़कर ही तो करता है ! दिनकर इनके देश-प्रेम पर चोट करते हुए अपने ‛जननी जन्मभूमि' नामक निबंध में लिखते हैं कि ‛अपने देश से प्रेम करना बहुत अच्छा है... किन्तु अपने देश को सर्वश्रेष्ठ मानकर अन्य देशों से घृणा करना बिल्कुल बेजा बात है।’ दिनकर मिथ्याभिमान और घृणा पर टिके हुए ‛राष्ट्रवाद' के विरुद्ध थे। देश में धार्मिकता की आड़ में जिस प्रकार से हिंदुत्व की विचारधारा को स्थापित करने की कोशिशें चल रही हैं, उसके संबंध में दिनकर के विचार हैं कि ‛धार्मिकता की अति ने देश का विनाश किया, इस अनुमान से भागा नहीं जा सकता है और यह धार्मिकता भी ग़लत किस्म की धार्मिकता थी।’ ज़ाहिर है कि दिनकर इस कट्टरता, कुटिलता और संकीर्णता से भरी धार्मिकता पर आधारित ‛राष्ट्रवाद' के पक्ष में नहीं थे।
दिनकर वास्तव में, देश-प्रेम के कवि और आलोचनात्मक ‛राष्ट्रवाद' के लेखक थे। उनकी रचनाओं में ‛राष्ट्रवाद' के दो रूप दिखाई पड़ते हैं। एक ‛सामान्यीकृत राष्ट्रवाद' का रूप है और दूसरा ‛विशेषीकृत राष्ट्रवाद' का रूप है। ध्यान देने की बात है कि हिंदुत्ववादी अक्सर उनके ‛सामान्यीकृत राष्ट्रवाद' के ही कुछ अंशों का उपयोग करते हैं। ये कभी भूल से भी उनके ‛विशेषीकृत राष्ट्रवाद' के क्षेत्र में घुसपैठ करने की हिम्मत नहीं कर पाते। जब वे राष्ट्रीय आपदा की घड़ी में सीधे-सीधे राष्ट्र को संबोधित कर रहे होते हैं तब उनकी रचनाओं में ‛सामान्यीकृत राष्ट्रीयता' का रूप उभर कर सामने आता है। चाहे स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान उत्पन्न होने वाली भीषण परिस्थितियों के विरुद्ध लिखी गयी रचनाएं हों या भारत-चीन युद्ध के बाद लिखी गयी ‛परशुराम की प्रतीक्षा' आदि जैसी रचनाएं हों। इसमें उनकी एक-एक पंक्ति में हताशा, निराशा, कुंठा, पराजय, कायरता आदि के विरुद्ध तलवारें चमकती हैं, ललकारें भरी रहती हैं, शौर्य का प्रदर्शन होता है, राष्ट्रीय भावों के बोध होते हैं, सत्ता से संघर्ष होता है और क्रांति का जयघोष सुनाई पड़ता है। आम स्थितियों में की गयी रचनाओं में वे गर्जन-तर्जन सुनाई नहीं पड़ते। हिंदुत्ववादी उनके गर्जन-तर्जन मात्र से भरी रचनाओं का ही इस्तेमाल किया करते हैं। क्योंकि ये दैहिक शौर्य के आग्रही होते हैं। इसलिए इन रचनाओं के जरिये इनका ध्येय मात्र राजनीति का हिन्दुकरण और हिंदुओं का सैन्यीकरण करना होता है। उनकी आम स्थितियों की रचनाओं में जीवन और प्रकृति के सौंदर्य के साथ भारतीय समाज की विसंगतियां भरी रहती हैं। भारतीय समाज में कोढ़ की तरह व्याप्त धार्मिक और सामाजिक विसंगतियों के खिलाफ़ क्षोभ रहता है। किसानों की दुर्दशा के चित्रण होते हैं। भारत की अशिक्षा, गरीबी, भुखमरी, बेकारी आदि की पीड़ा होती है। उनके ‛विशेषीकृत राष्ट्रवाद’ में सामान्यतः ‛राष्ट्रवाद' की कम, विशेषतः किसान, मजदूर, वंचितों की आवाज अधिक सुनायी पड़ती है। अतएव, दिनकर के इस ‛विशेषीकृत राष्ट्रवाद’ को समझे बगैर उनके ‛राष्ट्रवाद' के वास्तविक स्वरूप को कायदे से नहीं समझा जा सकता है।