पशुपति पारस का राजनीति से संन्यास का संकेत! प्रिंस राज बने रालोजपा के कार्यकारी राष्ट्रीय अध्यक्ष
राष्ट्रीय लोक जनशक्ति पार्टी (RLJP) को अस्तित्व के संकट से उबारने के लिए पशुपति कुमार पारस ने बड़ी घोषणा की है। प्रिंस राज को पार्टी का कार्यकारी राष्ट्रीय अध्यक्ष नियुक्त किया गया है, इसे पारस के राजनीति से संन्यास के तौर पर देखा जा रहा है।
Patna - राष्ट्रीय लोक जनशक्ति पार्टी (रालोजपा) के भीतर मचे घमासान और हाशिए पर जाती पार्टी को बचाने के लिए पूर्व केंद्रीय मंत्री पशुपति कुमार पारस ने बड़ा दांव खेला है। दिल्ली में आयोजित पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में पारस ने आधिकारिक रूप से नेतृत्व परिवर्तन की घोषणा की। पार्टी के राजनीतिक वजूद को बनाए रखने के लिए अब युवा नेतृत्व पर भरोसा जताया गया है। पशुपति पारस ने इस बैठक में स्पष्ट किया कि वर्तमान चुनौतियों से निपटने के लिए नई ऊर्जा की आवश्यकता है, जिसे ध्यान में रखते हुए यह निर्णय लिया गया है।
प्रिंस राज को मिली पार्टी की कमान

पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष और समस्तीपुर के पूर्व सांसद प्रिंस राज पासवान को रालोजपा का नया कार्यकारी राष्ट्रीय अध्यक्ष नियुक्त किया गया है। प्रिंस राज, दिवंगत नेता रामचंद्र पासवान के पुत्र हैं और चिराग पासवान के चचेरे भाई हैं। उनकी नियुक्ति को पार्टी के भीतर बिखराव रोकने और दलित वोट बैंक को एकजुट रखने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। प्रिंस राज के कंधों पर अब उस विरासत को संभालने की जिम्मेदारी है जिसे पशुपति पारस ने चिराग पासवान से अलग होकर गढ़ा था।
नियमानुसार पूर्णकालिक अध्यक्ष की होगी ताजपोशी

बैठक में लिए गए फैसले के अनुसार, प्रिंस राज अभी 'कार्यकारी' भूमिका में रहेंगे। अगले दो महीनों के भीतर पार्टी की पुनः एक उच्चस्तरीय बैठक बुलाई जाएगी, जिसमें संगठनात्मक चुनावों और नियमानुसार प्रक्रियाओं को पूरा कर उन्हें औपचारिक रूप से राष्ट्रीय अध्यक्ष घोषित किया जाएगा। यह समय प्रिंस राज के लिए अग्निपरीक्षा जैसा होगा, क्योंकि उन्हें पार्टी के वरिष्ठ नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच अपनी स्वीकार्यता साबित करनी होगी और अगले चुनावों के लिए गठबंधन की राह तलाशनी होगी।
पशुपति पारस के संन्यास की चर्चा तेज

इस पूरी बैठक का सबसे चौंकाने वाला पहलू पशुपति कुमार पारस का भावुक रुख रहा। सूत्रों और बैठक में हुई चर्चाओं के अनुसार, पूर्व केंद्रीय मंत्री अब सक्रिय राजनीति से संन्यास ले सकते हैं। अपने बड़े भाई स्वर्गीय रामविलास पासवान के निधन के बाद पार्टी में हुए विभाजन और हालिया राजनीतिक घटनाक्रमों से पारस काफी आहत बताए जा रहे हैं। पार्टी सूत्रों का कहना है कि वे अब मार्गदर्शक की भूमिका में रहकर प्रिंस राज को आगे बढ़ाना चाहते हैं, ताकि परिवार और पार्टी की राजनीतिक धारा विलुप्त न हो जाए।
विरासत की जंग और भविष्य की चुनौतियां
बिहार की राजनीति में 'पासवान विरासत' पर कब्जे की जंग अब नए मोड़ पर है। एक तरफ चिराग पासवान अपनी लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के साथ एनडीए के भीतर मजबूत स्थिति में हैं, वहीं रालोजपा अपने वजूद की लड़ाई लड़ रही है। प्रिंस राज के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि वे पार्टी को चिराग की छाया से बाहर निकालकर एक स्वतंत्र पहचान दिला सकें। क्या पारस का यह बलिदान और युवा नेतृत्व को कमान सौंपने का फैसला पार्टी को पुनर्जीवित कर पाएगा, यह आने वाले कुछ महीनों में साफ हो जाएगा।
Report - narrottam kumar