गरीबी बनी रोड़ा, 21 साल बाद पटना हाईकोर्ट से बरी हुआ रंजीत झा, दोषी पुलिसकर्मियों पर DGP को जांच और कार्रवाई का आदेश

21 साल जेल की सलाखों के पीछे रहने के बाद आखिरकार रंजीत झा को न्याय मिला। पटना हाईकोर्ट ने उनकी उम्रकैद की सजा रद्द करते हुए बरी कर दिया है।कोर्ट ने खराब पुलिस जांच पर कड़ा ऐतराज जताते हुए बिहार DGP को कार्रवाई के आदेश दिए हैं.

Ranjit Jha Patna High Court Acquittal
21 साल बाद पटना हाईकोर्ट से बरी- फोटो : news 4 nation AI

बिहार के समस्तीपुर जिले के रहने वाले रंजीत झा को हत्या के एक मामले में 21 साल जेल में बिताने के बाद अंततः न्याय मिला है। पटना हाईकोर्ट ने उनकी अपील स्वीकार करते हुए फास्ट ट्रैक कोर्ट द्वारा सुनाई गई उम्रकैद की सजा को रद्द कर दिया और उन्हें सभी आरोपों से बरी कर दिया। सुनवाई के दौरान अदालत ने पुलिस की दोषपूर्ण अनुसंधान प्रक्रिया पर गहरा असंतोष जताया और गलत जांच के जिम्मेदार पुलिसकर्मियों की भूमिका की जांच के लिए राज्य के पुलिस महानिदेशक (DGP) को कड़े निर्देश दिए हैं।


3300 रुपये के विवाद में हुई हत्या और फास्ट ट्रैक कोर्ट का फैसला

यह पूरा मामला वर्ष 2000 का है, जब समस्तीपुर के मुसरीघरारी थाना क्षेत्र में पवन कुमार झा की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। पुलिस जांच के अनुसार, महज 3,300 रुपये के लेन-देन के विवाद में इस वारदात को अंजाम देने का आरोप रंजीत झा पर लगाया गया था। मामले में सुनवाई के बाद वर्ष 2009 में समस्तीपुर की फास्ट ट्रैक कोर्ट ने रंजीत झा को दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई, जिसके बाद से वे लगातार जेल में बंद थे।


गरीबी बनी रोड़ा, 16.5 साल तक अटकी रही हाईकोर्ट में अपील

रंजीत झा के मामले का सबसे दुखद पहलू उनकी अत्यधिक आर्थिक तंगी रही। गरीबी के कारण वे लंबे समय तक ऊपरी अदालत का रुख नहीं कर सके और उनकी आपराधिक अपील पटना हाईकोर्ट में दाखिल होने में लगभग 16.5 साल की देरी हो गई। कानूनी सहायता के अभाव और वित्तीय विपन्नता के कारण उन्हें अपनी जिंदगी के बहुमूल्य वर्ष जेल की सलाखों के पीछे बिताने पड़े।


20 साल पूरे होने पर भी 11 महीने लटका रहा रिमिशन प्रस्ताव

जेल में सजा काटने के दौरान वास्तविक अवधि और मिलने वाली छूट को मिलाकर रंजीत झा करीब 20 साल की सजा पूरी कर चुके थे। इसके बावजूद उनकी समय-पूर्व रिहाई (Premature Release) का प्रस्ताव रिमिशन बोर्ड के समक्ष लगभग 11 महीने तक लंबित पड़ा रहा। हाईकोर्ट ने प्रशासनिक सुस्ती और अधिकारियों की कार्यशैली पर कड़ा ऐतराज जताते हुए इस गैर-जरूरी देरी को अत्यंत गंभीर माना।


दोषी पुलिसकर्मियों पर DGP को जांच और कार्रवाई का आदेश

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में टिप्पणी की कि शुरुआती पुलिस जांच में बेहद गंभीर खामियां थीं, जिसकी वजह से एक निर्दोष व्यक्ति को आरोपी बनना पड़ा। अदालत ने बिहार के DGP को स्पष्ट निर्देश दिया है कि इस मामले में गलत अनुसंधान करने वाले जिम्मेदार पुलिस अधिकारियों की पहचान की जाए और जांच में दोषी पाए जाने वाले पुलिसकर्मियों के खिलाफ सख्त अनुशासनात्मक और कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।


मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ा बुरा असर, सरकार उठाएगी इलाज का खर्च

दो दशकों से अधिक समय तक जेल में बंद रहने के कारण रंजीत झा का मानसिक स्वास्थ्य बुरी तरह प्रभावित हुआ है और वे मानसिक रूप से अस्वस्थ हो चुके हैं। स्थिति की संवेदनशीलता को देखते हुए हाईकोर्ट ने बिहार सरकार को निर्देश दिया है कि वह रंजीत झा के इलाज और पुनर्वास (Rehabilitation) का पूरा खर्च वहन करे। यह ऐतिहासिक फैसला न केवल एक व्यक्ति की रिहाई है, बल्कि यह कमजोर वर्गों की न्याय तक पहुंच, पुलिस अनुसंधान की गुणवत्ता और जेल प्रशासन की कमियों को उजागर करता है।