कुशवाहा का आखिरी दांव: टूटने से बची पार्टी! पटना आवास पर विधायकों संग गपशप कर विरोधियों को दिया कड़ा संदेश
उपेंद्र कुशवाहा ने अपने दो प्रमुख विधायकों—माधव आनंद और आलोक कुमार सिंह—के साथ पटना आवास पर बैठक कर यह साफ कर दिया है कि उनकी पार्टी एकजुट है और उन्होंने टूटने के खतरे को टाल दिया है।
patna - : बिहार की राजनीति में 'खरमास' खत्म होते ही जिस पार्टी के टूटने की भविष्यवाणियां की जा रही थीं, वहां अब तस्वीर बदलती नजर आ रही है। उपेंद्र कुशवाहा ने अपने दो प्रमुख विधायकों—माधव आनंद और आलोक कुमार सिंह—के साथ पटना आवास पर बैठक कर यह साफ कर दिया है कि उनकी पार्टी एकजुट है और उन्होंने टूटने के खतरे को टाल दिया है।
पटना आवास पर विधायकों का जमावड़ा
कल देर शाम पटना स्थित आवास पर उपेंद्र कुशवाहा और उनके विधायकों के बीच काफी अनौपचारिक माहौल में बातचीत हुई। इस मुलाकात के दौरान उपेंद्र कुशवाहा, माधव आनंद और आलोक कुमार सिंह के साथ चाय पर चर्चा करते और गपशप करते दिखे। सोशल मीडिया पर इन तस्वीरों के साझा होने के बाद राजनीतिक गलियारों में चल रही उन तमाम अटकलों पर विराम लग गया है, जिनमें पार्टी में बड़ी टूट की बात कही जा रही थी।
टूट की आशंकाओं पर फेरा पानी
पिछले कई दिनों से यह चर्चा जोरों पर थी कि खरमास खत्म होते ही उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी के विधायक पाला बदल सकते हैं। विरोधियों का मानना था कि पार्टी के भीतर गहरा असंतोष है, लेकिन कुशवाहा ने ऐन वक्त पर सक्रिय होकर अपने कुनबे को बिखरने से बचा लिया है। जानकारों का मानना है कि इन तस्वीरों के जरिए उन्होंने यह संदेश दिया है कि उनके विधायक उनके नेतृत्व पर पूरा भरोसा रखते हैं।
विरोधियों और बागियों को कड़ा जवाब
उपेंद्र कुशवाहा की यह चाल उनके पार्टी के भीतर और बाहर—दोनों तरह के विरोधियों के लिए एक कड़ा संदेश मानी जा रही है। पार्टी के भीतर जो विधायक अब भी बागी सुर अलाप रहे थे, उनके पास अब नाराजगी खत्म करने के अलावा कोई खास विकल्प नहीं बचा है। शक्ति प्रदर्शन की इस छोटी सी लेकिन प्रभावशाली तस्वीर ने कुशवाहा के राजनीतिक भविष्य को नई संजीवनी दे दी है।
बागी विधायकों के सामने सीमित विकल्प
पार्टी के बचे हुए बागी विधायकों के लिए अब स्थिति कठिन हो गई है। जब पार्टी के मुख्य चेहरे और प्रभावशाली विधायक नेतृत्व के साथ खड़े नजर आ रहे हैं, तो बागियों के लिए नई राह बनाना मुश्किल होगा। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अब पार्टी में बचे हुए असंतुष्टों को भी कुशवाहा की शर्तों पर वापस लौटना पड़ सकता है, अन्यथा वे पार्टी में अलग-थलग पड़ जाएंगे।
रणनीतिक जीत का दावा
इसे उपेंद्र कुशवाहा की रणनीतिक जीत के तौर पर देखा जा रहा है। खरमास बीतने के बाद जहां अन्य दल सेंधमारी की योजना बना रहे थे, वहीं कुशवाहा ने अपने आवास पर विधायकों को एकजुट कर यह साबित कर दिया कि उनकी पकड़ अब भी मजबूत है। तस्वीरों में दिख रही सहजता और संवाद यह इशारा कर रहा है कि पार्टी के भीतर का संकट फिलहाल टल चुका है।
बिहार की राजनीति में नया मोड़
इस मुलाकात के बाद बिहार की सत्ताधारी और विपक्षी गठबंधन दोनों की नजरें उपेंद्र कुशवाहा की अगली चाल पर टिकी हैं। पार्टी को टूटने से बचाकर उन्होंने आगामी चुनावों और राजनीतिक मोलभाव के लिए अपनी स्थिति को मजबूत कर लिया है। अब देखना यह होगा कि बागी विधायक इस नई परिस्थिति में क्या रुख अपनाते हैं और क्या पार्टी के भीतर पूरी तरह शांति बहाल हो पाती है।