52 साल की मांग, 160 साल पुराना अनुमंडल... आखिर कब बनेगा बाढ़ जिला? नीतीश के 2022 के वादे से लेकर ललन सिंह के ताजा ऐलान तक फिर गरमाई सियासत...
बाढ़ को जिला बनाने की मांग 1970 के दशक में शुरू हुई थी। जनआंदोलन, धरना-प्रदर्शन और जनप्रतिनिधियों की पहल के बाद 22 मार्च 1991 को तत्कालीन संयुक्त बिहार सरकार ने बाढ़ को 51वां जिला घोषित कर दिया। लेकिन यह सिर्फ हवा हवाई साबित हुआ
Bihar News : बिहार की राजनीति में एक बार फिर बाढ़ को जिला बनाने का मुद्दा सुर्खियों में है। केंद्रीय मंत्री और जदयू के वरिष्ठ नेता राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह ने रविवार को एक कार्यक्रम के दौरान मंच से घोषणा की कि बाढ़ को नया जिला बनाया जाएगा। उनके इस बयान के बाद पूरे बाढ़ अनुमंडल में नई उम्मीद जाग गई है। दशकों से जिला बनने का इंतजार कर रहे लोगों के बीच यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या इस बार उनका सपना सच होने वाला है।
ललन सिंह के इस ताजा बयान के साथ ही लोगों को 13 मार्च 2022 की वह घोषणा भी याद आने लगी, जब तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार बाढ़ पहुंचे थे। स्थानीय लोगों की मांग सुनने के बाद उन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा था कि "बाढ़ जल्द जिला बनेगा।" उस समय इस घोषणा का जोरदार स्वागत हुआ था और लोगों को लगा था कि वर्षों पुरानी मांग अब पूरी हो जाएगी। हालांकि समय बीतता गया, लेकिन जिला बनने की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी। मुख्यमंत्री की उस घोषणा के बाद तत्कालीन जदयू प्रदेश उपाध्यक्ष एवं विधान पार्षद संजय सिंह ने कहा था कि "बाढ़ की जनता मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को कभी नहीं भूलेगी। उन्होंने बाढ़ के लोगों का दिल जीत लिया है। 70 के दशक से चली आ रही मांग को पूरा करने की दिशा में मुख्यमंत्री ने ऐतिहासिक कदम उठाया है। बाढ़ के लोगों के मान-सम्मान और स्वाभिमान का उन्होंने सम्मान किया है।" संजय सिंह ने यह भी कहा था कि कई सरकारें आईं और चली गईं, लेकिन किसी ने इस मांग को गंभीरता से पूरा करने की कोशिश नहीं की।
52 साल पुराना आंदोलन, लेकिन सपना अब भी अधूरा
बाढ़ को जिला बनाने की मांग 1970 के दशक में शुरू हुई थी। जनआंदोलन, धरना-प्रदर्शन और जनप्रतिनिधियों की पहल के बाद 22 मार्च 1991 को तत्कालीन संयुक्त बिहार सरकार ने बाढ़ को 51वां जिला घोषित कर दिया। 1 अप्रैल 1991 को तत्कालीन जिलाधिकारी अरविंद प्रसाद ने जिले का औपचारिक उद्घाटन भी कर दिया था। लेकिन यह खुशी ज्यादा देर तक नहीं टिक सकी। 2 अप्रैल 1991 को सरकार ने अपना फैसला वापस ले लिया और बाढ़ फिर से अनुमंडल बन गया। तभी से यह मांग लगातार जारी है।
160 साल पुराना अनुमंडल, फिर भी जिले का इंतजार
बाढ़ का प्रशासनिक इतिहास काफी गौरवशाली रहा है। ब्रिटिश शासन ने वर्ष 1865 में बाढ़ को अनुमंडल का दर्जा दिया था। यानी करीब 160 वर्षों से बाढ़ अनुमंडल के रूप में अस्तित्व में है। इतने लंबे इतिहास और बड़े प्रशासनिक क्षेत्र के बावजूद आज तक इसे जिले का दर्जा नहीं मिल सका। यही कारण है कि हर चुनाव और हर बड़े राजनीतिक मंच पर यह मुद्दा फिर से उठ खड़ा होता है।
मगध का प्रवेश द्वार है बाढ़
राजधानी पटना से करीब 65 किलोमीटर दूर स्थित बाढ़ अनुमंडल को 'मगध का प्रवेश द्वार' कहा जाता है। लगभग 92,818 हेक्टेयर क्षेत्रफल में फैले इस अनुमंडल के अंतर्गत मोकामा, घोसवरी, पंडारक, बाढ़, बेलछी, अथमलगोला और बख्तियारपुर जैसे सात प्रखंड आते हैं। यहां 83 पंचायतें और 337 गांव हैं। इसकी सीमाएं नालंदा, शेखपुरा, लखीसराय, बेगूसराय और समस्तीपुर जिलों से मिलती हैं। टाल क्षेत्र होने के कारण यह इलाका दलहन उत्पादन और कृषि की दृष्टि से बिहार के सबसे महत्वपूर्ण इलाकों में गिना जाता है।
जिला बनने से बदल सकती है पूरे इलाके की तस्वीर
बाढ़ को जिला बनाने की मांग केवल सम्मान का सवाल नहीं है, बल्कि विकास से भी जुड़ी हुई है। वर्तमान में जिला स्तर के अधिकांश सरकारी कार्यों के लिए लोगों को पटना जाना पड़ता है। जिला बनने के बाद डीएम, एसपी समेत सभी प्रमुख प्रशासनिक कार्यालय बाढ़ में स्थापित होंगे। इससे लोगों का समय और खर्च दोनों बचेंगे। स्वास्थ्य, शिक्षा, सड़क, सिंचाई और कानून-व्यवस्था जैसी सुविधाओं में तेजी से सुधार होने की उम्मीद है। टाल क्षेत्र के किसानों को योजनाओं का लाभ आसानी से मिलेगा, जबकि दाल उद्योग, कृषि आधारित कारोबार और स्थानीय व्यापार को भी नई गति मिलेगी।
अब सरकार के फैसले पर टिकी हैं निगाहें
ललन सिंह के आज के ऐलान ने एक बार फिर बाढ़ को जिला बनाने की बहस को राजनीतिक केंद्र में ला दिया है। लोगों का कहना है कि अब सिर्फ घोषणा नहीं, बल्कि सरकारी अधिसूचना और प्रशासनिक प्रक्रिया पूरी होने का इंतजार है। 52 वर्षों से चल रहे संघर्ष और 160 साल पुराने अनुमंडल के इतिहास के बाद अब बाढ़ की जनता यही उम्मीद कर रही है कि इस बार उनका सपना अधूरा नहीं रहेगा, बल्कि बाढ़ सचमुच बिहार के नए जिले के रूप में अपनी पहचान बनाएगा।
कमलेश की रिपोर्ट