विश्व जनसंख्या दिवस 2026, भारत की 147 करोड़ आबादी -चुनौती नहीं, मानव पूंजी में बदलने का अवसर
भारत के संदर्भ में यह दिन महज आंकड़ों का जश्न नहीं है। यह एक गंभीर आत्मचिंतन का क्षण है। देश की आबादी अब 147 करोड़ के आसपास पहुंच चुकी है। हर छठा इंसान दुनिया का भारतीय है। पेश है वरिष्ठ पत्रकार धीरेंद्र कुमार की कलम से विस्तृत रिपोर्ट..
World Population Day 2026: 11 जुलाई को विश्व जनसंख्या दिवस के रूप में मनाने का फैसला वर्ष 1989 में संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) की गवर्निंग काउंसिल द्वारा लिया गया था। इसकी प्रेरणा 11 जुलाई 1987 को 'फाइव बिलियन डे' (Five Billion Day) से मिली थी, जो वह दिन था जब दुनिया की आबादी का आंकड़ा पहली बार 5 अरब (500 करोड़) तक पहुंच गया था। इस आयोजन की सफलता को देखते हुए संयुक्त राष्ट्र ने हर साल इसे मनाने की शुरुआत की। इसके बाद, दिसंबर 1990 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने एक प्रस्ताव पारित कर इस दिन को आधिकारिक रूप से मनाते रहने का फैसला किया।
संयुक्त राष्ट्र द्वारा 1989 में स्थापित यह दिन, इस साल खास तौर पर युवाओं की आकांक्षाओं, उनकी शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और निर्णय लेने के अधिकार पर केंद्रित है। थीम है — “Realizing the hopes and aspirations of young people – today and for the future”। यानी आज और कल के लिए युवाओं की उम्मीदों को साकार करना। भारत के संदर्भ में यह दिन महज आंकड़ों का जश्न नहीं है। यह एक गंभीर आत्मचिंतन का क्षण है। देश की आबादी अब 147 करोड़ के आसपास पहुंच चुकी है। हर छठा इंसान दुनिया का भारतीय है। 2023 में चीन को पीछे छोड़कर भारत विश्व का सबसे अधिक आबादी वाला देश बन चुका है और संयुक्त राष्ट्र के विश्व जनसंख्या परिदृश्य 2024 के अनुसार यह स्थिति पूरे 21वीं सदी तक बनी रहेगी। लेकिन सवाल यह नहीं है कि हम कितने हैं। सवाल यह है कि हम कितने सक्षम, शिक्षित, स्वस्थ और उत्पादक हैं।
आबादी की ऐतिहासिक यात्रा: स्वतंत्रता से आज तक
1947 में आजाद भारत की आबादी करीब 34 करोड़ थी। आज यह 147 करोड़ के पार है। स्वतंत्रता के तुरंत बाद नीति निर्माताओं ने महसूस किया कि तेजी से बढ़ती आबादी विकास की राह में बाधा बन सकती है। 1952 में भारत दुनिया का पहला देश बना जिसने राष्ट्रीय परिवार नियोजन कार्यक्रम शुरू किया।1960 और 70 के दशक में आबादी विस्फोट की चिंता क्षेत्रीय असमानता: दो भारत की कहानी
चरम पर पहुंची। 1971 की जनगणना के बाद 1976 में राष्ट्रीय जनसंख्या नीति घोषित हुई। लेकिन इतिहास का सबसे काला अध्याय आपातकाल (1975-77) का रहा। संजय गांधी के नेतृत्व में जबरन नसबंदी अभियान चला। 1976 में 62 लाख से ज्यादा नसबंदियां हुई। हजारों लोगों की जान गई। यह अभियान न सिर्फ मानवाधिकारों का हनन था, बल्कि परिवार नियोजन कार्यक्रम के प्रति जनता के विश्वास को भी गहरी चोट पहुंचाई।1977 में जनता पार्टी सरकार ने इसे “परिवार कल्याण कार्यक्रम” में बदल दिया और जबरदस्ती को पूरी तरह खारिज कर दिया। 2000 में राष्ट्रीय जनसंख्या नीति आई, जिसमें प्रजनन स्वास्थ्य, महिला सशक्तिकरण और अधिकार-आधारित दृष्टिकोण अपनाया गया। लक्ष्य था 2010 तक प्रतिस्थापन स्तर (2.1) तक प्रजनन दर लाना और 2045 तक आबादी स्थिर करना।
वर्तमान स्थिति: आंकड़े जो कहानी कहते हैं
NFHS-6 (2023-24) के अनुसार राष्ट्रीय कुल प्रजनन दर (TFR) 2.0 पर स्थिर है — प्रतिस्थापन स्तर के ठीक बराबर या थोड़ा नीचे। कुछ रिपोर्ट्स (SRS 2024) में इसे 1.9 बताया गया है। बिहार में अभी भी 2.9 के आसपास है, जबकि तमिलनाडु, केरल, दिल्ली, पश्चिम बंगाल जैसे राज्य 1.3-1.6 के स्तर पर पहुंच चुका है। ग्रामीण-शहरी अंतर भी कम हो रहा है। शहरी भारत में TFR 1.6 के आसपास है, जबकि ग्रामीण में पहली बार 2.1 के करीब पहुंचा है। गर्भनिरोधक उपयोग दर 69.1% तक पहुंच गई है। 20-24 वर्ष की महिलाओं में बाल विवाह 20.1% रह गया (2005-06 में 47.4% था)। संस्थागत प्रसव 90% से ऊपर, पूर्ण टीकाकरण 87% के आसपास। फिर भी 2.4 करोड़ महिलाओं को परिवार नियोजन की जरूरत पूरी नहीं हो पा रही है।आबादी की गति धीमी पड़ रही है, लेकिन “जनसंख्या गति” (population momentum) के कारण आबादी अभी भी बढ़ रही है। संयुक्त राष्ट्र के अनुमान के अनुसार भारत की आबादी 2060 के दशक की शुरुआत में करीब 170 करोड़ के शिखर पर पहुंचेगी, उसके बाद धीरे-धीरे घटकर 2100 तक 150 करोड़ के आसपास आ जाएगी। फिर भी भारत आबादी के आधार पर विश्व का सबसे बड़ा देश बना रहेगा।
क्षेत्रीय असमानता: दो भारत की कहानी
उत्तर भारत (बिहार, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश) अभी भी युवा और तेजी से बढ़ती आबादी वाला क्षेत्र है। दक्षिण भारत (केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तेलंगाना) पहले ही निम्न प्रजनन दर वाले चरण में पहुंच चुका है। यह असमानता भविष्य में गंभीर राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक चुनौतियां पैदा कर सकती है। उत्तर से दक्षिण की ओर पलायन बढ़ेगा। दक्षिणी राज्य वृद्धाश्रम और स्वास्थ्य सेवाओं पर बोझ महसूस करेंगे, जबकि उत्तरी राज्य रोजगार और शिक्षा की मांग से जूझेंगे। सरकार को “एक आकार सभी के लिए” वाली नीति छोड़कर क्षेत्र-विशिष्ट रणनीति अपनानी होगी। महिलाओं के बीच शिक्षा का प्रसार जनसंख्या नियंत्रण के लिए कारगर हथियार के तौर पर स्वीकार किया गया है। मैट्रिक पास महिला और ग्रैजुएट महिला के बीच प्रजनन दर में अंतर साफ दिखता है।
जनसांख्यिकीय लाभांश: अवसर की संकीर्ण खिड़की
भारत की औसत आयु करीब 28 वर्ष है — विश्व के प्रमुख देशों में सबसे कम। कार्यशील आयु वर्ग (15-64) की हिस्सेदारी अभी भी बढ़ रही है। यह “जनसांख्यिकीय लाभांश” (demographic dividend) का दौर है।लेकिन यह लाभांश स्थायी नहीं है। विशेषज्ञों के अनुसार यह खिड़की 2035-2040 तक चरम पर होगी और उसके बाद बंद होने लगेगी। 2050 तक 60+ आयु वर्ग की आबादी बच्चों की संख्या से ज्यादा हो जाएगी। निर्भरता अनुपात (dependency ratio) 70 साल बाद पहली बार बढ़ने लगेगा। लाभांश को वास्तविकता बनाने के लिए तीन शर्तें जरूरी हैं:
1. गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और कौशल
2. उत्पादक रोजगार सृजन (हर साल 1-1.2 करोड़ गैर-कृषि रोजगार)
3. महिलाओं की कार्यबल भागीदारी में भारी वृद्धि
आज महिलाओं की श्रम बल भागीदारी बहुत कम है। अगर इसे बढ़ाया जाए तो आर्थिक वृद्धि दर में 1-2% तक की अतिरिक्त बढ़ोतरी संभव है।
चुनौतियां: सतह के नीचे की हकीकत
रोजगार संकट: सबसे बड़ी चुनौती। लाखों युवा हर साल श्रम बाजार में आ रहे हैं, लेकिन गुणवत्तापूर्ण रोजगार नहीं मिल पा रहे। कृषि में छिपी बेरोजगारी, असंगठित क्षेत्र की प्रधानता और कौशल-रोजगार का अंतराल चिंताजनक है।संसाधनों पर दबाव: पानी, बिजली, आवास, परिवहन, स्वास्थ्य और शिक्षा पर भारी बोझ। शहरीकरण तेज है, लेकिन नियोजित नहीं। झुग्गी झोपड़ी बढ़ रहे हैं। पर्यावरण और जलवायु पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है। अधिक आबादी का मतलब अधिक खपत, अधिक उत्सर्जन। सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल्स हासिल करना मुश्किल होगा अगर आबादी प्रबंधन सही दिशा में नहीं हुआ।
वृद्धाश्रम की तैयारी: अभी हम युवा हैं, लेकिन 2040 के बाद वृद्धों की संख्या तेजी से बढ़ेगी। पेंशन, स्वास्थ्य बीमा और वृद्धाश्रम जैसी व्यवस्थाएं अभी बहुत कमजोर हैं।
लिंग और सामाजिक मुद्दे: कहीं-कहीं अभी भी पुत्र-प्राथमिकता, बाल विवाह और महिलाओं के प्रजनन अधिकारों पर अंकुश है।
राजनीतिक वर्चस्व के लिए अक्सर बड़े राजनेता अपने लोगों से जनसंख्या बढ़ाने की अपील कर देते हैं। आने वाले समय में इस तरह की अपील देश पर जनसंख्या संबंधित बोझ बढ़ाने का महत्वपूर्ण कारक होगा।
सरकारी प्रयास और नीतिगत बदलाव
सरकार ने मिशन परिवार विकास, प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना, बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ, आयुष्मान भारत, स्किल इंडिया, स्टार्टअप इंडिया जैसे कई कार्यक्रम चलाए हैं। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (NFHS) के आंकड़े बताते हैं कि स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय सुधार हुआ है।लेकिन अभी भी “अंतिम व्यक्ति तक पहुंच” की समस्या बाकी है। गरीब, दलित, आदिवासी और मुस्लिम समुदायों में परिवार नियोजन सेवाओं की पहुंच कम है। युवाओं की अपेक्षा अब सिर्फ नौकरी तक सीमित नहीं है। खुले बाजार और ग्लोबल विश्व के मद्देनजर युवाओं को सिर्फ नौकरी नहीं, सम्मानजनक, उत्पादक और भविष्योन्मुखी रोजगार चाहिए। महिलाओं को कार्यस्थल पर सुरक्षित माहौल, मातृत्व अवकाश, क्रेच और लचीले काम के घंटे चाहिए।
भविष्य का परिदृश्य: 2047 और उसके बाद
2047 तक विकसित भारत का सपना तभी साकार होगा जब हम अपनी आबादी को बोझ नहीं, बल्कि ताकत बनाएंगे। अगर हम सही कदम उठाएं — शिक्षा-स्वास्थ्य में भारी निवेश, महिला सशक्तिकरण, कौशल विकास, औद्योगिक नीति में सुधार, क्षेत्रीय असमानता कम करना — तो भारत 21वीं सदी की सबसे बड़ी आर्थिक और सामाजिक शक्ति बन सकता है। अगर चूक गए तो जनसांख्यिकीय लाभांश “जनसांख्यिकीय बोझ” में बदल जाएगा। बेरोजगार युवाओं की भीड़, बढ़ती निर्भरता अनुपात, सामाजिक अशांति और आर्थिक ठहराव का खतरा मंडराएगा।
संतुलन और संवेदनशीलता की जरूरत
विश्व जनसंख्या दिवस हमें याद दिलाता है कि आबादी कोई समस्या नहीं, बल्कि एक जटिल वास्तविकता है। भारत ने पिछले सात दशकों में अद्भुत प्रगति की है — प्रजनन दर में भारी गिरावट, स्वास्थ्य सूचकांकों में सुधार, महिला साक्षरता में वृद्धि। अब समय है आगे की सोचने का। जरूरत है संतुलित, अधिकार-आधारित, क्षेत्र-संवेदनशील और भविष्योन्मुखी नीतियों की। जरूरत है सामाजिक रूप से जनसंख्या सुरक्षा की भी। अगर किसी वर्ग विशेष की जनसंख्या में बेतहसा इजाफा देखा जा रहा है तो ये एक नई समस्य़ा की ओर ईशारा कर रहा ङै। जरूरत है सरकार सतर्कता और सुझबूझ के साथ नीति तैयार करे। जरूरत है युवाओं को न सिर्फ सपने देखने का मौका देने की, बल्कि उन सपनों को पूरा करने के साधन उपलब्ध कराने की।आखिरकार, किसी भी देश की सबसे बड़ी संपत्ति उसकी आबादी नहीं, उसकी आबादी की क्षमता होती है।भारत के पास वह क्षमता है। सवाल यह है कि हम उसे कितनी जल्दी और कितनी प्रभावी ढंग से लागू करते हैं।
वरिष्ठ पत्रकार धीरेंद्र कुमार की रिपोर्ट