Sourabh Dwiwedi : 'छाती से बांधकर कोई कुछ नहीं ले जाता', मशहूर पत्रकार सौरभ द्विवेदी ने संपत्ति के साथ देह दान का भी किया ऐलान

Sourabh Dwiwedi : 'छाती से बांधकर कोई कुछ नहीं ले जाता', मशह

New Delhi : मशहूर पत्रकार और 'द लल्लनटॉप' के पूर्व संपादक सौरभ द्विवेदी ने एक अभूतपूर्व निर्णय लेते हुए अपनी पूरी चल-अचल संपत्ति समाज के नाम करने की घोषणा की है। माता प्रसाद पुस्तकालय के शुभारंभ समारोह के दौरान उन्होंने सार्वजनिक मंच से यह संकल्प लिया। इस भावुक पल में उन्होंने स्पष्ट किया कि वे और उनकी पत्नी गुंजन सांगवान ने मिलकर यह फैसला लिया है कि उनकी जीवन भर की कमाई अब उनके परिवार की नहीं, बल्कि समाज के कल्याण के लिए 'देश राग' ट्रस्ट की होगी।

देह दान का भी लिया संकल्प

संपत्ति दान करने के साथ-साथ सौरभ द्विवेदी ने अपनी देह (Body Donation) को भी राष्ट्र को समर्पित करने का संकल्प लिया है। उन्होंने मंच से कहा कि उनका शरीर और उनकी संपदा दोनों ही समाज की अमानत हैं। शास्त्रों के उद्धरण देते हुए उन्होंने भावुक स्वर में कहा कि "त्वदीयं वस्तु गोविन्द तुभ्यमेव समर्पये", यानी जो कुछ भी उनके पास है वह ईश्वर और समाज का ही है और वे इसे वापस सौंप रहे हैं।

बुंदेलखंड में 100 पुस्तकालयों का लक्ष्य

सौरभ द्विवेदी ने इस दौरान अपनी भविष्य की योजनाओं को भी साझा किया। उन्होंने बताया कि 'देश राग' संस्था के माध्यम से उनका लक्ष्य बुंदेलखंड के पिछड़े इलाकों में कम से कम 100 आधुनिक पुस्तकालयों का निर्माण करना है। वे इन पुस्तकालयों को केवल किताबों का संग्रह नहीं, बल्कि गांव और पंचायतों का 'शक्ति केंद्र' बनाना चाहते हैं, जहां युवाओं को आगे बढ़ने और सीखने के समान अवसर मिल सकें।

'कुछ साथ नहीं जाना' का दिया संदेश

अपने संबोधन में उन्होंने जीवन की नश्वरता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि कोई भी व्यक्ति अपनी संपत्ति को "छाती से बांधकर" ऊपर नहीं ले जा सकता। जो कुछ भी हमने यहाँ कमाया है, वह यहीं खर्च होकर जाना चाहिए। उन्होंने अपनी पत्नी को अपना उस्ताद, गुरु और मित्र बताते हुए कहा कि इस बड़े निर्णय में उनकी सहमति और साथ सबसे महत्वपूर्ण रहा है।

अभयारण्य के रूप में विकसित होंगे केंद्र

सौरभ द्विवेदी ने पुस्तकालयों को 'अभयारण्य' के रूप में परिभाषित किया, जहां किसी को भी किसी प्रकार का भय न हो। उन्होंने कहा कि उनका उद्देश्य समाज को एक ऐसा सुरक्षित और ज्ञानवर्धक माहौल देना है जहां प्रतिभाएं बिना किसी बाधा के फल-फूल सकें। उनके इस बड़े त्याग और परोपकारी कदम की सोशल मीडिया और पत्रकारिता जगत में व्यापक प्रशंसा हो रही है और इसे समाज सेवा की एक मिसाल के रूप में देखा जा रहा है।