वीकेंड पर सिर्फ आराम पड़ सकता है भारी, घंटों बैठने से पैरों में जम सकता है खून का थक्का, डॉक्टर ने दी ये गंभीर चेतावनी, नजरअंदाज करना पड़ सकता है भारी
Health News: आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में लाखों लोग सोमवार से शुक्रवार तक 8 से 10 घंटे या उससे भी अधिक समय काम करते हैं और सप्ताहिक अवकास के दिन आरोम, लेकिन ये भारी पड़ सकता है....
Health News: आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में लाखों लोग सोमवार से शुक्रवार तक 8 से 10 घंटे या उससे भी अधिक समय कंप्यूटर के सामने बैठकर काम करते हैं। इसके बाद जब वीकेंड आता है तो अधिकांश लोग थकान मिटाने के लिए पूरा दिन बिस्तर या सोफे पर बिताना पसंद करते हैं। हालांकि यह आदत आरामदायक जरूर लगती है, लेकिन हृदय एवं रक्तवाहिका विशेषज्ञों का कहना है कि लंबे समय तक बैठे रहना और फिर लगातार शारीरिक गतिविधि से दूर रहना शरीर में ब्लड क्लॉट (खून का थक्का) बनने का खतरा बढ़ा सकता है।
पटना के आईजीआईएमएस के कार्डियोवैस्कुलर विशेषज्ञ डॉ. रोहित उपाध्याय के अनुसार, शरीर में रक्त का लगातार प्रवाह बेहद जरूरी है। पैरों की मांसपेशियां चलते-फिरते समय खून को वापस दिल तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। लेकिन जब कोई व्यक्ति कई घंटों तक लगातार बैठा रहता है, तो पैरों की नसों में रक्त का प्रवाह धीमा पड़ जाता है। यदि यही स्थिति पूरे सप्ताह बनी रहे और वीकेंड पर भी शरीर सक्रिय न रहे, तो नसों में खून जमा होने लगता है। इससे डीप वेन थ्रोम्बोसिस (डीवीटी) यानी पैरों की गहरी नसों में खून का थक्का बनने का खतरा बढ़ जाता है।
डॉ. उपाध्याय बताते हैं कि यह समस्या अब केवल बुजुर्गों तक सीमित नहीं रही। पिछले कुछ वर्षों में कम उम्र के नौकरीपेशा युवाओं में भी डीवीटी के मामले तेजी से बढ़े हैं। लंबे समय तक डेस्क पर बैठकर काम करना, घर लौटने के बाद भी मोबाइल या लैपटॉप के सामने समय बिताना और वीकेंड पर भी शारीरिक गतिविधि से दूरी बनाए रखना रक्त संचार प्रणाली पर लगातार दबाव डालता है। यदि इसके साथ मोटापा, धूम्रपान, मधुमेह, कैंसर, हार्मोनल दवाओं का सेवन, गर्भावस्था, हाल की सर्जरी या परिवार में ब्लड क्लॉट का इतिहास हो, तो खतरा कई गुना बढ़ सकता है।
डीवीटी की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि शुरुआती दौर में इसके लक्षण अक्सर हल्के होते हैं या कई बार दिखाई ही नहीं देते। कुछ लोगों में एक पैर में सूजन, दर्द, भारीपन, त्वचा का गर्म महसूस होना या लालिमा जैसे संकेत दिखाई देते हैं। सबसे गंभीर स्थिति तब होती है, जब यह थक्का टूटकर फेफड़ों तक पहुंच जाता है। इसे पल्मोनरी एम्बोलिज्म कहा जाता है, जिससे अचानक सांस फूलना, सीने में तेज दर्द, दिल की धड़कन बढ़ना, खांसी में खून आना और गंभीर मामलों में जान का खतरा भी पैदा हो सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि इससे बचाव का सबसे आसान तरीका पूरे सप्ताह शरीर को सक्रिय रखना है। लगातार 45 से 60 मिनट तक बैठने के बजाय बीच-बीच में उठकर कुछ मिनट टहलें, पैरों की स्ट्रेचिंग करें, सीढ़ियां चढ़ें और पर्याप्त मात्रा में पानी पीएं। वीकेंड को केवल आराम का दिन बनाने के बजाय तेज चाल से चलना, साइकिल चलाना, तैराकी, योग या अन्य हल्की-फुल्की शारीरिक गतिविधियों के लिए भी समय निकालें। डॉक्टरों के अनुसार, पूरे सप्ताह निष्क्रिय रहने के बाद केवल एक-दो दिन भारी व्यायाम करना पर्याप्त नहीं होता, बल्कि रोजाना नियमित गतिविधि ही स्वस्थ रक्त संचार और बेहतर सेहत की कुंजी है।