जानिए कोरोना और बाढ़ के बीच होने वाले बिहार चुनाव में किसका पलड़ा भारी, किसका हल्का और क्यों?

जानिए कोरोना और बाढ़ के बीच होने वाले बिहार चुनाव में किसका पलड़ा भारी, किसका हल्का और क्यों?

DESK:बिहार विधानसभा चुनाव की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है. हमेशा की तरह इस चुनाव से जनता और तमाम सियासी पार्टियों को बहुत उम्मीदें हैं. जनता की उम्मीद बिहार की तक़दीर-तस्वीर बदलने की और सियासतदानों की अपनी सियासत चमकाने की. इन तमाम बातों से परे इस बार का विधानसभा चुनाव कई मायनों में ख़ास होने जा रहा है. सबसे बड़ी बात ये है कि पिछली विधानसभा चुनाव की तस्वीर और इस विधानसभा चुनाव की तस्वीर बहुत बदल गयी है. सबसे बड़ा बदलाव गठबंधन की अदला-बदली. जैसा कि आपको पता है बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार महागठबंधन से अपनी गाँठ खोलकर फिर NDA में शामिल हो गए, यानी विरोधी अब साथी हैं और साथी विरोधी. बिहार चुनाव इस बार बिहार के लिए क्या देश के लिए भी नीरस चुनाव होने जा रहा है. वजह है, चारा घोटाला मामले में सज़ायाफ्ता लालू प्रसाद यादव का चुनाव से दूर होना. नतीजतन इस चुनाव में मोर्चा संभाल रखा है उनके छोटे बेटे और राजनीतिक उत्तराधिकारी तेजस्वी यादव ने. इन सबके बावजूद बिहार चुनाव के बाबत कहा जा सकता है, "ये चुनाव नहीं आसां, बस इतना समझ लीजे, कई चुनौतियां हैं और पार पा कर जाना है." जी हां, कई चुनौतियां हैं और उन चुनातियों में सबसे बड़ी चुनौती इस चुनाव का कोरोना और बाढ़ के बीच होना.


अब सवाल ये है कि इस बात से किसे फायदा और किसे नुकसान पहुंचने जा रहा है. ज़ाहिर तौर पर कोरोनाकाल में जो भयावहता और सरकारी संवेदनहीनता की तस्वीर देश और दुनिया ने देखी वो भूले नहीं भुलाई जा सकतीं. रही बात बाढ़ की, तो बाढ़ मानों बिहार की नियती बन गयी है. हर बार बिहार के लोग ख़ून-पसीने की कमाई से, पाई-पाई जोड़कर अपना आशियाना बनाते हैं हर बाढ़ उन्हें बेघर कर जाती है. फसलों को रौंद जाती है, बहा ले जाती है और छोड़ जाती है बाढ़ पीड़ितों को टूटे घर, फूटी क़िस्मत और नेताओं के आश्वासन, "ऊंट के मुंह में जीरा का फोरन" वाली सहायता राशि के साथ.


ख़ैर इन दोनों समस्याओं को विस्तार से समझा जाये तो कोरोनाकाल में निसंदेह NDA और उसमें भी सबसे ज़्यादा नीतीश कुमार की ज़बरदस्त किरकिरी हुई.

1)  कोरोना वायरस और लॉकडाउन की वजह से काम-काज ठप पड़ जाने पर प्रवासी मज़दूरों को पैदल ही घर आना पड़ा, जिससे उन्हें वर्तमान सरकार को लेकर आक्रोश भरा हुआ है. क्योंकि केंद्र और प्रदेश दोनों में NDA सरकार है, इससे NDA सरकार को ही नुकसान होता दिख रहा.


2) वैसे भी कोरोना के कारण शहरी इलाकों में वोटिंग कम होने की संभावना है, जहां पर NDA के कोर वोटर्स हैं. हमनें हर बार देखा है कि लोकतंत्र के महापर्व में ग्रामीण मतदाता हर बार बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते हैं तो वो इस बार भी हमेशा की तरह ही वोटिंग कर सकते हैं. साथ ही RJD का दावा रहता है कि ग्रामीण वोट उसका है. इसलिए उम्मीद की जा सकती है कोरोना फैक्टर महागठबंधन को मजबूत कर रहा है.

3) इस वैश्विक महामारी के दरम्यान हमनें छात्रों की एक अलग पीड़ा देखी और वो पीड़ा थी छात्रों का इस कोरोना संकट के बीच उनका अलग-अलग राज्यों में फंसे होना. राजस्थान का कोटा , जहां सबसे ज़्यादा बिहार के छात्र पढाई करते हैं, उनकी घरवापसी को लेकर नीतीश सरकार ने अजीबो-गरीब रवैया दिखाया. तमाम BJP शाषित प्रदेश में सरकार की तरफ से बच्चों को उनके घर भेजने के लिए हर मुमकिन और महफूज़ कोशिश की जा रही थी लेकिन बिहार सरकार के मुखिया लॉकडाउन के गाइडलाइन्स फॉलो करने की अपील करने में लगे थे. नतीजतन छात्रों यानी युवाओं और उनके माता-पिता के मन में भी घोर आक्रोश है. हो सकता है ये गुस्सा बिहार विधानसभा चुनाव के परिणाम में भी देखने को मिले.

अब बात की जाय बाढ़ की तो, जल प्रलय हर साल उत्तर बिहार को तबाह करता है, लेकिन कुछ इसे दैवीय आपदा तो कुछ सरकार की नाकामी बताते हैं. बाढ़ बड़ा राजनीतिक मुद्दा बिहार में तो नहीं ही बन सकेगा. क्योंकि ये दंश बिहार दशकों से झेल रहा है. फिर भी बिहार के कई ज़िलों ख़ास कर राजधानी पटना में हुए जलजमाव की तस्वीरें शायद ही कोई भुला पाए. और इस बार भी सूबे के क़रीब 80 लाख से ज़्यादा लोग बाढ़ से प्रभावित हैं लेकिन परिवर्तन जैसा कुछ अब तक तो न दिखा. हो सकता है इस चुनाव जलप्रलय NDA को मुश्किल में डाल दे.

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