हिन्दी पट्टी राज्यों में पार्टी को मजबूत करने के लिए भाकपा माले की बड़ी तैयारी, पटना में करने जा रही राष्ट्रीय महाधिवेशन, नीतीश-तेजस्वी को भी निमंत्रण

हिन्दी पट्टी राज्यों में पार्टी को मजबूत करने के लिए भाकपा माले की बड़ी तैयारी, पटना में करने जा रही राष्ट्रीय महाधिवेशन, नीतीश-तेजस्वी को भी निमंत्रण

PATNA : भाकपा माले हर पांच साल के अंतराल पर अपने राष्ट्रीय महाधिवेशन का आयोजन करता है। पिछली बार यह यह आयोजन पंजाब के मानसा में किया गया था। इस बार महाधिवेशन के लिए बिहार के पटना में आयोजित होने जा रहा है। माले के 11वें राष्ट्रीय महाधिवेशन के बारे में विस्तार से बताएं कि 15 से 20 फरवरी को यह आयोजन पटना के एसकेएम हॉल मे होगा। अधिवेशन के पहले दिन पटना के गांधी मैदान में एक विशाल रैली का आयोजन किय गया है।  16 फरवरी को महाधिवेशन का उद्घाटन होगा। इसके लिए देश भर की विभिन्न कम्युनिस्ट पर्टियों को आमंत्रण भेजा गया है जिससे कई बड़े नेता आएंगे।  वहीं इनके अलावा हिंदी पट्टी राज्यों के बीजेपी विरोधी नेताओं को भी इस अधिवेशन  के लिए निमंत्रण भेजा गया है।

माले पोलित ब्यूरो के सदस्य धीरेन्द्र झा ने बताया कि  हिंदुस्तान की साझी विरासत पर जो बड़ा खतरा है, उसके खिलाफ गांधी मैदान में रैली होगी और भाजपा और फासीवाद के खिलाफ नए आंदोलन का शंखनाद किया जाएगा। इससे भाजपा के खिलाफ देश भर में जो गोलबंदी हो रही है वह ताकतवर होगी। महाधिवेशन में देश भर की विभिन्न कम्युनिस्ट पार्टियों के बड़े नेता शामिल हो रहे हैं। इसमें वामपंथी आंदोलन को मजबूत करने की कार्ययोजना बनायी जाएगी। फासीवाद को रोकने में वामपंथ की भूमिका तय की जाएगी। राष्ट्रीय के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों पर भी चर्चा होगी। ब्राजील में लेफ्ट की जीत हुई है, पड़ोसी देश नेपाल में लेफ्ट फिर से सत्ता के केन्द्र में आया है। एशिया के अन्य देशों में भी वामपंथी आंदोलन मजबूत हो रहा है।

नीतीश तेजस्वी को भी निमंत्रण

कहा कि 18 फरवरी के पॉलिटिकल सत्र में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव, झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को आमंत्रण दिया जा रहा है। इन नेताओं के साथ मीटिंग कर हिंदी पट्टी में भाजपा की नफरत की राजनीति को रोकने की रणनीति बनायी जाएगी।

बिहार के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह महाधिवेशन

इस बार बिहार को इस भव्य आयोजन के लिए क्यों चुना गया है? इसके बड़े राजनीतिक कारण हैं। माले का मानना है कि नरेन्द्र मोदी या बीजेपी के अश्वमेघ घोड़े को पूरी ताकत से बिहार ने रोका है। नीतीश-तेजस्वी की सरकार को माले ने इसलिए अपना समर्थन भी दिया है, जबकि माले राज्य सरकार के मंत्रिमंडल में शामिल नहीं है।  बताया जा रहा है कि जिस तरह बिहार में माले ने विधानसभा चुनाव में प्रदर्शन किया,उसके बाद भाकपा-माले के हिन्दी पट्टी वाले राज्यों में अपनी जड़ को फिर फिर मजबूत करने की उम्मीद नजर आई है। अगले साल लोकसभा का चुनाव है और वर्ष 2025 में विधान सभा का। सभी पार्टियां इसको लेकर किसी न किसी तरह से तैयारी शुरू कर दी है। ऐसे में माले ने भी बिहार में  खुद  को और मजबूत करने की ओर देख रही है। महाधिवेशन के साथ - साथ भाकपा माले के उम्मीद है कि वह इसमें कामयाब होंगे।

33 साल पहले बना था कोई सांसद

देखा जाए तो अभी विधानसभा में माले के 19 विधायक हैं,  लेकिन संसद में बिहार में स्थिति बेहद ही खराब रही  है। अंतिम बार 1989 में आईपीएफ (इंडियन पीपुल्स फ्रंट) से रामेश्वर प्रसाद आरा संसदीय क्षेत्र से 1,78211 वोट पाकर चुनाव जीते थे। बाद में आईपीएफ भाकपा माले में बदल गई। इनको छोड़ आज तक माले से कोई नेता लोकसभा चुनाव नहीं जीत सका है। माले का प्रभाव बिहार के जिन लोकसभा क्षेत्रों में रहा है वह आरा के साथ-साथ जहानाबाद, पाटलिपुत्रा, सीवान और काराकाट है। माले का महाधिवेशन उसे आगामी लोकसभा चुनाव के साथ ही विधान सभा चुनाव में भी मजबूती देगा इसकी उम्मीद माले नेताओं को भी है।

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