बिहार में राष्ट्रवाद की अलख जगाए रखेगी बीजेपी, अब मुखर्जी बलिदान दिवस के सहारे कश्मीर मुद्दा भुनाने की कोशिश

बिहार में राष्ट्रवाद की अलख जगाए रखेगी बीजेपी, अब मुखर्जी बलिदान दिवस के सहारे कश्मीर मुद्दा भुनाने की कोशिश

PATNA : लोकसभा चुनाव में मिली बड़ी जीत के बाद बीजेपी बिहार में होने वाली विधानसभा चुनाव की तैयारी में जुट गयी है। इस बार के लोकसभा चुनाव में बीजेपी जिस तरीके से देशभक्ति का अलख जगाने में कामयाब हुई है पार्टी उसे अगले विधानसभा चुनाव तक बरकरार रखना चाहती है।

इसको लेकर बीजेपी नेतृत्व अभी से रणनीति बनाने में जुटी है। भाजपा इस बार पूरे बिहार में श्यामा प्रसाद मुखर्जी का बलिदान दिवस मनाने की तैयारी कर रही है। बताया जाता है कि पार्टी नेतृत्व ने इस बार निर्णय लिया है कि श्यामा प्रसाद मुखर्जी का बलिदान दिवस शक्ति केंद्र स्तर तक मने। ताकि बीजेपी की कश्मीर को लेकर प्रतिबद्धता के बारे में लोग जान सकें।

बताया जाता है कि पार्टी इस सोच के साथ आगे बढ़ रही है कि हमें  निचले स्तर पर श्यामा प्रसाद मुखर्जी के बलिदान दिवस मनाना है। ताकि लोग जान सकें कि हमारा कश्मीर से कितना लगाव है।निचले स्तर तक बलिदान दिवस आयोजित कर कश्मीर इश्यू को बिहार में जिंदा करने की कोशिश है।

बिहार में 10 हजार शक्ति केंद्र

बीजेपी ने बिहार में करीब 10 हजार शक्ति केंद्र बनाए हैं। इस बार पार्टी का निर्णय है कि सभी शक्ति केंद्रों पर 23 जून को बलिदान दिवस मनाई जाए। इसके माध्यम से लोगों को यह बताया जाए कि कश्मीर मुद्दा को हम छोड़ने वाले नही हैं। कश्मीर को लेकर हमारे संस्थापक सदस्य डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का संकल्प था और उसको लेकर उन्होंने बलिदान दिया था। लिहाजा हम उसे यूं हीं जाया नहीं होने देंगे।

क्यों महत्वपूर्ण है मुखर्जी बलिदान दिवस

डॉ॰ मुखर्जी जम्मू-कश्मीर को भारत का पूर्ण और अभिन्न अंग बनाना चाहते थे। उस समय जम्मू कश्मीर का अलग  झंडा और अलग  संविधान था। वहाँ का मुख्यमन्त्री (वजीरे-आज़म) अर्थात्  प्रधानमंत्री कहलाता था। संसद में अपने भाषण में डॉ॰ मुखर्जी ने धारा-370 को समाप्त करने की भी जोरदार वकालत की। अगस्त 1952 में जम्मू की विशाल रैली में उन्होंने अपना संकल्प व्यक्त किया था कि या तो मैं आपको भारतीय संविधान प्राप्त कराऊँगा या फिर इस उद्देश्य की पूर्ति के लिये अपना जीवन बलिदान कर दूँगा। उन्होंने तात्कालिन नेहरू सरकार को चुनौती दी तथा अपने दृढ़ निश्चय पर अटल रहे। अपने संकल्प को पूरा करने के लिये वे 1953 में बिना परमिट लिये जम्मू कश्मीर की यात्रा पर निकल पड़े। वहां पहुँचते ही उन्हें गिरफ्तार कर नज़रबन्द कर लिया गया। 23 जून 1953 को रहस्यमय परिस्थितियों में उनकी मृत्यु हो गयी थी।

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