BJP के आसमानी नेता 'जाति' के नाम पर पहुंच गए रास, नेतृत्व के सामने बनते हैं समाज के 'ठेकेदार' जमीन पर हैं लाचार...

BJP के आसमानी नेता 'जाति' के नाम पर पहुंच गए रास, नेतृत्व के सामने बनते हैं समाज के 'ठेकेदार' जमीन पर हैं लाचार...

PATNA: बिहार में चुनाव का पहला चरण संपन्न हो गया है। चुनाव प्रचार में बड़े-बड़े नेता उतर रहे हैं। दलों की तरफ से जातीय गोलबंदी की भी पूरी कोशिश की जा रही है। जाति की बदौलत कुर्सी पाने वाले नेताओं की इन दिनों पूछ बढ़ गई है। भले ही जमीन पर उनका कोई वजूद नहीं हो,लेकिन डील-डॉल ऐसा मानो वे ही उस जाति के स्वयंभू हों,भले ही जमीन पर उनकी स्थिति समाज का एक वोट भी पक्ष में ट्रांसफऱ कराने की नहीं हो।आज  हम एक ऐसा ही जाति आधारित नेता की बात कर रहे हैं। 

अपने आप को समाज का स्वयंभू बताने की कोशिश

इन दिनों बीजेपी के आसमानी नेता जाति के नाम पर जमकर लुफ्त उठा रहे हैं। नेतृत्व के समक्ष समाज का स्वयंभू बताने वाले नेता की जमीनी हकीकत कुछ और साबित हो रही है। बिहार में बुधवार को पहले फेज का चुनाव चल रहा था,जिस इलाकों में पहले फेज का मतदान था उससे 30 किमी की दूसरी पर पार्टी के बड़े नेता का कार्यक्रम था। वहां पर समाज के स्वयंभू बताने वाले नेता और नेता पुत्र को भी मंच पर जगह दी गई थी।समाज के ठेकेदार के नाम पर पिता और पुत्र अगली पंक्ति में दायें और बायें अँतिम छोर पर जगह बना लिये. समाज का ठेकादार बन मंच पर वे जगह तो बना लिये लेकिन एक वोट भी भाजपा के पक्ष में कराने में सफल नहीं हुए।


समाज का एक वोट भी बीजेपी को नहीं दिला सके 

बीजेपी नेतृत्व ने शायद यह समझा होगा कि मंच पर पिता-पुत्र को जगह देकर यह बता देंगे कि समाज के इन कथित धरोहरों को पार्टी खूब सम्मान दे रही है। इसीलिए बड़े नेता के मंच पर पिता और पुत्र को जगह दी गई। इसके माध्यम से क्षेत्र में मैसेज दिया गया,भाजपा ''फलां'' जाति को खूब सम्मान दे रही है। मकसद था,इसका लाभ बीजेपी प्रत्याशी को मिले,लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ.जिस जगह पर कभी पिता विधायक हुआ करते थे उस सीट पर भी बीजेपी प्रत्याशी को पिता-पुत्र की जाति वाला वोट नहीं मिला। बताया जाता है कि उस जाति का अधिकांश वोट एक निर्दलीय प्रत्याशी के पक्ष में चला गया और उसी जिले के एक और विधानसभा क्षेत्र में झोंपड़ी में उनके समाज के आधे से अधिक लोगों ने वोट कर दिया। यानि पिता-पुत्र जिस समाज के नाम पर अपनी राजनीति चमका रहे थे और अपने आप को स्वयंभू नेता साबित कर मंच पर कब्जा जमाए थे,उसी समाज ने इस बार गच्चा दे दिया.यानि की पिता-पुत्र को अपने समाज के लोगों ने खारिज कर दिया। 

समाज के नाम पर चल रही दुकान

दरअसल पिता-पिता की समाज के नाम पर दुकान चल रही है। मुंह पर भले ही समाज का नाम हो लेकिन पूरी कोशिश होती है कि फायदा घऱ में रह जाए। इसी फार्मूले के तहत पिता जब रिटायर हो रहे थे तो फायदा समाज का कोई दूसरा व्यक्ति न उठा ले लिहाजा पूरी ताकत झोंक दी और बेटा को माननीय बनाकर ही दम लिया। बेटा को सेट कर बेचारे साहब निश्चिंत हो गए......।अब आसमानी बेटा उक्त समाज का कथित तौर पर नेता बन बैठे और एक बार फिर से नेतृत्व को चकमा दे रहे।लेकिन इस बार पहले फेज में आधार इलाके के वोटरों ने ही स्वयंभू नेता को पूरी तरह से खारिज कर दिया है। हालांकि समाज के स्वयंभू नेता भी निश्चिंत है, समाज में अब आफत आये या तुफान क्या मतलब....दुकान को चल ही रही है।




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