सुशासन राज में RTI से जानकारी मांगना है रिस्की,सूचना के बदले मिलती है 'मौत'...एक दशक में 17 एक्टिविस्ट गवां चुके हैं जान

सुशासन राज में RTI से जानकारी मांगना है रिस्की,सूचना के बदले मिलती है 'मौत'...एक दशक में 17 एक्टिविस्ट गवां चुके हैं जान

PATNA: बिहार के सुशासन राज में भ्रष्टाचार चरम पर है। अफसरशाही इस कदर हावी है कि बिना चढ़ावे के आम आदमी का कोई काम नहीं होता। नीतीश कुमार के  सुशासन राज में भ्रष्टाचार और अफसरशाही के बीच जनता पिस रही है। सरकार के हर विभाग में सरकारी कर्मी सीधे गलत काम कर रहे हैं फिर भी किसी की क्या मजाल जो सूचना के अधिकार के तहत जानकारी मांग ले। अगर किसी आरटीआई कार्यकर्ता ने सूचना के अधिकार के तहत जानकारी मांग भी ली तो उसकी खैर नहीं। सुशासन राज में सरकारी सिस्टम में फैली गड़बड़ी की अगर किसी ने जानकारी मांगी तो उल्टे उसे ही फंसाने की साजिश रची जाती है.इतना ही नहीं आरटीआई कार्यकर्ता की जान खतरे में पड़ जाती है। नीतीश राज में पिछले एक दशक में 17 से अधिक आरटीआई कार्यकर्ता अपनी जान गवां चुके हैं और न जाने कितने लोगों पर झुठे मुकदमें और जानलेवा हमले हुए।सुशासन की पुलिस ने किसी भी मामले में आरोपियों की स्पीडी ट्रायल चला सजा नहीं दिला सकी और न ही झुठे मुकदमे लिखवाने वाले लोगों पर कोई कार्रवाई कर सकी। अब एक बार फिर से बिहार सरकार ने सभी डीएम-एसपी को एडवाइजरी जारी कर आरटीआई कार्यकर्ताओं को प्रताड़ित करने वालों पर कार्रवाई करने को कहा है।

2010-2020 के बीच 17 RTI कार्यकर्ताओं की हत्या

बिहार की बात करें तो 2010 से लेकर अब तक 17 आरटीआई एक्टिविस्ट सूचना मांगने में अपनी जान गवां चुके हैं. 2010 में बेगूसराय में आरटीआई कार्यकर्ता शशिधर मिश्रा की हत्या हुई थी .उसके बाद 2011 में लखीसराय के आरटीआई कार्यकर्ता रामविलास सिंह की हत्या की गई. 2012  में ही मुंगेर के डॉक्टर मुरलीधर जायसवाल, 2012 में मुजफ्फरपुर में राहुल कुमार, भागलपुर के राजेश यादव की अपराधियों ने हत्या कर दी थी . 2013 में मुजफ्फरपुर में रामकुमार ठाकुर अधिवक्ता हत्या हुई थी. 2015 में पटना के सुरेंद्र शर्मा 2015 में ही बक्सर के पूर्व सैनिक गोपाल प्रसाद, मुजफ्फरपुर के जवाहर तिवारी की हत्या कर दी गई थी.  2017 में भोजपुर के मृत्युंजय सिंह की हत्या हुई थी. 2018 में सहरसा के आरटीआई कार्यकर्ता राहुल झा की हत्या हुई थी. 2018 में वैशाली के जयंत कुमार, मोतिहारी के राजेंद्र प्रसाद सिंह, जमुई के बाल्मीकि यादव, धर्मेंद्र यादव एवं बांका के भोला साह की हत्या कर दी गई। 2020 की अगर बात करें तो पटना के बिक्रम में पंकज कुमार सिंह एवं बेगूसराय के आरटीआई कार्यकर्ता श्यामसुंदर कुमार सिन्हा की हत्या की गई.


सरकार और आयोग दोनों हैं जिम्मेदार

बिहार के जाने-माने आरटीआई कार्यकर्ता शिवप्रकाश राय कहते हैं कि बिहार में सूचना के अधिकार के तहत जानकारी मांगने का मतलब है अपनी जान को जोखिम में डालना। 2010 से लेकर अब तक 17 आरटीआई कार्यकर्ताओं की हत्या कर दी गई । वहीं सैकड़ों लोगों पर फर्जी मुकदमें दर्ज किये गए ।कई आरटीआई कार्यकर्ताओं पर जानलेवा हमले हुए। लेकिन बिहार की पुलिस किसी मामले आरोपियों पर कोई कार्रवाई नहीं की गई। आरटीआई कार्यकर्ता शिवप्रकाश राय कहते हैं कि जिन साथियों की हत्या हुई उस मामले में आरोपियों को सजा दिलाने की मांग को लेकर उन्होंने तमाम वरीय अधिकारियों को पत्र भेजा लेकिन कोई कार्रवाई नहीं की गई। वे कहते हैं कि बिहार की सरकार और सूचना आयोग दोनों इसके लिए जिम्मेदार हैं.CM नीतीश कुमार की सुशासन वाली सरकार नहीं चाहती है कि उसकी नाकामी सार्वजनिक हो। लिहाजा आरटीआई कार्यकर्ताओं पर हो रहे हमले पर प्रशासन पूरी तरह से चुप हो जाता है.  

बिहार सरकार ने फिर से जारी किया एडवाइजरी

सरकार ने आरटीआई कार्यकर्ताओं को प्रताड़ित करने वालों पर कार्रवाई करने का आदेश जारी किया है. इस संबंध में सामान्य प्रशासन विभाग ने सभी विभागों के प्रधान सचिव, प्रमंडलीय आयुक्त, आईजी, डीएम-एसपी को पत्र भेजा है.पत्र में कहा गया है कि पूर्व में यह निर्देश दिया गया था कि सूचना के अधिकार के अंतर्गत सूचना मांगने वाले आवेदकों को दंड प्रक्रिया की धारा 107 के अंतर्गत फंसाने अथवा अन्य प्रकार से प्रताड़ित करने से संबंधित मामलों की जांच कराई जाएगी तथा दोषी पाए जाने वाले पदाधिकारियों एवं कर्मचारियों को कठोर सजा दी जाएगी. सूचना मांगने वाले व्यक्तियों का सम्मान करते हुए सूचना उपलब्ध कराने को कहा गया था। सूचना मांगने वालों को प्रताड़ित करने वालों कर्मियों-अधिकारियों को कार्रवाई का आदेश है। 


आरटीआई कार्यकर्ताओं को प्रताड़ित करने वालों पर लें एक्शन

सरकार ने अपने पत्र में कहा है कि सूचना के अधिकार कार्यकर्ताओं को प्रताड़ित किए जाने तथा उन पर हमला किए जाने के मामले प्रकाश में आ रहे हैं. इस संबंध में भारत सरकार के गृह मंत्रालय द्वारा गठित टास्क फोर्स द्वारा की गई सिफारिश को राज्य में लागू करने का निर्णय लिया गया है. इसके तहत आरटीआई कार्यकर्ता को अगर धमकाया जाता है अथवा उस पर हमला होता है तो सूचना के अधिकार अधिनियम 2005 की धारा 18 के तहत सूचना आयोग में एक शिकायत वाद दायर किया जाए. राज्य सूचना आयोग इस शिकायत पर संज्ञान ले सकता है और इस संबंध में आवश्यक जांच कर सकता है.अगर आरटीआई कार्यकर्ता पर हमला होता है तो शिकायत की जांच कर डीएम और एसपी कार्रवाई करें. 

डीएम-एसपी अनुपालन सुनिश्चित करें

पत्रमें कहा गया है कि आरटीआई कार्यकर्ताओं को मिलने वाली धमकी और हमले से संबंधित गंभीर मामलों को सिविल सोसायटी संज्ञान में लेते हुए राज्य अधिकारियों एवं राज्य सूचना आयोग के समक्ष रखें ताकि संबंधित संस्थाओं द्वारा ऐसे मामले में आवश्यक कार्रवाई की जा सके. सामान्य प्रशासन विभाग के सचिव हिमांशु कुमार राय डीएम और एसपी इसका अनुपालन सुनिश्चित करने को कहा है.

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