कोरोना के मरीज तड़प रहे हैं हुजूर ! पर आपके साहब लोग दर्जन भर अस्पतालों को अनुमति नहीं दे रहे,कारण जानिएगा तब कलेजा फट जाएगा

कोरोना के मरीज तड़प रहे हैं हुजूर ! पर आपके साहब लोग दर्जन भर अस्पतालों को अनुमति नहीं दे रहे,कारण जानिएगा तब कलेजा फट जाएगा

PATNA : कोरोना महामारी में साहेब होने का ईगो कायम है जबकि इन्हीं साहबों के साथ काम करने वाले समकक्ष अधिकारी कोरोना के शिकार हो चुके हैं। विडंबना देखिये जो बेचारे काल-कलवित हो गए उन्हें उपचार का सारा संसाधन मुहैया कराया गया। इसके वाबजूद कोरोना के क्रूर पंजों ने उन्हें अपना शिकार बना लिया। इतना कुछ देखने के बाद कुछ अधिकारियों की वेवजह ईगो की वजह से मरीजों को न बेड मिल रहा है न दवा न ऑक्सीजन। इसके लिए कोई एक अधिकारी दोषी नहीं है । पूरे सिस्टम से सड़ांध फूट रहा है उसके बावजूद भी नेता जी के नाक को दुर्गंध का अहसास तक नहीं हो रहा। पटना के श्मशान घाटों पर लाश जलने की नए रिकार्ड बन रहे हैं ,24 घण्टे चिताएं धधक रही हैं उतनी ही ज्वलनशील तरीके से साहब के कलेजे और हुजूर के दिमाग मे ईगो की आग भी धधक रही है। 

कोरोना मरीजों के आंकड़े साफ तौर पर छिपाए जा रहे हैं ऐसा नेता प्रतिपक्ष का आरोप है। जनता भी कह रही है। कोरोना के मरीज बेड और ऑक्सीजन के लिये तड़प रही है। इसमें भी कोई शक नहीं है। उसके बावजूद सिर्फ 90 अस्पतालों को साहेब लोग कोरोना इलाज कर लिये सूचीबद्ध कर सो गए हैं। कई अस्पतालों के द्वारा कोरोना इलाज करने के लिये आवेदन दिया जा चुका है। लेकिन उन्हें इसलिये अनुमति नहीं दी जा रही कि ऑक्सीजन का खपत बढ़ जाएगा। भला सोचिये की कैसे कैसे लोग हैं सड़क पर इलाज के लिये जनता भटक रही है तो दूसरी तरफ ऑक्सीजन की खपत का डर सता रहा है। क्या इसे सिस्टम का फेल करना नहीं कहा जायेगा ! 

सिस्टम इतना बेशर्म कैसे

ओह ,लोकतंत्र में लोक के पैसे से चल रहा सिस्टम इतना बेशर्म कैसे हो सकता है कि लोग ऑक्सीजन ,बेड व दवा के लिये तड़प तड़प कर मर जायें ! कह कर आई इस महामारी के सामने सरकारी सिस्टम के सरेंडर ने बिहार को तार-तार कर दिया है।

हे हुजूर कम से कम इसमें तो हस्तक्षेप कीजिये ताकि जो बचे हैं उनको बचाया जा सके।  एकतरफ 90 सूचिबद्ध अस्पतालों में बेड फूल है तो दूसरी तरफ 22 अस्पताल आवेदन देकर इलाज करने के लिये लाइन में खड़े हैं।  ऑक्सिजन की व्यवस्था कीजिये और इन अस्पतालों को अनुमति दीजिये ताकि लोगों को इलाज से महरूम न होना पड़े...

कौशलेन्द्र प्रियदर्शी के कलम से

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