BJP के कोर वोटरों की नाराजगी से पार्टी चिंतित,भूमिहारों के तथाकथित नेता विस चुनाव में नहीं हुए कामयाब,अब नेतृत्व किस पर करे भरोसा?

BJP के कोर वोटरों की नाराजगी से पार्टी चिंतित,भूमिहारों के तथाकथित नेता विस चुनाव में नहीं हुए कामयाब,अब नेतृत्व किस पर करे भरोसा?

पटनाः बिहार विधानसभा चुनाव समाप्त हो गया। बिहार में एनडीए की सरकार भी गिरते-पड़ते बन गयी है। आज स्थिति यह है कि अगर मुकेश साहनी की वीआईपी और जीतनराम मांझी का मन थोड़ा भी डोला तो सरकार का भी डोलना तय है। इसे देखते हुए हर पार्टी अपनी हार जीत की समीक्षा में जुटी हुई है। बीजेपी नेतृत्व इस बात से चिंतित है कि पार्टी का आधार वोट इस बार विखंडित हुआ है। जो वोटर पिछले तीस सालों से पार्टी के साथ जुड़े थे वे ही कन्नी कटाने लगे हैं. सिर्फ कन्नी ही नहीं कटा रहे बल्कि विरोधियों के पाले में जाने का मन बना चुके हैं. इस बार के विस चुनाव में भाजपा ने इसका परिणाम भी देख लिया और मगध-शाहाबाद इलाके में पार्टी पूरी तरीके से साफ हो गई। भूमिहार समाज के तथाकथित स्वंयभू नेता धाराशायी हो गए। 

बीजेपी के कोर वोटरों की नाराजगी से बीजेपी चिंतित

राजनीतिक जानकारों की माने तो बीजेपी नेतृत्व के सामने बड़ी चुनौती है। नेतृत्व इस बात को समझ भी रहा है। आखिर बीजेपी से कोर भूमिहार वोटर नाराज क्यों हैं। जानकार बताते हैं कि भाजपा ने आंतिरक सर्वे कराया उसमें भी यह बात सामने आई है कि आधार वोटरों ने इस बार पार्टी को गच्चा दिया।इसका सीधा नुकसान मगध-शाहाबाद के इलाके में हुई है।आखिर बीजेपी के कोर वोटर नाराज होकर सक्रिय भागीदारी की भूमिका क्यों नहीं निभाया? मगध इलाके में पार्टी पूरी तरह साफ हो गयी।  भूमिहारों की नाराजगी इस इलाके में इस कदर दिखी की पार्टी का बिहार में आत्मनिर्भर होने का सपना बुरी तरह बिखर गया। बिहार की सबसे बड़ी पार्टी बनने का ख्वाब भी बुरी तरह बिखर गया। 

बड़ा सवाल ,ऐसा क्यों हुआ

बड़ा सवाल यह कि, आखिर बीजेपी को भूमिहारों की नाराजगी का सामना क्यों करना पड़ा ।बताया जाता है कि बिहार में भूमिहार जाति के लोग तीन दशकों से बीजेपी के सबसे कट्टर और कोर वोटरों की श्रेणी में आते हैं. पार्टी का शीर्ष नेतृत्व भी इसे स्वीकार करती है.लेकिन इस बार मगध से लेकर शाहाबाद के कई विधानसभा क्षेत्रों में भूमिहारों ने महागठबंधन या लोजपा को वोट कर दिया। कई इलाकों में भूमिहार वोटरों ने कांग्रेस प्रत्याशी के पक्ष में वोट किया। नतीजा यह हुआ कि भाजपा कैंडिडेट को हार का सामना करना पड़ा। भाजपा में भूमिहार समाज के तथाकथित नेता अपने समाज के वोटरों को गोलबंद करने का दंभ बराबर भरते रहते हैं. लेकिन बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजों में यह दिखा दिया कि अधिकांश स्वयंभू नेता फेल कर गए। 

बिहार में भूमिहारों के बड़े नेता के तौर पर डॉ. सीपी ठाकुर का नाम सबसे पहले लिया जाता है। लेकिन बढ़ती उम्र के साथ घटती राजनीतिक सक्रियता ने भूमिहार वोटरों पर पकड़ को कमजोर कर दिया। परिणाम यह हुआ कि पटना से सटे भाजपा के नाक वाली सीट बिक्रम विधानसभा क्षेत्र में भी पार्टी का कैंडिडेट तीसरे स्थान पर पहुंच गया और वोट सिर्फ 15 हजार मिले। जबकि बिक्रम विधानसभा सीट में भूमिहार वोटरों की बड़ी संख्या है जो निर्णायक भूमिका अदा करती है। इसी तरह बिक्रम से सटे पालीगंज सीट को भी भूमिहार के तथाकथित नेता नहीं बचा पाये। हद तो तब हो गई जब वर्षों से भूमिहारों के पाले में रहने वाली पालीगंज सीट भी जेडीयू के खाते में चला गया। जिसे बचा पाने में तथाकथित स्वंयभू नेता नाकाम रहे। 

भूमिहारों के तथाकथित नेता नहीं हुए कामयाब

सीपी ठाकुर ने जिसे अपना उत्तराधिकारी बनाया वो भी असरदार साबित नहीं हुए। ठाकुर ने अपने बेटे विवेक ठाकुर को अपनी सीट से राज्यसभा भेजकर भूमिहारों का नेता साबित करने की कोशिश की। लेकिन वर्तमान परिस्थिति में आकलन के बाद नेतृत्व को ऐसा लग रहा कि ये भी कोई प्रभाव नहीं छोड़ पाये। केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह अपने संसदीय क्षेत्र बेगूसराय की एक सीट बचवाने में कामयाब तो हुए लेकिन बाकि की सीटें हाथ से निकल गई। बेगूसराय जिले में भूमिहार वोटरों ने लोजपा को वोट कर दिया। भूमिहार वोटरों की नाराजगी का असर हुआ कि बीजेपी का गढ़ कहे जाने वाले नवादा के हिसुआ विस सीट को भी गवां दिया.गिरिराज सिंह इससे पहले नवादा से ही चुनाव लड़कर पहली बार सांसद बने थे। भूमिहार जाति के होने की वजह से उन्हें पहली दफे नवादा और दूसरी दफा बेगूसराय से चुनाव लड़ाया गया।लेकिन ये भी भूमिहारो वोटरों को मनाने में कामयाब नहीं हो सके।

अरवल-ब्रह्मपुर सीट भी गई 

यही हाल शाहाबाद की कई सीटों पर रहा। शाहाबाद की एक सीट तरारी में बीजेपी उम्मीदवार को सिर्फ 13 हजार वोट से संतोष करना पड़ा। बक्सर की ब्रह्मपुर सीट जहां से विवेक ठाकुर भी किस्मत आजमा चुके हैं वहां के भूमिहार वोटरों ने एनडीए प्रत्याशी के पक्ष में वोट नहीं किया। कई अन्य सीटें भी बीजेपी के हाथ से निकल गई और बिहार में आत्म निर्भर होने का सपना धरा का धरा रह गया। 

मगध के कद्दावर नेता को बीजेपी ने किया नाराज

एक तरफ जिन भूमिहार नेताओं पर बीजेपी पर भरोसा किया वे टायं-टायं फिस्स साबित हो गए वहीं कुछ बड़े नेताओं को दरकिनार करना भी महंगा पड़ा। मगध के बड़े नेता पूर्व एमएलसी कृष्ण कुमार सिंह को बीजेपी ने हाशिये पर रखा। बुरे दौर में पार्टी को सिंचित करने वाले कृष्ण कुमार सिंह को पार्टी ने एक बार एमएलसी का झुनझुना थमाकर कायदे से दरकिनार कर दिया। दरकिनार किये जाने से खफा उनके समर्थकों ने उस दौरान जबरदस्त विरोध भी जताया था। हालांकि कृष्ण कुमार सिंह पार्टी के निष्ठावान कार्यकर्ता होने के नाते दल हित में काम करते रहे। कुछ हद तक वोटरों को मनाने में कामयाब रहे जिससे गया सीट पर भाजपा का कब्जा बरकरार रहा।

बीजेपी विधान पार्षद ने बचा ली नेतृत्व की प्रतिष्ठा

इसी तरह सारण इलाके में भी बीजेपी की इज्जत किसी किसी तरह बची। अमनौर से सीटिंग विधायक चोकर बाबा का टिकट नेतृत्व ने काट दिया। उनकी जगह मंटू सिंह को उम्मीदवार बनाया गया। चोकर बाबा निर्दलीय खड़े हो गए। वहां भी बीजेपी की प्रतिष्ठा दांव पर लग गई। चोकर बाबा का टिकट कटने से भूमिहार वोटर काफी नाराज थे। लेकिन बीजेपी विधानपार्षद सच्चिदानंद राय की मुहिम कामयाब हो गई और उन्होंने नाराज वोटरों को मना लिया। भूमिहार समाज के नाराज वोटरों ने अंततः बीजेपी प्रत्याशी के पक्ष में वोट कर दिया और इस तरह से पार्टी की इज्जत बच गई। जानकारों की मानें तो बीजेपी एमएलसी सच्चिदानंद राय लगातार सामाजिक कार्यों में लगे हैं. पहले उनकी पहचान बड़े कारोबारी के तौर पर थी लेकिन कुछ समय से समाज के उत्थान को लेकर जो प्रयास कर रहे उससे न सिर्फ सारण में बल्कि बिहार के भूमिहार-ब्राह्मण मतदाताओं के बीच अलग पहचान बनाने में कामयाब हुए हैं.  

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