देश के बच्चों को इस प्रकार से तराशें की वो हर पल अपने देश की प्रगति के बारे में सोचे : मुख्य न्यायाधीश

देश के बच्चों को इस प्रकार से तराशें की वो हर पल अपने देश की प्रगति के बारे में सोचे : मुख्य न्यायाधीश

GAYA : सम्पूर्ण देश और बिहार में विधिक जागरूकता शिविर के आयोजन के सिलसिले में शनिवार को 'बाल अधिकारों के संरक्षण के मौलिक सिद्धांत' विषयक विचार-गोष्ठी का आयोजन शिक्षाशास्त्र विभाग के राधाकृष्णन सभागार में किया गया। इसका आयोजन जिला विधिक सेवा प्राधिकार, गया एवं मगध विश्वविद्यालय, बोधगया के संयुक्त तत्त्वावधान में किया गया। कार्यक्रम का भव्य आरम्भ पटना उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश, सह न्यायाधीश, मगध विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. राजेन्द्र प्रसाद और अन्य गणमान्य अतिथियों द्वारा दीप प्रज्ज्वलन कर किया गया। विभिन्न न्यायिक अधिकारियों द्वारा मंचासीन अतिथियों को खादा, पुष्पगुच्छ व स्मृतिचिह्न देकर उनका स्वागत और अभिनंदन किया गया। स्वागत गीत 'स्वागत कि आप आये यहाँ' की सुमधुर प्रस्तुति शिक्षाशास्त्र विभाग की छात्राओं ने दी। राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकार (NALSA) द्वारा जारी कथानक गीत ‘न्याय सबके लिए’ की प्रस्तुति आभासी माध्यम से कार्यक्रम दी गई।

न्यायमूर्ति संजय करोल, मुख्य न्यायाधीश, पटना उच्च न्यायालय ने कहा कि सभी को अपने मूल कर्तव्य समझने होंगे. इस देश के बच्चों को इस प्रकार से तराशें कि वो हर पल अपने देश की प्रगति के बारे में सोचे। उन्होंने कहा कि राज्य के नीति निर्देशक तत्त्व और मूल कर्तव्य अधिक आवश्यक हैं। मूल अधिकार तो सभी के पास हैं। अपने कर्त्तव्य का एहसास होना बहुत ज़रूरी है, तभी देश की सच्ची प्रगति सम्भव है। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि बच्चों को त्यागे जाने से बचाना होगा और इस संबंध में नीति निर्देशक तत्त्वों पर सभी न्यायिक सहभागियों को ध्यान देना होगा। राज्य विधिक सेवा प्राधिकार के कार्यकारी अध्यक्ष न्यायमूर्ति अश्वनी कुमार सिंह ने कहा कि मैं पैरालीगल वालंटियर्स पर विशेष ध्यान देना चाहता हूँ। किशोर अपराध वयस्कों से अलग होते हैं। इसलिए उन्हें अलग सहानुभूति के साथ देखा जाना चाहिए। उन्होंने बाल न्याय सम्बन्धी 16 बिंदुओं को विस्तार से श्रोताओं के समक्ष रखा और न्यायिक अधिकारियों से बच्चों के प्रति सहानुभूति की अपील की। बाल संरक्षण अधिकार की दो श्रेणियां हैं। इनमें Presumption of innocence और Principle of dignity and worth सीधे अनुच्छेद 21 से अधिकार हासिल करते हैं। भागीदारी के सिद्धांत पर उन्होंने काफी जोर दिया, जिनमें बच्चों के विचार उतने ही महत्त्वपूर्ण माने जाते हैं।


न्यायमूर्ति आशुतोष कुमार, न्यायाधीश पटना उच्च न्यायालय ने कहा कि मैं कुलपति, मगध विवि के भाषण से काफी प्रभावित हुआ हूँ। बच्चों को मार्तण्ड की तप्त रश्मियों से बचाने की आवश्यकता है। उन्होंने बताया कि साहित्यिक भाषा में पहुंचाई गयी बातें जल्दी और गहराई से लोगों को प्रभावित करती हैं. उन्होंने निदा फ़ाज़ली को उध्दृत किया - ‘उन चिरागों को हवाओं से बचाया जाए, जिन चरागों को हवाओं का कोई खौफ नहीं’ मौलिक सिद्धांत का प्रचार प्रसार, जिस पर बच्चों के अधिकार अवलंबित हैं, बेहद आवश्यक है। उन्होंने कई उदहारण दिए, जैसे - इंग्लैंड की लेडी एग्लेंताइन जेब, बाल अधिकारों के संबंध में महत्त्वपूर्ण कार्यों के लिए जानी जाती हैं। ट्रफलगर स्क्वायर पर उनका अदम्य भाषण हुआ जिसके लिए उन्हे अर्थदण्ड की सजा दी गई। जज ने उनका जुर्माना भरा, जो बाल कल्याण के फंड में पहला साबित हुआ। बच्चों के प्रति सहानुभूति बहुत आवश्यक है। बच्चों के प्रति किए जाने वाले कार्यों, बनाए जाने वाले कानूनों में उनके सहभागिता होनी चाहिए। बच्चों के विचार लिए जाने चाहिए।

न्यायाधीश जितेन्द्र कुमार ने अपने वक्तव्य में कहा कि बाल विवाह कल्याण समिति का निर्माण बहुत महत्त्वपूर्ण साबित हुआ है। यह सभी धर्मों के लिए समान है। बाल विवाह बच्चों के विकास में एक बड़ी समस्या है इसलिए आज जागरूकता बढ़ाने की आवश्यकता है। जितेंद्र जी ने कहा कि पर्सनल लॉ में भले ही बाल विवाह की मान्यता हो, लेकिन अब 15 से 18 वर्ष आयु के बच्चे शादीशुदा या गैर शादीशुदा, यौन सम्बन्धों के मसले पर बलात्कार वृत्ति की श्रेणी में आयेंगे. उन्होंने कहा कि किशोर न्याय अधिनियम काफी व्यापक है। उन्होंने कहा कि कोई भी समाज अपने बच्चों को दंड देकर विकास नहीं कर सकता। यह आत्मविनाशक है। इसलिए सुधारात्मक उपायों पर जोर दिया जाना चाहिए।

न्यायाधीश राजीव रंजन ने अपने वक्तव्य में कहा कि आज के विभीषिकापूर्ण समय में बच्चों के साथ दुर्व्यवहार बढ़ रहे हैं, इसलिए इस प्रकार के विधिक जागरूकता शिविर की बेहद आवश्यकता है। यह महत्त्वपूर्ण है कि हिन्दी भाषा में विधिक जागरूकता का निर्णय लिया गया। खुशी कुमार बनाम बिहार राज्य निर्णय बहुत महत्त्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि नाबालिग अपराधी को बाल कल्याण समिति के सामने पेश किया जाना चाहिए, न कि रिमांड हेतु। POCSO कोर्ट, किशोर न्याय अधिकरण, पैरालीगल वालंटियर्स आदि का उचित इस्तेमाल आवश्यक है। नाबालिग अपराधी को गिरफ्तार करने से पहले आयु 18 या 19 तय करने की जल्दी नहीं दिखानी चाहिए। न्यायिक अधिकारियों को जल्दबाजी न दिखाकर किशोरों के पक्ष में न्याय की प्रक्रिया का ठीक से पालन करने पर ज़ोर देना चाहिए।

मगध विश्वविद्यालय के यशस्वी कुलपति प्रो. राजेन्द्र प्रसाद ने विषय प्रवर्तन करते हुए प्रो. राजेन्द्र प्रसाद ने कहा कि उनकी अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार क़ानून और अंतर्राष्ट्रीय शरणार्थी कानून में व्यक्तिगत रुचि है। बच्चों के जीवन पर इन कानूनों का सकारात्मक असर पड़ता है। उन्होंने अपने काव्य-संग्रह ‘ज़िन्दगी तेरे कितने रूप’ संग्रह से एक समीचीन कविता पढ़ी - ‘मैंने ज़िन्दगी को विविध रूपों में पलते देखा/कहीं सुबह की पहली किरण सी आभामंडित/तो कहीं शाम सी ढलती देखा/कहीं फुटपाथों पर सोते जागते बच्चे/कहीं लोगों को निर्विकार देखा।' प्रो. राजेन्द्र प्रसाद ने बताया कि साम्प्रदायिक, आतंकवादी अथवा अन्य हिंसक युद्धशील घटनाओं में वयस्कों की तुलना में बच्चे कहीं अधिक प्रभावित होते हैं। बालक हो या बालिका किसी के साथ भेदभाव न हो, यह अभिभावकों और राज्य की महत्त्वपूर्ण ज़िम्मेदारी है। शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के आयाम से बच्चों के विकास को मूल्यांकित किए जाने की आवश्यकता है।

कार्यक्रम के अंत में कवित्वपूर्ण ढंग से धन्यवाद ज्ञापन करते हुए न्यायाधीश अजित कुमार मिश्र ने सभी मंचासीन अतिथियों और श्रोताओं का भूरिशः अभिनंदन किया और वर्ड्सवर्थ , सूरदास तथा बालकृष्ण राव की कविताएं पढ़कर बाल मनोविज्ञान को साहित्य से जोड़ा। मंच का संचालन प्रशिक्षु जज अनूप कुमार मिश्रा एवं स्वाति सिंह द्वारा किया गया।

गया से मनोज कुमार की रिपोर्ट 


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