कोरोना काल के खट्टे-मीठे अनुभवों की राष्ट्रीय संगोष्ठी में बही अविरल भाव सरिता, आलेखों का किया गया विमोचन

कोरोना काल के खट्टे-मीठे अनुभवों की राष्ट्रीय संगोष्ठी में बही अविरल भाव सरिता, आलेखों का किया गया विमोचन

DARBHANGA: साल 2020 के आगमन के साथ कोरोना नाम के महामारी की विषबिस्सी ने भारत सहित संपूर्ण विश्व की जीवन लीला की वर्षों से लिखी जा रही पटकथा को एकदम से उलटफेर करके रख दिया। इसके कारण लंबी अवधि तक लगे लॉकडाउन ने जहां एक ओर संपूर्ण विश्व के मानव जीवन की दिनचर्या को सिरे से बदल कर रख दिया। वहीं, इसके कारण प्रकृति के मनोहारी वास्तविक रूप मुखर होने के साथ ही विभिन्न प्रकार के प्रदूषण में भारी कमी स्पष्ट रूप से देखी गई । उक्त बातें रविवार को विद्यापति सेवा संस्थान के तत्वावधान में 'कोरोना कालक संस्मरण' विषयक राष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारंभ करते हुए आकाशवाणी भागलपुर केन्द्र के कार्यक्रम प्रधान डॉ प्रभात नारायण झा ने कही। अपने संबोधन में उन्होंने स्वयं के कोरोना पीड़ित होने की दास्तान बड़े ही रोचक ढंग से सुनाई।

एमएलएसएम कालेज के प्रधानाचार्य डॉ विद्यानाथ झा की अध्यक्षता में आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में बतौर मुख्य अतिथि हिंदुस्तान टाइम्स, दिल्ली के पूर्व संपादक गंगेश मिश्र उपस्थित थे।   जबकि विशिष्ट अतिथि के रूप में प्रसिद्ध शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ ओम प्रकाश एवं कवि-साहित्यकार डाॅ जय प्रकाश चौधरी जनक के साथ विद्यापति सेवा संस्थान के महासचिव डॉ बैद्यनाथ चौधरी बैजू आदि की उल्लेखनीय उपस्थिति रही। कार्यक्रम का संचालन संगोष्ठी प्रभारी मणिकांत झा ने किया।

 कार्यक्रम के दौरान संगोष्ठी में भाग लेने वाले प्रतिभागियों ने अपने संस्मरण आधारित आधारित आलेख पढ़े जिससे खट्टे-मीठे अनुभवों की भाव-सरिता निरंतर बहती रही।  संगोष्ठी के दौरान प्रतिभागियों के संस्मरण-आलेखों के पुस्तकाकार स्वरूप का सभी अतिथियों एवं प्रतिभागियों ने मिलकर विमोचन किया।

 मौके पर डॉ ओम प्रकाश ने जहां अपने संबोधन में इस महामारी के समय में मरीज और चिकित्सक के बीच के संबंध में आए बदलाव को रेखांकित किया। वहीं, डाॅ जय प्रकाश चौधरी जनक ने कोरोना काल में होने वाले साहित्य सृजन की विस्तार से चर्चा करते हुए इसे बहुभाषा साहित्य के सुंदर भविष्य के लिए सुखद बताया। बतौर मुख्य अतिथि गंगेश मिश्र ने अपने संबोधन में कोरोना को लेकर व्याप्त भ्रांतियों को उजागर करते हुए इस महामारी को लेकर विशेष जागरूकता अभियान चलाने को समय की जरूरत बताया। उन्होंने कहा कि जीवन में संस्मरण का बहुत महत्व है। चूंकि आज के भागम भाग की जिंदगी मे लोगों के मस्तिष्क को खुराक नही मिल पा रहा है इसलिए विस्मरण की स्थति उत्पन्न होती जा रही है। 


 अध्यक्षीय संबोधन में डॉ विद्यानाथ झा ने कोरोना की प्रामाणिक वैक्सीन आने तक विशेष रूप से सतर्क रहने का आह्वान किया। वहीं विद्यापति सेवा संस्थान के महासचिव डॉ बैद्यनाथ चौधरी बैजू ने कोरोना काल के संस्मरण पर आधारित आलेखों के पुस्तकाकार संकलन को उपयोगी बताते हुए इसे प्रकाशित करने में पुस्तक के संपादक मणिकांत झा एवं सह-संपादक प्रवीण कुमार झा की खुले मन से प्रशंसा की।

  गंधर्व कुमार झा की वेद ध्वनि से शुरू हुई संगोष्ठी में प्रो जीवकांत मिश्र, प्रो विजय कांत झा, विनोद कुमार झा, रघुवीर मिश्र, राम कुमार झा, बिष्णु कुमार झा, डाॅ रमेश झा आदि ने भी अपने विचार रखे। जबकि प्रतिभागियों में डॉ एडीएन सिंह, महेंद्र हजारी, मोहन मुरारी, विष्णु देव झा विकल, अमित मिश्र, डॉ सत्येंद्र कुमार झा, डाॅ बासुकी नाथ झा, जगत रंजन झा, नीलम झा, डाॅ सुषमा झा,  रामचंद्र राय शारदानंद सिंह, साहेब ठाकुर, कामेश्वर कुमार ओझा, राकेश कुमार गिरि आदि की उल्लेखनीय उपस्थिति रही। मौके पर प्रतिभागी कल्पना झा के 10 वर्षीय पुत्र कुमार विजयंत ने बाल-मन के अपने संस्मरण को प्रस्तुत कर जमकर वाहवाही बटोरी। कार्यक्रम में केदारनाथ कुमर, दीपक कुमार झा, नवल किशोर झा, डाॅ गणेश कांत झा, प्रो चन्द्र शेखर झा बूढाभाई आदि की सराहनीय सहभागिता रही। सभी को प्रशस्ति पत्र प्रदान करने के साथ ही पाग, चादर एवं मास्क भेंट कर सम्मानित किया गया।

दरभंगा से वरूण ठाकुर की रिपोर्ट

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