बिहार के बुनकरों के इस गांव में हर घर में हैं इंजीनियर, एक बार फिर जेईई एडवांस में डेढ़ दर्जन से अधिक बच्चे हुए सफल

बिहार के बुनकरों के इस गांव में हर घर में हैं इंजीनियर, एक बार फिर जेईई एडवांस में डेढ़ दर्जन से अधिक बच्चे हुए सफल

GAYA : बिहार का ये गांव उन लोगों के लिए किसी आईने की तरह है जिन्हें इस राज्य की प्रतिभा को लेकर किसी तरह का शक है। ये गांव कभी बुनकरी के लिए जाना जाता था। पिछड़ा होने के बावजूद पिछले 24 सालों से इस गांव के लड़के कुछ ऐसा कमाल कर रहे हैं, जो संभवत: देश के दूसरे गांवों में देखने को नहीं मिलता। यहां से हर साल दर्जनों छात्र IIT और NIT के लिए चुने जाते हैं। इस बार भी पटवाटोली के 20 से अधिक स्टूडेंट्स ने जेईई एडवांस में सफलता प्राप्त की है। खास बात ये है कि सबसे अधिक लूम कारीगर के बच्चे ने सफलता हासिल कर नाम रोशन किया है।

यहाँ के बच्चे देश के 12 राज्यों में अपना योगदान दे रहे है, सबसे ज्यादा 22 इंजीनियर अमेरिका में हैं, जबकि गांव के कई इंजीनियर सिंगापुर, कनाडा, स्विट्जरलैंड, जापान और दुबई में काम करते हैं।  इस बार जेईई एडवांस में सफल छात्र रवि कुमार ने बताते है कि पिताजी बुनकर का काम करते है। मुझे सपना है इंजीनियर बनने का। जिसके कारण मैं लगातार ग्रुप स्टडी का सहारा लेते हुए तैयारी शुरू की। आईआईटी एडवांस में बेहतर अंक आया है। 

वही जेईई एडवांस में सफल छात्र शशि बताते हैं पिताजी नहीं है मां बुनकर के यहां काम करती हैं। खटखट के बीच पढ़ाई करना आदत सी बन गई थी, लगातार मेहनत के कारण आज बेहतर अंक प्राप्त हुआ है। आगे का सपना बेहतर इंजीनियर बनना है, वही शिल्पा कुमारी की मां पिता भी पावरलूम चलाते है और कड़ी मेहनत कर पढ़ाया है। वहीं वृक्ष पब्लिक लाइब्रेरी के ट्रेजरर रंजीत कुमार ने बताया कि मेरे यह निशुल्क बच्चे को सिखाया जाता है। ग्रुपिंग कराया जाता है। हमारे यहां जो आईटीआई पास करते है, वही आकर यहां बच्चों को पढते है।


पूरा गांव कपड़ा उद्योग से जुड़ा, बच्चों के बेहतर भविष्य के साथ परंपरागत पेशा भी जारी रखा

पटवा टोली के गांव के पूर्वज कपड़ा उद्योग से जुड़े हैं। गांव में घुसते ही आज भी आपको धागे की महक,  मशीन की तेज आवाज आदि सुनाई दे सकती है। यहां के लोगों का मुख्य और एकमात्र व्यवसाय कभी बुनाई ही हुआ करती थी। यहां जाति मायने नहीं रखती। हर वर्ग कपड़ा उद्योग से जुड़ा है। लेकिन आधुनिक युग में पूरी तरह से गांव का परिदृश्य बदल चुका है। यहां के माता-पिता अब रंगीन धागों में उलझकर नहीं रह गए हैं। अपने बच्चों के भविष्य को इस रंगीन धागे के अनदेखे संघर्ष की छाया में रखे जरूर, लेकिन उनका भविष्य इस छाया से कोसों दूर है। एक तरफ कपड़े की बुनाई तो दूसरी ओर आईआईटी के छात्रों को बनाकर यहां के लोगों ने सच में कमाल कर दिया है।  

बुद्धिमत्ता के गढ़ बिहार के गया के इस गांव में आलम ये है कि हर घर में कम से कम एक इंजीनियर तो है ही। ये गांव अब तक तीन सौ से अधिक IIT छात्रों का भविष्य बना चुका है। पटवा टोली गांव न सिर्फ बिहार बल्कि देश के मानचित्र में अपने दो चीजों के लिए जाना जा रहा है। सबसे खास बात ये है कि यहां बुनियादी सुविधाओं का अभाव होने के बावजूद भी गांव के लोग अपने बच्चों का भविष्य बना रहे हैं।

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