पूर्व मुख्यमंत्री जननायक कर्पूरी ठाकुर ने स्कूलों में खत्म की अंग्रेजी की अनिवार्यता, किसानों को दिलाई मालगुजारी से मुक्ति
PATNA : जननायक कर्पूरी ठाकुर की जयंती शताब्दी की पूर्व संध्या पर केंद्र सरकार ने बड़ा ऐलान किया है। केंद्र सरकार ने जननायक को भारत रत्न देने का ऐलान कर दिया है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने सादगी की मिसाल माने जाने वाले कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न देने की अधिसूचना जारी कर दी है। बता दें की कर्पूरी ठाकुर बिहार ही नहीं देश की राजनीति में एक मिसाल के तौर पर जाने जाते हैं। जिनके सिद्दांतों पर चलने के दावे कई राजनीतिक पार्टियां करती हैं।
हालाँकि जननायक को ऐसे ही जननायक नहीं कहा जाता है। इसके पीछे कई कहानियाँ हैं जिन्हें आज हम आपको बता रहे हैं। कहा जाता है की बिहार के दो दो बार मुख्यमंत्री रहनेवाले कर्पूरी ठाकुर का जब निधन हुआ। तब उनके पास न ही रहने के लिए घर था और न ही जमीन।
कर्पूरी ठाकुर का जन्म 24 जनवरी 1924 को समस्तीपुर जिले के पितौन्झिया गाँव में हुआ था। महज 14 साल की उम्र में अपने गांव में नवयुवक संघ की स्थापना की। गांव में होम विलेज लाइब्रेरी के लाइब्रेरियन बने। 1942 में पटना विश्वविद्यालय पहुंचने के बाद वे स्वतंत्रता आंदोलन और बाद में समाजवादी पार्टी तथा आंदोलन के प्रमुख नेता बने। 1952 में भारतीय गणतंत्र के प्रथम आम चुनाव में ही वे समस्तीपुर के ताजपुर विधानसभा क्षेत्र से निर्वाचित हुए थे। तब 31 साल के थे। महामाया प्रसाद सिन्हा मुख्यमंत्री बने तो कर्पूरी ठाकुर उप मुख्यमंत्री बने और उन्हें शिक्षा मंत्रालय का कार्यभार सौंपा गया था।
कर्पूरी ठाकुर ने शिक्षा मंत्री रहते हुए छात्रों की फीस खत्म कर दी थी और अंग्रेजी की अनिवार्यता भी खत्म कर दी थी। कुछ समय बाद बिहार की राजनीति ने ऐसी करवट ली कि कर्पूरी ठाकुर मुख्यमंत्री बन गए। इस दौरान वो छह महीने तक सत्ता में रहे। उन्होंने उन खेतों पर मालगुजारी खत्म कर दी, जिनसे किसानों को कोई मुनाफा नहीं होता था। 5 एकड़ से कम जोत पर मालगुजारी खत्म कर दी गई और साथ ही उर्दू को राज्य की भाषा का दर्जा दे दिया। इसके बाद उनकी राजनीतिक ताकत में जबरदस्त इजाफा हुआ और कर्पूरी ठाकुर बिहार की सियासत में समाजवाद का एक बड़ा चेहरा बन गए। उन्होंने मंडल आंदोलन से भी पहले मुख्यमंत्री रहते हुए पिछड़ों को 27 फीसदी आरक्षण दिया था।