GURU PURNIMA: गुरू-शिष्य का है अटूट सूक्ष्म संबंध, शास्त्रों भी गुरूओं को दिया है सर्वोच्च स्थान, साधना के समान है गुरू बनाना

GURU PURNIMA: गुरू-शिष्य का है अटूट सूक्ष्म संबंध, शास्त्रों भी गुरूओं को दिया है सर्वोच्च स्थान, साधना के समान है गुरू बनाना

DESK: योग, आपके गुरू के साथ आपका संबंध है, बस। इसे समझने के लिए लम्बी-चौड़ी परिभाषाओं या विचार-विमर्श की आवश्यकता नहीं हैI 'योग' तो केवल गुरू-शिष्य के बीच एक ऐसा अटूट सूक्ष्म सम्बन्ध है जो गुरु के चरणों में शुरू और समाप्त होता है। गुरु बनाना या धारण करना एक साधना हैI इस लेख में हम, एक शिष्य के दृष्टिकोण से 'गुरु-शिष्य' के सम्बन्ध को गहराई से समझने की कोशिश करेंगेI 

ध्यान मूलं गुरु मूर्तिपूजा मूलम् गुरु पदम् I मंत्र मूलम् गुरु वाक्यंमोक्ष मूलं गुरु कृपा I I

उपर्युक्त श्लोक एक शिष्य के जीवन का सार है, अर्थात गुरु की छवि ही शिष्य के ध्यान का केंद्र है तथा सारे तीर्थ गुरु के चरणों में ही पूर्ण हो जाते हैं I गुरु का प्रत्येक शब्द शिष्य के लिए एक मंत्र है (संहिताबद्ध ऊर्जा) और वह केवल गुरु कृपा से ही मोक्ष प्राप्त कर लेता है। शास्त्रों में 'गुरु' को सर्वोच्च स्थान दिया गया है I 'गुरु' ही 'ब्रह्मा','विष्णु' और 'शिव' हैं हालांकि भगवान ब्रह्मा की तरह उनके चार सिर, भगवान विष्णु की तरह चार भुजाएं तथा भगवान शिव की तरह तीन नेत्र नहीं हैं, किन्तु केवल गुरु तत्व के अनुभव में ही,एक शिष्य, परब्रह्म या उस अव्यक्त शक्ति का अनुभव कर लेता हैI गुरु की महिमा और महत्व के बारे में 'रुद्रयामल' में यह कहा गया है कि, “गुरु की भक्ति से जीव, स्वर्ग के देव इन्द्र का पद प्राप्त कर सकता है,लेकिन मेरी भक्ति से (अकेले इष्ट देवता) वह मुझे प्राप्त नहीं कर सकता"।

एक शिष्य के लिए गुरु से जुड़ी हर चीज़ श्रेष्ठतम होती हैI कहते हैं, गुरु जिस स्थान पर निवास करते हैं वह स्थान शिष्य के लिए कैलाश है, वहाँ के वक्ष, कल्प-वृक्ष हैं, वहाँ बहता जल गंगा है, उस जगह उगने वाली जड़ी - बूटियाँ संजीवनी बूटी हैं, वहाँ की वायु प्राण वायु है, वहाँ परोसा गया भोजन परमात्मा का प्रसाद है तथा जल अमृत I जब एक शिष्य गुरु के साथ ध्यान के लिए बैठता है,   समय उसके लिए वहीँ रुक जाता है, क्योंकि उस समय शिष्य को गुरु की स्थिति और गुरु द्वारा की गयी वर्षों की साधना का अनुभव होता है। I  जन्म-जन्मान्तर से की जा रही साधना के बाद ही एक जीव अपने गुरु से मिलता है और जब ऐसा होता है इसके कुछ संकेत होते हैं I पहला संकेत यह होता है कि शिष्य के शरीर में कुछ विशेष परिवर्तन होने लगते हैं। शरीर वैसा ही दिखना शुरू हो जाता है जैसा कि शिष्य चाहता है I दूसरा, शरीर से  किसी भी प्रकार का रोग या असंतुलन गायब हो जाता है और शरीर बीमार होना बंद हो जाता है I तीसरा संकेत है कि व्यक्ति उन शक्तियों का अनुभव करने लगता है जो इस सृष्टि का संचालन करती हैं I ‘गुरु ‘ न तो समस्याओं से छुटकारा दिलाने का कोई दावा करते हैं और न ही कोई शुल्क लेते हैं बल्कि वह तो शिष्य को परम सत्य की ओर ले जाने वाले उस मार्ग पर डालते हैं जहाँ से सूक्ष्म लोकों के द्वार खुलते हैं I गुरु अष्टांग योग के पाँच यमों में स्थिर होते हैं I वह, योग के तेज और आकर्षण से ओत-प्रोत होते हैं, वह जो कुछ भी कहते हैं वह अवश्य ही घटित होता है अर्थात उनमे वाक्-शक्ति होती है, उनका मंत्र उच्चारण जादुई सा होता है जो दैविक अनुभव और अभिव्यक्तियाँ प्रदान करता है। ध्यान आश्रम के साधक प्रतिदिन यह सब अनुभव करते हैं।

गुरु बनाने में कभी भी जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए बल्कि अपने अनुभव के आधार पर विश्वास करके ही, पूर्ण रूप से सुनिश्चित होकर ही गुरु बनाने चाहियें I योगसूत्र एक साधक को गुरु बनाने से पहले सब कुछ देखने, विश्लेषण करने और समझने के लिए दो वर्ष का समय देते हैं.क्योंकि एक बार गुरु बना लेने के बाद यदि उन पर संदेह करते हैं या मार्ग बदलते हैं तो यह गुरु द्रोह (गुरु निरादर) माना जाता है, और वर्षों की साधना शून्य हो जाती है। कबीर ने कहा है, कबीरा ते नर अंध है जो गुरु कहते और हरि रूठे गुरु ठौर है गुरु रूठे नहीं ठोर । 

अगले दो वर्ष गुरु के लिए साधक को शिष्य के रूप में स्वीकार करने के लिए हैं। एक शिष्य का गुरु पर एक केंद्रित ध्यान होता है, उसके लिए गुरु के अलावा कुछ भी नहीं होता है। शिष्य की श्रद्धा और समर्पण परम है, एक संदेह ही पथ से दूर रखने के लिए काफी है। जिस प्रकार गुरु मिलने दुर्लभ हैं, उसी प्रकार शिष्य भी संख्या में कम हैं I गुरु की भांति शिष्य को पहचानने के लिए भी कुछ संकेत होते हैं I एक शिष्य का हर पल अपने गुरु पर ही ध्यान केंद्रित रहता है, उसके लिए गुरु के आलावा कुछ भी नहीं होता। शिष्य की श्रद्धा और समर्पण ही उसकी पहचान होती है अन्यथा मार्ग से हटाने के लिए एक संदेह ही काफी होता है I गुरु और शिष्य के बीच कोई पर्दा नहीं होता, वह तो अपने गुरु की ही छवि होता है, उसकी वृत्ति गुरु की अवस्था पर निर्भर होती है तथा वह अपने गुरु का तेज और आकर्षण स्कन्दित करता है I एक बार जब गुरु जब किसी को अपना शिष्य बना लेते हैं तो वह पूर्ण रूप से उसका उत्तरदायित्व लेते हैं और न केवल दिन-प्रतिदिन बल्कि हर पल उसका ध्यान रखते हैं तथा निःसंदेह उसे योग के मार्ग पर संभाले रहते हैं I जबकि गुरु का दायित्व शिष्य को ज्ञान प्रदान करना है, वहीँ शिष्य का दायित्व गुरु सेवा है I गुरु - शिष्य सम्बन्ध की ऐसी महिमा है जिसमें किसी भी प्रकार की आर्थिक, जिस्मानी या कोई भी भौतिक लेन - देन  की कोई जगह नहीं होती I अगर दोनों के बीच इस प्रकार का कोई भी आदान-प्रदान है तो विश्वास मानिए वह एक तमाशा है, व्यापार है, न कि गुरु और शिष्य का सम्बन्ध I 

गुरु शब्द की वर्तमान समझ 'लव गुरु', 'बिजनेस गुरु', 'मैनेजमेंट गुरु' आदि जैसे नवीन शब्दों के लोकप्रिय होने के साथ स्थूल में निहित है। पहले सिर्फ ‘गुरु’ थे। यह इस युग में लोगों की गलत विचार प्रक्रिया और इच्छा पैटर्न का संकेत है। आज के समय में तीर्थ भी पिकनिक स्पॉट बन गए हैं, जहां लोग भौतिक इच्छाओं को पूरा करने की आशा से जाते हैं। भौतिक इच्छाओं की प्राप्ति के लिए आपको किसी गुरु के पास जाने की आवश्यकता नहीं है।केवल सृष्टि के नियमों का पालन, दान और सेवा भौतिक इच्छाओं की पूर्ति के लिए पर्याप्त है।गुरु की आवश्यकता तब होती है जब आप भौतिक से परे जाना चाहते हैं, योग की सिद्धियों के इच्छुक   हैं और जन्म-मरण के चक्र से बाहर निकलना चाहते हैं। कलियुग  की   समस्या यही है की हमारी  इच्छायें स्थूल में सन्निहित है , जन   साधारण  की  सोच   स्थूल तक ही  सीमित  है  और यही कारण है की वह गुरु को भी भौतिक मानकों पर ही मापते है, जैसे कि उनका आश्रम  कितना बड़ा  हैं, वे कितने कारखानों के मालिक  हैं आदिl  परिणाम स्वरूप  वह गुरु का सार नहीं समझ पाते lभौतिक में अंतर्निहित होना गलत नहीं है क्योंकि अधिकांश के लिए यहीं से शुरुआत होती है। लेकिन अगर आपको गुरु मिल गए हैं और आप उनके मार्ग पर चल रहे हैं किन्तु फिर भी समय के साथ आपकी इच्छाओं में कोई परिवर्तन नहीं हुआ , तो आपको यह सोचने की आवश्यकता है कि या तो आप गलत हैं या आप गलत स्थान पर हैं।

एक शिष्य के लिए गुरु-पूर्णिमा की रात का विशेष महत्व है क्योंकि उस समय गुरु-शक्ति अपने चरम पर होती है। इस रात, गुरु सानिध्य में किये गए यज्ञ और मंत्र साधना, साधक को एक ही रात में कई वर्षों की साधना के समान वरदान देती है। 

नोटः- यह लेखक के निजी विचार हैं।

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