मुश्किल में घिरे हेमंत सोरेन, मुख्यमंत्री की कुर्सी बचाने के लिए अब चुनाव आयोग पर सबकी नजरें

मुश्किल में घिरे हेमंत सोरेन, मुख्यमंत्री की कुर्सी बचाने के लिए अब चुनाव आयोग पर सबकी नजरें

PATNA : झारखंड अवैध खनन पट्टे को लेकर बुरी तरह से घिर चुके हेमंत सोरेन के लिए अब अपनी कुर्सी बचा पाना मुश्किल लग रहा है। बताया जा रहा है कि झारखंड के राज्यपाल ने इस संबंध में चुनाव आयोग से मंतव्य मांगा है कि सीएम पर जो आरोप लगे हैं, उसके आधार पर क्या कार्रवाई की जा सकती है। चुनाव आयोग जो भी जवाब देगा, उसके आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी। 

तेजी से बदलते राजनीतिक घटनाक्रम में दो दिन पहले राज्यपाल रमेश बैस ने नई दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह से अलग-अलग मुलाकात की। इस दौरान राज्यपाल ने बताया कि भारतीय निर्वाचन आयोग ने इसपर राज्य के मुख्य सचिव सुखदेव सिंह से दस्तावेजों को सत्यापित करने को कहा था। मुख्य सचिव ने दस्तावेजों को सत्यापित कर भारतीय निर्वाचन आयोग को भेज दिया है। निर्वाचन आयोग से मंतव्य मिलने के बाद राजभवन द्वारा संविधान के निहित प्रावधानों के तहत विधिसम्मत कार्रवाई की जाएगी। उक्त दस्तावेज भाजपा की तरफ से उपलब्ध कराए गए थे।

हेमंत सोरेन पर पत्थर खनन के लिए रांची के अनगड़ा में खदान आवंटन का आरोप है, जबकि बसंत सोरेन पर खनन कंपनी ग्रैंड माइनिंग में पार्टनर होने का आरोप है। भाजपा नेताओं ने सोरेन बंधुओं पर सरकार से दोहरा लाभ लेने का आरोप लगाते हुए इनकी विधानसभा की सदस्यता खत्म करने की मांग की थी। तर्क दिया गया था कि यह कार्य गृह मंत्रालय, भारत सरकार की ओर से मंत्रियों के लिए जारी आचार संहिता का उल्लंघन है। साथ ही भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 13(1)(डी) के तहत आपराधिक कृत्य है।


इन धाराओं में फंस सकते हैं सोरेन

चुनाव आयोग के मंतव्य के आधार पर ही राज्यपाल इस मामले में अपना निर्णय लेंगे। इसके अलावा लीज लेने के प्रकरण में हेमंत सोरेन ने जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 8 ए और 9 और 9 ए काउल्लंघन किया है। हालांकि, उनकी ओर से 9 ए लागू नहीं की बात कही जा रही है।लेकिन 9 ए भी इस मामले में लागू होगा, क्योंकि सीएम ने अपनी स्वेच्छा से लीज सरेंडर नहीं किया है, बल्कि जब मामला लोगों के संज्ञान में आया है, तो उन्होंने लीज सरेंडर किया है। सीएम के साथ-साथ हेमंत सोरेन खनन विभाग के मंत्री के पद पर रहते हुए ही लीज लेने की सारी प्रक्रिया पूरी की है। इसलिए यह मामला 9 ए के तहत भी आएगा। जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 8ए, 9 और 9 ए के तहत लाभ के पद पर रहते हुए भ्रष्ट आचरण अपनाने पर सदस्यता समाप्त किए जाने की बात कही गई है।


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