हाय री सुशासन वाली सरकार ! दवा खऱीद घोटाले में छोटे कर्मियों को दंड देकर बड़े लोगों को बचा लिया, RTI एक्टिविस्ट ने सिविल सर्जन व अन्य खिलाफ कार्रवाई को लेकर HC तक लड़ी लड़ाई
PATNA: बिहार में भ्रष्टाचार रूपी गंगोत्री बह रही है. सरकार भ्रष्टाचार रोकने की दिशा में कोई पहल करते नहीं दिखती. हालात ऐसे हैं कि सरकारी सेवक भ्रष्टाचार कर अकूत संपत्ति बना रहे. वैसे लोगों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए, लेकिन उन्हें बचाने का भरपूर प्रयास होता है. मामला पकड़ में आने के बाद भी छोटे कर्मियों पर कार्रवाई कर बड़े अधिकारियों को बचा लिया लिया जाता है. दवा खऱीद में भारी भ्रष्टाचार के एक मामले में स्वास्थ्य विभाग की बड़ी लापरवाही सामने आई. आवेदक ने निगरानी विभाग से लेकर पटना हाईकोर्ट तक का दरवाजा खटखटाया. पांच-छह सालों बाद स्वास्थ्य विभाग ने छोटे कर्मियों पर कार्रवाई कर सिविल सर्जन व अन्य चिकित्सा पदाधिकारियों को बचा लिया. बिहार के जाने-माने आरटीआई कार्यकर्ता शिव प्रकाश राय ने बेतिया सिविल सर्जन कार्यालय से हुई दवा खरीद में बड़े घोटाले का पर्दाफाश किया था और सरकार के स्तर पर शिकायत की थी. कोई कार्रवाई न होते देख इन्होंने पटना हाईकोर्ट में पीआईएल दायर किया था. अब जाकर स्वास्थ्य विभाग की तरफ से कार्रवाई का दिखावा किया गय़ा. लेकिन यहां भी चिकित्सा पदाधिकारियों को ऊपर वालों ने बचा लिया.
बिहार के जाने-माने आरटीआई कार्यकर्ता शिव प्रकाश राय ने बेतिया जिले में दवा खरीद में हुए घोटाले को लेकर पटना हाई कोर्ट में अपील किया था. कोर्ट के आदेश के बाद स्वास्थ्य विभाग ने सकारण आदेश पारित किया है. इसकी जानकारी आवेदक को दी है. स्वास्थ्य विभाग के अपर सचिव सुधीर कुमार की तरफ से जारी पत्र में कहा गया है कि याचिकाकर्ता शिव प्रकाश राय ने निगरानी विभाग में कंप्लेंट किया था. इसके बाद 6 जनवरी 2018 को निगरानी विभाग ने इस मामले के निष्पादन के लिए स्वास्थ्य विभाग को भेजा. जिसमें कहा गया था कि पश्चिमी चंपारण जिले में वर्ष 2013-14 एवं 14-15 में दवा खरीद में भारी अनियमितता और गबन किया गया है. इस संबंध में अंकेक्षण दल ने कई बिंदुओं पर सवाल खड़े किए गए थे.इसके बाद दो सदस्यीय जांच समिति द्वारा जांच कर कार्रवाई की गई थी. साथ ही संबंधित पदाधिकारी से स्पष्टीकरण पूछा गया था.
जांच समिति द्वारा पश्चिमी चंपारण जिले का दौरा कर इस मामले से संबंधित पहलुओं की जांच की थी और 11 जनवरी 2018 को प्रतिवेदन दिया था. याचिकाकर्ता ने इस संबंध में परिवाद पत्र के साथ-साथ कोर्ट में पीआईएल दायर किया था. जिसमें कहा गया था कि तत्कालीन सिविल सर्जन गोपाल कृष्ण एवं रंजन कुमार लेखपाल की मिलीभगत से गड़बड़ी हुई है. इस मामले में इन लोगों के खिलाफ कार्रवाई की जाय. विभागीय जांच समिति ने जो अपना अंतिम जांच प्रतिवेदन सौंपा उसमें गोपाल कृष्ण तत्कालीन सिविल सर्जन के खिलाफ कोई आरोप प्रतिवेदित नहीं किया गया. लेकिन दो चिकित्सा पदाधिकारी एवं कुछ अन्य कर्मियों के खिलाफ आरोप प्रतिवेदन किए गए हैं.ऐसे आरोपित पदाधिकारी और कर्मियों के खिलाफ 17 जनवरी 2018 से सिविल सर्जन बेतिया को कार्रवाई के लिए आदेशित किया गया था. तत्कालीन सिविल सर्जन गोपाल कृष्ण मामले में समीक्षा के बाद अनुशासनिक प्राधिकार ने 7 मार्च 2019 को उनके विरुद्ध आरोप प्रमाणित नहीं पाते हुए कार्रवाई नहीं करने का निर्णय लिया .अन्य आरोपित कर्मियों के खिलाफ कार्रवाई करने का निर्णय लिया गया था .साथ ही लेखापाल रंजन कुमार की कोई भूमिका न तो जांच प्रतिवेदन में आई और ना ही जिला से प्राप्त प्रतिवेदन में इनका कोई जिक्र हुआ. वहीं गोपाल कृष्ण 31 दिसंबर 2023 को सेवानिवृत हो चुके हैं. स्वास्थ्य विभाग की तरफ से बताया गया है कि जिन आरोपित पदाधिकारी कर्मियों के खिलाफ कार्रवाई की गई उसमें लिपिक मुर्तजा हुसैन, नंदकिशोर प्रसाद, विपिन कुमार तिवारी ,अमित कुमार लिपिक, समीर पूर्ति एक्सरे टेक्नीशियन, विजय कुमार शल्य कक्ष सहायक, राम आशीष बैठा क्रय लिपिक. इन सभी के खिलाफ दंड संसूचित किया गया है. जबकि डॉ किरण कुमार झा चिकित्सा पदाधिकारी और डॉक्टर सिंघेश्वर प्रसाद मंडल को आरोप मुक्त कर दिया गया. स्वास्थ्य विभाग के पत्र में कहा गया है कि इन तथ्यों के आलोक में संचिका उपस्थापन में विलंब के लिए दोषी कर्मियों से स्पष्टीकरण पूछने का आदेश दिया गया है. इसी के साथ इस मामले को निष्पादन किया जाता है.
बिहार के जाने-माने आरटीआई कार्यकर्ता और बेतिया जिले में दवा खरीद घोटाले के शिकायतकर्ता शिवप्रकाश राय का कहना है कि ऑडिट रिपोर्ट में चिकित्सा पदाधिकारियों को दोषी माना गया था. लेकिन दोषी चिकित्सा पदाधिकारी को ऊपर वाले कैसे बचाते हैं तथा छोटे कर्मी को फंसाते हैं, इससे बड़ा उदाहरण और क्या हो सकता है.