सम्राट अशोक के अपमान पर बात न इधर की, न उधर की हो बल्कि बात अवार्ड वापसी की हो

सम्राट अशोक के अपमान पर बात न इधर की, न उधर की हो बल्कि बात अवार्ड वापसी की हो

भारत के इतिहास में चक्रवर्ती सम्राट अशोक के शासनकाल में ही भारत (मगध शासन) का साम्राज्य विस्तार सबसे ज्यादा हुआ । आज के दौर में जिस ‘अखंड भारत’ का दावा किया जाता है और जिस सीमा विस्‍तार की बात करते हैं वह अशोक के काल में हुआ, लेकिन तथाकथित बुद्धिजीवी जानकर भी विचारधारा के दबाव में बौद्धिक महापाप कर रहे हैं । बोद्धिक दिवालियापन इससे बड़ा क्‍या हो सकता है कि अंखड भारत का विस्तार देने वाले प्रियदर्शी सम्राट अशोक को आज दया प्रकाश सिन्हा द्वारा हत्यारा, क्रूर, कामुक, पिता को कैद करने वाला कहकर उनका अपमानित किया जा रहा है. 

खुद को वैचारिक रुप से भारतीय संस्कृति के रक्षक बनने का स्‍वांग रचते हैं तो दूसरी और ऐसे लोग भारतीय संस्कृति की गरिमा, गौरव और गाथा को शीर्षस्थ मुकाम पर पहुँचाने वाले सम्राट अशोक के लिए अपमानजनक टिप्पणियाँ करते हैं और इस पर आपत्ति जताई जाती है तो कुतर्क पेश किया जा रहा है । 

शासकों की प्रकृति रही है कि साम्राज्य विस्तार के लिए वे युद्ध करते हैं । सम्राट अशोक ने भी तब ऐसा ही किया था । यह सामान्य इतिहास की बातें हैं कि मगध का राज हासिल करने और अपने साम्राज्य विस्तार के लिए एक शासक की प्रकृति के अनुरूप ही सम्राट अशोक ने व्यवहार किया, लेकिन उन्होंने कलिंग युद्ध के बाद जो खुद में बदलाव किया वह उनकी महानता को प्रतिपादित करता है ।

कलिंग युद्ध के बाद हिंसा का त्याग कर बौद्ध धर्म अपनाने वाले सम्राट अशोक के जीवन में न तो उनका मौर्य साम्राज्य कमजोर हुआ, ना ही सीमाएं बदली । यहाँ तक कि जिस लोकप्रियता को उन्होंने तलवार के जोर पर हासिल नहीं किया उस लोकप्रियता को उन्होंने बौद्ध धर्म अपनाने के बाद शांति के जरिये हासिल किया । युद्ध त्यागकर बौद्ध बने सम्राट अशोक ने भारत के कोने-कोने में बुद्ध के उपदेशों के शिलालेख लगवाये । बामियान की गुफाओं में उकेरी गयी विशाल बुद्ध प्रतिमा उसी काल की थी । इतना ही नहीं हमारे तिरंगे में जो चक्र है, वह भी अशोक के धम्म चक्र से लिया गया है । इसी तरह तीन सिंहों के सिर वाला देश का राजकीय चिह्न और हमारा आप्त वाक्य ‘सत्यमेव जयते’ भी सम्राट अशोक के शासनकाल से ही आया । 

ऐसे में दुनिया जिस अशोक को महान सम्राट अशोक कहती है उनपर अशोभनीय टिप्पणियाँ करना न सिर्फ सम्राट अशोक का अपमान करती हैं बल्कि भारत, मगध और बिहार के साथ ही अहिंसा, दया, करुणा को जीवन में अंगीकार करने वालों का भी अपमान है । 

सम्राट अशोक ने धर्म, मानवता और शांति के लिए अपने पुत्र महेंद्र और पुत्री संघमित्रा को भी धम्म को समर्पित कर दिया । इसी कारण सम्राट अशोक को प्रजापालक और मानवीय मूल्यों के प्रति निष्ठावान शासक माना गया ।

भारत की तो संस्कृति रही है कि हम बदलावों को अंगीकार करने वालों को अपना आदर्श पुरुष मानते हैं । उनके सद्कर्मों से प्रेरणा लेते हैं और उनकी महानता का अनुसरण करते हैं । जैसे डाकू रहे बाल्मीकि जब ‘रामायण’ के रचयिता बन गए तो हम उन्हें आदिकवि के रूप में सम्मान देते हैं । रामचरित मानस लिखने वाले गोस्वामी तुलसीदास को हम उनकी युवावस्था के लिए नहीं बल्कि राम की कथा को घर घर पहुँचाने के लिए जानते हैं । 

शांतिप्रिय को शोषक कहने वाले न सिर्फ भारत के गौरवशाली इतिहास को धूमिल कर रहे हैं बल्कि सम्राट अशोक को अपमानित करने वाले के खिलाफ आवार्ड वापसी मुहिम का समर्थन तो नहीं ही कर रहे बल्कि सम्राट अशोक के नाम पर साहित्‍य अकादमी पुरस्‍कार 2021 से नवाजा जाता है, इससे बड़ा भद्दा मजाक क्‍या हो सकता है । इतना ही नहीं बौद्धिक रुप से प्रदुषित व्‍यक्ति को विभिन्‍न पुरस्‍कारों से नवाजा गया । 

ज्ञातव्‍य है कि सम्राट अशोक से बिहारवासियों का गहरा लगाव रहा है । केवल बिहार में मुख्‍यमंत्री नीतीश कुमारने अपने शासनकाल में सम्राट अशोक के नाम पर सार्वजनिक अवकाश घोषित किया । राजधानी पटना में सम्राट अशोक कन्‍वेशन हॉल बनाया, नगर निकाय में सम्राट अशोक भवन बने हैं शेष प्रक्रियाधीन हैं । ऐतिहासिक धरोहर को सुरक्षित व संरक्षित करने के लिए लगातार काम हो रहे हैं । 

खासकर बिहार के साथ सम्राट अशोक का जुड़ाव होने के कारण यह प्रत्येक बिहारवासी का नैतिक कर्तव्य बनता है कि हमारे गौरवशाली इतिहास पर हमला करने वालों को हम मुंहतोड़ जवाब दें. सवाल राजनैतिक दलीय निष्‍ठा का नहीं वल्कि राष्‍ट्रीय गौरव, अस्‍मीता, प्रतीक चिन्‍ह व ऐतिहासिक विरासत को ध्‍यान में रखते हुए ऐसे दूषित बौद्धिक मानसिकता वाले व्‍यक्ति दया प्रकाश सिन्हा को दिये गए अवार्ड वापसी की मुहिम में एक-दूसरे का सहयोग अपेक्षित हो. 

प्रिय दर्शन शर्मा

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