जहां विज्ञान की पहुंच नहीं उस लोक में आप को ले चलते है ,जानिए मैं मर कर कहां जाऊंगा?

जहां विज्ञान की पहुंच नहीं उस लोक में आप को ले चलते है ,जानिए मैं मर कर कहां जाऊंगा?

डेस्क :हिंदू धर्म की बेसिक मान्यताएं हैं कि शरीर के भीतर एक आत्मा होती है, जो जन्म और मृत्यु से परे अपना अस्तित्व रखती है। वह कहां से आती है, कहां जाती है, इसकी जब पड़ताल की, तो कई तरह के जवाब मिले. मृत्यु के समय अक्सर पढ़ा जाने वाला गरुड़ पुराण इतना बताता है कि पुण्यात्माएं और पापी आत्माएं अलग-अलग द्वारों से प्रस्थान करती हैं, लेकिन यहीं यह भी लिखा गया है कि पाप-पुण्य का फैसला धर्मराज की अदालत में होता है, जहां पहुंचने में मेरी आत्मा को एक साल लग जाएगा. दरअसल इस पुराण का फोकस पापियों पर है. पापियों को यमराज के दो दूत मारते-पीटते और धमकाते हुए ले जाते हैं. यानी चित्रगुप्त के रिकॉर्ड और धर्मराज के इंसाफ से पहले ही उन्हें पापियों का कुछ अंदाज़ा रहता है. यह एक डरावना सफ़र है, जो कर्मनाशा नदी को पार कर एक साल में पूरा होता है. इसे पढ़ते हुए थोड़ा सुकून तभी मिला, जब मैंने आज के जाने-माने लोगों को इस रास्ते पर ले जाए जाते हुए अपनी कल्पना में देखा. जल्द ही मुझे एहसास हो गया कि मैं इनमे से किसी एक में जाने वाला हूं स्वर्ग या नरकमें जाने वाला हूं, क्योंकि पापों की परिभाषा काफी विस्तृत है और सूची काफी लंबी. यहां मुझे अपने नरक प्रवास की विस्तार सहित जानकारी मिली. पता चला कि अपने पाप और पुण्य भोगने के बाद फिर से धरती पर जाना होता है, 84 हजार योनियों में से किसी एक में. लेकिन पुराणों में ही कहीं और हमें कई तरह के लोकों के वर्णन मिलते हैं, जैसे पितृ लोक, स्वर्गलोक,  वैकुंठ लोक. जाहिर है ये पुण्यात्माओं के लिए हैं, लेकिन इनके क्रम और वहां पहुंचने की प्रक्रिया को लेकर उलझन बनी रहती है।

तब मुझे लगा कि आध्यात्मिक गुरुओं से कुछ जाना जाए। स्वामी योगानंद की 'योगी कथामृतम्' (An Autobiography of A Yogi) भारत में सबसे ज्यादा पढ़ी जाने वाली आध्यात्मिक किताब है। इसमें तीन तरह के शरीरों की बात कही गई है, जो आत्मा पर परत की तरह चढ़े होते हैं- स्थूल, सूक्ष्म और कारण। जब आत्मा भौतिक देह को त्यागती है, तो सूक्ष्म शरीर में जाती है। वह एक सूक्ष्म लोक में पहुंचती है, जहां सब कुछ प्रकाशमान कणों से बना है। आत्मा वहां अपनी इच्छा से हर तरह का भोग कर सकती है। लेकिन वहां धरती की बुराइयां और वासनाएं भी कायम रहती हैं। वहां दुष्ट आत्माओं का संसार भी है। इससे ऊपर कारण लोक है, जहां साधक आत्माओं को प्रवेश मिलता है। सामान्य आत्माएं सूक्ष्म लोक से ही अगले जन्म में लौट जाती हैं। कारण लोक की आत्माएं इससे ऊपर भी जा सकती हैं, जो कि ईश्वर से मिलन ही है। हर तरह के कवच से मुक्त हो चुकी ये आत्माएं यहां परमानंद में रह सकती हैं या फिर अपनी इच्छा से धरती पर दूसरे प्राणियों का उद्धार करने लौट सकती हैं। यह व्यवस्था मुझे अच्छी लगी। लेकिन जब मैंने स्वामी मुक्तानंद की 'चित्शक्तिविलास' में झांका, तो एक अलग व्यवस्था नजर आई। मुक्तानंद ने लिखा है, ‘नील ज्योति या नीलबिंदु नहीं, वह नील नक्षत्र था। छोटा होने पर भी मैं उसमें पूरा समा जाता। उसने ध्यान में मुझे एक दिव्यलोक में छोड़ा। यहां हर ओर सिद्धपुरुष दिखाई दे रहे थे। सप्तऋषि से लेकर शिरडी के बाबा सांई भी मुझे यहां मिले। नीलेश्वरी में ध्यान इतना स्थिर हो गया। मैं जिस नील नक्षत्र में बैठकर सिद्धलोक गया, वह सभी प्राणियों के सहस्रार में स्थित है।’ यहां मुक्तानंद साधना के दौरान की अनुभूति का वर्णन कर रहे हैं। हो सकता है मृत्यु के बाद मेरी आत्मा को होने वाला अनुभव ऐसा ना हो, क्योंकि वह एक सामान्य आत्मा का अनुभव होगा। लेकिन इस वर्णन ने मेरी उलझन में इजाफा ही किया। अब मेरे पास यही रास्ता था कि मैं धर्म और अध्यात्म से बाहर जाकर दर्शन में खोजूं। मैंने अद्वैत वेदांत चुना, क्योंकि वही सबसे चर्चित भारतीय दर्शन है और उसी का हवाला हमारी सामान्य आध्यात्मिक चर्चा में दिया जाता है। वेदांत के अनुसार यह जो कुछ भी है सभी ब्रह्म है। सर्वं खलु इदं ब्रह्म। संसार में जो भी भेद दिख रहे हैं, यह और कुछ नहीं अविद्या या माया का असर है। यह केवल भ्रम है जिसे अभ्यास कहा जाता है जैसे अंधेरे में रस्सी को सांप समझ लेना। वरना तो मैं ही ब्रह्म हूं। अहम् ब्रह्मास्मि। वही तुम हो। तत् त्वम् असि। बृहदारण्यक उपनिषद कहता है, ‘चेतना की इस तीसरी अवस्था में न कोई घोड़ा है, न कोई रथ और न कोई रास्ता। हम ही हैं जो घोड़े, रथ और सड़क की रचना करते हैं।’ शंकराचार्य कहते हैं, ‘न मे मृत्युशंका न मे जातिभेद: पिता नैव मे नैव माता न जन्म.... न मुझे मृत्यु का भय है, न मुझमें जाति का कोई भेद है, न मेरा कोई पिता है, न कोई माता है, न मेरा जन्म हुआ है, न मेरा कोई भाई है, न कोई मित्र, न कोई गुरु ही है और न ही कोई शिष्य। मैं चैतन्य रूप हूं, आनंद हूं, शिव हूं।’

अद्वैत में कोई स्वर्ग नहीं है, कोई नरक भी नहीं। जैसा गीता ने कहा है, आत्मा को न जलाया जा सकता है न सुखाया जा सकता है। लेकिन वहां कर्मफल तो है, जन्मांतर में आवाजाही भी है, क्योंकि अगर माया है, तो भ्रम ही सही, दुनिया भी है। तो क्या वेदांत सिस्टम में भी मृत्यु के बाद मेरा पाला आभासी नरक से पड़ने वाला है? इस सवाल का कोई सीधा-सीधा जवाब मुझे नहीं मिला। हां, यह पता चला कि अपने ब्रह्मत्व को पाकर इस जंजाल से बाहर निकलना है, तो साधना करनी होगी। इसके लिए श्रवण, मनन और निदिध्यासन का रास्ता है। या फिर योग का। योगानंद कहते हैं, सिर्फ बौद्धिक इच्छा या दिमागी खुलापन काफी नहीं है। योग के जरिए चेतना के विकास और भक्तिपूर्ण समर्पण की जरूरत होती है। अब यह ऐसी शर्त है जिसकी मैं काबिलियत नहीं रखता था । अभी मैं इस अनिश्चय से बाहर नहीं निकला था कि मेरा क्या होगा? तब आखिरी मौके के तौर पर मैंने साइंस की ओर देखा। साइंस में आत्मा नहीं है। लेकिन चेतना है, जिसके चलते हम जिंदा होने का एहसास करते हैं। मृत्यु का मतलब यहां इस चेतना का लुप्त हो जाना ही है। यह चेतना क्या है और यह कहां से आती है? हाल के वर्षों में दार्शनिकों और वैज्ञानिकों, खासतौर पर न्यूरोसाइंटिस्ट्स ने चेतना पर काफी सोचा-विचारा है। हालांकि चेतना की गांठ पूरी तरह नहीं खुली है, लेकिन कुछ बातें लगभग तय मानी जा सकती हैं। वे इस तरह हैं; एक, चेतना हमारे नर्वस सिस्टम (दिमाग और तंत्रिका) का गुण है। हमारे सभी इंद्रिय अनुभव और विचार इसी सिस्टम की बेहद जटिल बनावट से पैदा होते हैं। हमारे दिमाग़ में 100 अरब न्यूरॉन्स हैं, जो अनगिनत कनेक्शनों के जरिए आपस में जुड़कर कुदरत का शायद सबसे जटिल नेटवर्क बनाते हैं। दो, दिमाग़ की ज्यादातर हलचलें, जैसे शरीर का रखरखाव, यादें और भावनाएं- कभी हमारे नोटिस में नहीं आतीं। उन्हें अनजान ताकत खुद चलाती रहती है। तीन, दिमागी हलचल का एक छोटा सा हिस्सा हमारी जानकारी में होता है। इस जानकारी को जानने वाला जानकार यानी 'मैं' या आत्म (सेल्फ) खुद को दिमाग का मालिक या केंद्र समझता है, लेकिन यह भ्रम है। चार, सेल्फ भी दिमाग़ की हलचल का एक नतीजा है। यह एक विशाल दिमाग की क्रियाओं का महज़ एक गुण है। क्या आपने इन नतीजों की सनसनी महसूस की? यह जो खुद को 'मैं' समझ रहा है, सबसे ऊपर, कुछ विशिष्ट, इस दुनिया को देखता-भोगता हुआ, वह सिर्फ एक परिणाम है किसी प्रक्रिया का, जो इस 'मैं' से कहीं बड़ी, कहीं व्यापक है। वह क्या है? यह मस्तिष्क, जो खुद कुदरत का गढ़ा हुआ है। कुदरत, जो यह पूरा ब्रह्मांड है। ब्रह्मांड, जो कभी एक बिंदु से शुरू हुआ और सृष्टि की हर चीज़, हर कण में बदल गया। यहां सब कुछ एक ही से बना हुआ, एक ही में स्थित, एक ही की अभिव्यक्ति है। ब्रह्मांड भी, मस्तिष्क भी, मैं भी। संसार में जो विभेद दिख रहे हैं, चीज़ें अलग-अलग दिखती हैं, वह इस 'मैं' के कारण। ठीक इसी तरह वेदांत में इसे 'अहंकार' कहा गया है। विभेद और उससे संसार का भ्रम साइंस में भी है और वेदांत में भी।

यहां ब्रह्मांड है, वहां ब्रह्म। बहरहाल, क्या आप समझ गए कि मैं खोज क्या रहा था? जब हम मृत्यु के बाद के जीवन को जानना चाहते हैं तो दरअसल हम गुंजाइश देख रहे होते हैं अमर होने की। क्या कोई मौका है कि मैं मरने के बाद भी बचा रहूं? तो इस पड़ताल में मुझे क्या जवाब मिला? पुराणों ने मुझे नरक से डराया, स्वर्ग से लुभाया, लेकिन अगर मुझे दूसरे जन्म में जाना ही है और वहां मेरी यादें नहीं जाएंगी, तो यह मेरे वजूद का अंत ही है। मान लें कि साधना या योग से मुझे ईश्वर के साथ मिलने का मौका मिल जाए, लेकिन क्या आत्म की चेतना बची रहेगी? बिना चेतना के जो परमानंद में लीन होगा, वह कौन होगा? योगानंद के गुरु युक्तेश्वर कहते हैं, ‘जब आत्मा शरीर के तीनों बंधनों से मुक्त हो जाती है, तो वह बिना अपना व्यक्तित्व खोए उस अनंत से एकाकार हो जाती है।’ लेकिन व्यक्तित्व के बचे रहने की ऐसी गारंटी और कहीं नहीं मिलती। यह कथन एक अपवाद लगता है। वेदांत के अनुसार जब द्वैत सिर्फ एक भ्रम है, तो मायाजाल खत्म होने के बाद विलय ही होगा। इस मामले में साइंस एक क़दम आगे चला गया कि ऐसे सवालों पर सोचने की जरूरत है नहीं। मैं चाहूं तो यही कर सकता हूं कि इस एहसास में जीता रहूं कि यह मैं नहीं, सृष्टि जी रही है। मैं ही ब्रह्मांड हूं, अभी इस वक्त भी। मुझे उससे जा मिलने के लिए किसी मौत का इंतज़ार नहीं करना, कोई साधना नहीं करनी, क्योंकि हर क्षण मैं वही हूं। यह जो 'मैं' है, बस एक खिड़की है उसके भीतर उसकी बनाई हुई, जिससे वह खुद को ही देख रहा है। वह जो मैं हूं। मैं जो वह है। अंत में मुझे लगा अगर ये लोक है तो इसके बाद भी कोई लोक होगा ।


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