नक्सलियों की जमीन नक्सलबाड़ी में बीजेपी का परचम, वामपंथ के लिये विशेष संदेश

नक्सलियों की जमीन नक्सलबाड़ी में बीजेपी का परचम, वामपंथ के लिये विशेष संदेश

दो मई को जब देश के चार राज्यों व एक केंद्रशासित प्रदेश में हुए विधानसभा चुनाव की जब मतगणना हो रही थी, तब पूरे देश की निगाहें पश्चिम बंगाल पर टिकी हुई थी। एक तरफ जहां लगातार दो बार से सरकार बना रही तृणमूल कांग्रेस थी तो दूसरी तरफ केंद्र में सत्तासीन बीजेपी थी, जो किसी भी कीमत पर ममता बनर्जी को सत्ता से हटाने की कोशिश में लगी हुई थी। अंतत: तमाम उतार चढाव के बाद जीत ममता बनर्जी को मिली और उनकी पार्टी लगातार तीसरी बार पश्चिम बंगाल में अपनी सरकार बनाने जा रही है। इस पूरे चुनाव में सबसे खास बात यह रही कि जिस जगह से नक्सल आंदोलन की शुरुआत की बात होती है, उसने चौंकाने वाला चुनाव परिणाम दिया है।

जहां क्रांति, वहां खिल गया कमल

दरअसल नक्सल आंदोलन की शुरुआत का गवाह रहा नक्सलबाड़ी इस चुनाव में एक और बदलाव का गवाह बना। कभी क्रांति की बात कहने वाले नक्सलबाड़ी में इस बार कमल खिल गया है। दरअसल इस विधानसभा क्षेत्र का नाम मातीगारा-नक्‍सलबाड़ी है, जहां इस बार संपन्न हुए विधानसभा चुनाव में बीजेपी के प्रत्याशी आनंदमय बर्मन ने कांग्रेस प्रत्याशी राजेन सुन्दास को 70848 मतों से पराजित किया। ज्ञात हो कि मातीगारा-नक्‍सलबाड़ी सीट दार्जिलिंग जिले में आती है। इस सीट पर इससे पहले लगातार दो बार कांग्रेस पार्टी के उम्मीदवार ने अपना परचम फहराया था। 2011 में इस सीट पर कांग्रेस प्रत्याशी ने जीत दर्ज की थी, वहीं 2016 में भी कांग्रेस प्रत्याशी शंकर मालाकार ने तृणमूल कांग्रेस के अमर सिन्हा को 18627 मतों के अंतर से हराया था। तब यहां करीब 84 प्रतिशत वोट पड़े थे। इस बार शंकर मालाकार को 23060 मत प्राप्त हुए।

क्या संदेश देता है नक्सलबाड़ी

दरअसल राजनीति में बदलते समीकरण अपना संदेश साफ तौर पर दे रहे होते हैं। कागजों पर जितने समीकरण उभरते हैं, उससे उलट धरातल पर पकता रहता है। इनमें कई राज छुपे होते हैं, जो उस राजनीतिक उलटफेर की तरफ इशारा करते हैं, जो भविष्य में घट सकता है। वो नक्सलबाड़ी जिसकी पहचान कभी माओवादियों के हिंसक आंदोलन के कारण होती है, वो आने वाले समय के लिए बडा संदेश दे रहा है। दरअसल 2016 के विधानसभा चुनाव में 10.16 प्रतिशत मत को हासिल कर महज तीन सीटों पर जीत दर्ज करने वाली बीजेपी ने 2021 के विधानसभा चुनाव में करीब 38 प्रतिशत वोट को हासिल किया है। अगर पीछे के राजनैतिक घटनाक्रम को देखें तो त्रिपुरा एक बडा उदाहरण हो सकता है, जहां बीजेपी ने करीब 43 प्रतिशत वोट हासिल करके 25 सालों से सत्तासीन लेफ्ट पार्टियों को सत्ता से बेदखल कर दिया था। नक्सलबाड़ी में बीजेपी प्रत्याशी की जीत व कभी महज तीन सीट तथा करीब दस प्रतिशत वोट और अब लगभग 38 प्रतिशत तक के वोट का सफर तय करने वाली बीजेपी आज सूबे की मुख्य विपक्षी दल बनने में कामयाब रही है। यह सारे समीकरण इस बात की तरफ स्पष्ट इशारा कर रहे हैं कि आने वाले वक्त में हो सकता है कि कभी वाम दलों के लिए अभेद्य किला रहे और तीन बार से तृणमूल कांग्रेस को सत्ता का स्वाद चखाने वाले पश्चिम बंगाल में बीजेपी खुद को और मजबूत करे और त्रिपुरा की तरह यहां भी सरकार बना ले। 

वाम दलों के वोट प्रतिशत में लगातार हुई गिरावट

पश्चिम बंगाल में संपन्न हुए इस बार की विधानसभा चुनाव में वाम दलों के वोट प्रतिशत में लगातार गिरावट देखने को मिली है। अगर 2016 के विधानसभा चुनाव परिणाम को देखे तो जहां सीपीआइ को 1.45 प्रतिशत मत प्राप्त हुए थे और पार्टी एक सीट पर जीत मिली थी वहीं सीपीआइएम ने 26 सीटों पर अपनी जीत दर्ज की थी। तब सीपीआइएम को 19.75 प्रतिशत मत मिले थे। जबकि इस बार के विधानसभा चुनाव में वाम दलों का सूपड़ा साफ हो गया। इस बार जहां सीपीआइ को 0.20  प्रतिशत वोट प्राप्त हुए वहीं सीपीआइएम को 4.72 प्रतिशत तथा सीपीआइएमएल को 0.03 प्रतिशत मत मिले। यहां गौर करने वाली बात है कि इस चुनाव में एक निर्दलीय व क्षेत्रिय पार्टी राष्ट्रीय सेक्युलर मजलिस पार्टी के एक उम्मीदवार ने जीत दर्ज की है।



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