बिहार में बहार है नितीशे कुमार है : न पीपुल फ्रेंडली पुलिसिंग, न लोक हितैषी प्रशासन जो कहें सीएम वही है अफसरों का अनुशासन

बिहार में बहार है नितीशे कुमार है : न पीपुल फ्रेंडली पुलिसिंग, न लोक हितैषी प्रशासन जो कहें सीएम वही है अफसरों का अनुशासन

DESK : बिहार में अफसरशाही से जनता के त्रस्त रहने की बातें आये दिन सुर्खियां बनती रहती हैं. चाहे विपक्ष हो या मुख्यमंत्री का जनता दरबार हर ओर से अफसरशाही का दंश झेलने की शिकायत बेहद आम हो चुकी है. यहाँ तक कि अफसरशाही के रोआब से सरकार के मंत्री और विधायक भी नहीं बच रहे हैं. पिछले कुछ महीनों में ही कई वाकये सामने आए हैं जब अफसरशाही से परेशान राज्य के मंत्रियों ने अपनी ही सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया. 

सरकार में शामिल मंत्री और विधयाकों द्वारा भले सार्वजनिक रूप से कुछ न कहा जाता हो लेकिन ऑफ रिकोर्ड सब मानते हैं राज्य में अफसरशाही हावी है. मुख्यमंत्री को छोड़ दें तो इक्के दुक्के ही ऐसे कोई सत्ताधारी नेता हैं जिनकी हनक अधिकारी मानें. दिसम्बर 2018 में राजद नेता तेज प्रताप यादव के पास फरियाद लेकर पहुंची एक महिला से सम्बंधित मामले में तेज प्रताप ने पटना के एक थानेदार को फोन किया था. उस समय तेज प्रताप ने थानेदार पर बदतमीजी करने का आरोप लगाया और थाने का घेराव करने पहुंच गये थे. काफी हो हंगामा के बाद मामला शांत हुआ था. 


इसी साल जुलाई 2021 में राज्य के समाज कल्याण मंत्री मदन सहनी ने अफसरशाही से परेशान होने का आरोप लगाकर इस्तीफे की बात कर दी थी. सहनी के मामले में सरकार की खूब छीछालेदर हुई थी. वहीं कुछ ऐसे मामले भी आये जब सरकार ने मंत्री और विधयाकों ने अपनी शिकायत मुख्यमंत्री से की. ऐसी ही शिकायतों पर संज्ञान लेते हुए मुख्यमंत्री की ओर से नवंबर 2021 में बिहार सरकार ने अधिकारीयों को निर्देश जारी किया था. सामान्य प्रशासन विभाग ने पत्र जारी कर अधिकारिओं को सांसदों, मंत्रियो और विधायकों से शिष्टाचार से पेश आने का सुझाव दिया था. पत्र में साफ तौर पर कहा गया था कि वारंट ऑफ़ प्रेसिडेंट में व्यक्त है कि सांसद हमेशा ही सचिव से ऊपर होते हैं. पत्र में यहाँ तक कहा गया कि जब सांसद और विधायक मिलने आयें तब अधिकारी अपनी जगह से उठकर उनका स्वागत करें. 

हालांकि सामान्य प्रशासन विभाग के सुझाव का कोई खास असर अधिकारीयों पर पड़ता नहीं दिख रहा. पत्र जारी होने के एक पखवाड़े बाद ही 2 दिसम्बर को मंत्री जीवेश मिश्रा की गाड़ी रोककर अधिकारियों की गाड़ी निकालने का विवाद हुआ. 

ऐसे में पीपुल फ्रेंडली पुलिसिंग और लोक हितैषी प्रशासन की दिशा में राज्य में व्यापक स्तर में सुधार की आवश्यकता महसूस होने लगी है. मुख्यमंत्री के जनता दरबार में भी आम नागरिकों की ओर से ऐसी शिकायतें आती हैं. हालांकि अफसरशाही के चरम पर होने के आरोपों के बीच मुख्यमंत्री के आदेश का खूब पालन होते दिखता है. इसी सप्ताह जब विधानमंडल परिसर में शराब की बोतलें मिलने की बात सामने आई तब नीतीश कुमार के आदेश पर स्वयं राज्य के डीजीपी और मुख्य सचिव जांच को पहुँच गये.

प्रिय दर्शन शर्मा की रिपोर्ट 

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