रिक्शाचालक की बेटी स्वप्ना बर्मन बनीं गोल्डन गर्ल, कामयाबी के पीछे की कहानी सुन आंखों में आ जाएंगे आंसू

रिक्शाचालक की बेटी स्वप्ना बर्मन बनीं गोल्डन गर्ल, कामयाबी  के पीछे की कहानी सुन आंखों में आ जाएंगे आंसू

स्वप्ना बर्मन, एक ऐसा नाम जिसने दुनिया में अपने नाम के झंडे गाड़ दिये। एक ऐसा नाम, जिसने ख़राब परिस्थितियों को दरकिनार कर विश्व में अपनी प्रतिभा को लोहा मनवाया। जी हां, पश्चिम बंगाल की जलपाईगुड़ी की रहवासी स्वप्ना बर्मन ने एशियन गेम्स 2018 में सोने का तमगा जीतकर पूरी दुनिया में हिन्दुस्तान के नाम का डंका बजा दिया है। रिक्शाचालक की बेटी स्वप्ना ने असहनीय दर्द सहकर भी 18वें एशियाई खेलों की हेप्टाथलॉन स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीतकर अपने माता-पिता का नाम रौशन किया है। इस स्पर्धा में गोल्ड मेडल जीतने वाली वे पहली महिला हैं। स्वर्ण पदक विजेता स्वप्ना बर्मन की माने तो स्पर्धा शुरू होने से पूर्व उनकी दांतों में असहनीय पीड़ा हो रही थी लेकिन इसके बावजूद भी उन्होंने जज्बा बरकरार रखा और चेहरे पर पट्टी बांधकर मैदान में उतरीं। उनके मुताबिक बचपन से ही असहनीय दर्द झेलने की वे आदी हो चुकी हैं, उनसे पार पाकर ही इस मुकाम तक पहुंची हैं लिहाजा इस बड़े प्लेटफॉर्म पर आकर इस तरह की पीड़ा उनका रास्ता नहीं रोक सकती इसलिए उन्होंने चेहरे पर टेप लगाकर सारी बाधाओं को पार करते हुए सोने पर कब्जा किया। स्वप्ना के मुताबिक फिलहाल गोल्ड मेडल जीतने के बाद ये दर्द भी रफूचक्कर हो गया है।

ग़रीबी को हरा भरी ऊंची उड़ान

ग़ौरतलब है कि जलपाईगुड़ी के घोषपाड़ा की रहने वाली स्वप्ना बर्मन ने अपने करियर में कई झंझावतों को झेला है। रिक्शाचालक पिता और चायबगान में मजदूरी करने वाली मां की प्रतिभाशाली बेटी अबतक ग़रीबी का दंश झेल रही है। टीन शेड में रहने वाले माता-पिता ने बेटी स्वप्ना के सपने को ऊंची उड़ाने देने के लिए कई मुश्किलातों का सामना किया है लेकिन ख़राब हालात के आगे कभी हार नहीं मानी। स्वप्ना की मां बशोना के मुताबिक हम कभी उसकी जरूरतों को पूरा नहीं कर पाते थे लेकिन फिर उनकी बेटी शिकायत नहीं करती थी। हेप्टाथलॉन चैंपियन स्वप्ना बर्मन की मां की माने तो बचपन से ही उसे एक अदद जूतों के लिए संघर्ष करना पड़ा। दरअसल, इस स्टार खिलाड़ी के दोनों पैरों में छह-छह उंगलियां है लिहाजा उनकी नाप के जूते बाज़ार में नहीं मिलते। नॉर्मल जूतों को अगर जबरन पहनने की कोशिश करती तो उसकी लैंडिंग सही नहीं हो पाती और जल्द ही फट जाते इसलिए अपने नाप के जूते के लिए काफी जद्दोजहद करना पड़ा।

खुशी से फूले नहीं समा रहे परिजन

फिलहाल बेटी की शानदार सफलता के बाद फूली नहीं समा रही स्वप्ना की मां भावुक होते हुए कहती है कि आज हमारा सपना पूरा हो गया।हालांकि वे अपनी बेटी की स्पर्धा को देख नहीं पायी थी। मैच से पूर्वबेटी द्वारा निर्मित काली मां के मंदिर में उन्होंने ख़ुद को बंद कर लिया था और लगातार भगवान से जीत की अर्जी लगाती रहीं। हालांकि जब सफलता मिली तो चैंपियन स्वप्ना बर्मन के माता-पिता की आंखों से आंसू छलक पड़े। मां बशोना पूरी तरह से बदहवास हो गयीं और मां काली का शुक्रिया अदा करने के लिए मंदिर की तरफ़ दौड़ पड़ीं। विदित है कि हेप्टाथलॉन की चैंपियन के पिता पंचन बर्मन रिक्शा चलाते हैं लेकिन बीते कुछ दिनों से नासाज़ तबीयत की वजह से बिस्तर पर हैं।

राहुल द्रविड़ ने भी की थी मदद

एशियाई गेम्स की हेप्टाथलॉन प्रतियोगिता में सोने का तमगा हासिल करने वाली स्वप्ना बर्मन के कोच के मुताबिक उसे इस मुकाम तक पहुंचने के लिए काफी मुश्किलातों का सामना करना पड़ा है। इस खेल से संबंधित महंगे उपकरणों को खरीदने से हमेशा वंचित रही है लेकिन फिर भी हार नहीं मानी है। वह काफी ग़रीब परिवार से आती है और ट्रेनिंग का खर्चा उठाना उसके लिए मुश्किल होता है। उन्होंने स्वप्ना की इस कामयाबी के पीछे SAI यानी स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया के साथ-साथ पूर्व क्रिकेटर राहुल द्रविड़ का हाथ बताया और कहा कि राहुल द्रविड़ ने उसकी काफी मदद की है और फिटनेस संबंधित अहम टिप्स देते रहे हैं। विदित है कि राहुल द्रविड़ गो स्पोर्ट्स संस्था से जुड़े हैं, जो ओलंपिक और पैरालंपिक की तैयारी कर रहे खिलाड़ियों की मदद करती है।

क्या होता है हेप्टाथलॉन

एशियन गेम्स 2018 में हेप्टाथलॉन स्पर्धा के दौरान स्वप्ना बर्मन ने कुल सात बाधाओं को पार कर स्वर्ण पदक जीता है। इस स्पर्धा में कुल सात स्टेज होते हैं। सर्वप्रथम 100 मीटर की फर्राटा रेस होती है और फिर हाईजंप। तीसरे नंबर पर शॉटपुट, चौथे में 200 मीटर की रेस होती है। इसके बाद 5वें नंबर पर लांगजंप, छठे पर जेवलिन थ्रो और फिर आखिरी चरण में यानी सातवें स्टेज में 800 मीटर की फर्राटा रेस होती है। इन सभी स्टेज में प्रदर्शन के आधार पर एथलीट को अंक दिये जाते हैं और फिर विनर का फैसला होता है। स्वप्ना ने इन सात स्पर्धाओं में कुल 6026 अंकों के साथ पहला स्थान हासिल किया। फिलहाल तमाम झंझावतों को दरकिनार कर हेप्टॉथलॉन चैंपियन बनने के लिए स्वप्ना बर्मन को सलाम।

साभार: प्रसून पाण्डेय,  पत्रकार

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