UP NEWS : कार को बनाया कोविड वार्ड, कुछ इस तरह भाई-बहन ने बचाई अपनी मां की जान

UP NEWS : कार को बनाया कोविड वार्ड, कुछ इस तरह भाई-बहन ने बचाई अपनी मां की जान

DESK : कोरोना के कारण हर वर्ग प्रभावित हैं। अस्पतालों में इलाज के लिए लोगों को बेड नहीं मिल रहे हैं। लोग भटक रहे हैं। इनमें के कुछ लोग जुगाड़ कर वैकल्पिक व्यवस्था कर अपना काम चला रहे हैं। ऐसी ही एक जुगाड़ की व्यवस्था यूपी के लखीमपुर खिरी जिले से सामने आयी है। यहां एक भाई-बहन ने अपनी कोरोना से संक्रमित मां को बचाने के लिए अनोखा रास्ता अपनाया है। भाई-बहन ने अपनी मां के इलाज के लिए अपनी कार को 'कोरोना वॉर्ड' की शक्ल दे दी और कार में ही दस दिनों तक इलाज चलता रहा। हालांकि हौसले की ये दास्तां हमारे बेहाल हेल्थ सिस्टम पर सवाल भी उठाती है। 

बताया गया कि बीते 20 अप्रैल को 25 साल की पायल और उनका 23 साल का भाई आकाश लखीमपुर खीरी से अपनी मां को डायलिसिस के लिए लखनऊ लेकर आए थे। उन्होंने सोचा कि मां का डायलिसिस कराने के बाद शाम तक वह अपने घर लौट जाएंगे। आमतौर पर ऐसा ही होता था लेकिन दुर्भाग्य से उसी दिन मां को तेज बुखार आ गया तो उन्होंने मां का आरटी-पीसीआर टेस्ट कराया। रिपोर्ट आने तक तीनों किसी रिश्तेदार या होटल में ठहरने की जगह अस्पताल के पार्किंग में ही रूक गए। यहीं उन्होंने ठेले से खाना खरीदकर खाया और कार में सो गए।

रिपोर्ट पॉजिटिव होने के बाद नहीं हुआ डायलसिस

दोनों भाई बहनों ने बताया कि अगले दिन रिपोर्ट पॉजिटिव आई, जिसके बाद अस्पताल वालों ने डायलसिस करने से इनकार कर दिया। उन्होंने बताया कि अब हमारे पास लखीमपुर जाने का विकल्प नहीं था। हमने सरकार से मदद मांगी लेकिन नतीजा सिफर था। किसी तरह 1300 रुपये में ऑक्सिजन की 5 कैन मिली। यह कैन कुछ मिनट चलीं। इसके बाद भी हम लोग कुछ बेहतर होने की उम्मीद में लखनऊ में डटे रहे। अस्पताल डायलिसिस के लिए राजी हुआ क्योंकि मेरी मां का ऑक्सीजन लेवल काफी सुधर चुका था।

असली चुनौती इसके बाद

दोनों भाई बहनों और उसकी बहन के लिए इसके बाद सबसे बड़ी परेशानी थी,  क्योंकि कोरोना से मां को बचाने के लिए अस्पताल में भर्ती करना जरुरी था, लेकिन बेड नहीं मिलने के कारण परेशानी थी। पायल ने बताया कि अगले दिन पिताजी ऑक्सीजन लेकर लखनऊ आ गए। जिसके बाद कार के छत पर ही ऑक्सीजन सिलेंडर बांध दिया गया। कार की पिछली सीट को बेड बना दिया गया। जिस पर मां को रखा गया। वहीं अगली सीट पर दोनों खुद दोनों रहने लगे। पायल बताती हैं कि इस दौरान भाई को भी कोरोना हो गया। लगभग पांच दिन तक तीनों के लिए कार ही ठिकाना बना रहा, इसके बाद अस्पताल में बेड मिला। 30 अप्रैल को कोरोना निगेटिव रिपोर्ट आने के बाद उन्हें डिस्चार्ज कर दिया गया।


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