विष्णुपद मंदिर को धार्मिक न्यास बोर्ड को दिए जाने से गया का पांडा समाज नाराज, जाएंगे हाईकोर्ट

विष्णुपद मंदिर को धार्मिक न्यास बोर्ड को दिए जाने से गया का पांडा समाज नाराज, जाएंगे हाईकोर्ट

गया। गया के विश्व प्रसिद्ध विष्णुपद मंदिर को लेकर जिले के व्यवहार न्यायालय ने बड़ा फैसला दिया है। मंदिर  को लेकर 27 साल पुराने मामले पर कोर्ट ने अपने फैसले में बिहार राज्य धार्मिक न्यास बोर्ड को देखरेख की जिम्मेदारी सौंपी है।  मंदिर को लेकर कोर्ट ने गयापाल के दावे को खारिज कर दिया है। उक्त फैसला प्रथम व पीठासीन पदाधिकारी बी के मिश्रा की अदालत ने सुनाया है। वहीं कोर्ट के इस फैसले को लेकर गया के पांडा समाज ने नाराजगी जाहिर की है और हाईकोर्ट में जाने की बात कही गई है।

सोमवार कोर्ट के इस फैसले को लेकर बिहार राज्य धार्मिक न्यास बोर्ड के अधिवक्ता राजन प्रसाद ने बताया कि विष्णुपद मंदिर के प्रबंधन को लेकर 27 सात पहले 1993 में एक याचिका दायर की गई थी। सुनवाई पहले हो चुकी थी सोमवार को फैसला सुनाया आया है। उन्होंने बताया कि 38/77 हकीयत केस में 1992 में गयापालों के पक्ष में एकतरफा फैसला हुआ था। जिसके बाद इसे गलत करार देते हुए 1993 में अपील किया था। उसी अपील में सोमवार को फैसला आया है और धार्मिक न्यास बोर्ड के पक्ष में निर्णय हुआ। 

गयापाल की निजी संपत्ती नहीं 

इससे पहले गयापालों द्वारा इस बात का दावा किया जाता रहा है कि विष्णुपद मंदिर उन लोगों की निजी संपत्ती है। इसमें धार्मिक न्यास बोर्ड या दूसरे को किसी प्रकार के हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं है। अब गयापाल के इस दावे को अदालत ने नकार दिया है। फैसला आने के बाद मंदिर में कुछ बदलेगा नहीं। पहले जैसा ही दर्शन-पूजन होंगे। यह सार्वजनिक मंदिर है। फैसला आने के बाद धार्मिक न्यास बोर्ड की मैनेजमेंट कमेटी बरकरार रहेगी। 

पंडाओं ने जताई नाराजगी

ऐतिहासिक विष्णुपद मंदिर को सार्वजनिक स्थल घोषित किए जाने एवं इसका प्रबंधन बिहार राज्य धार्मिक न्यास बोर्ड को दिए जाने को लेकर गयापाल समाज में नाराजगी है। इस संबंध में विष्णुपद मंदिर प्रबंधकारिणी समिति के सचिव गजाधर लाल पाठक ने कहा कि वे लोग इंसाफ की लड़ाई विगत कई वर्षों से लड़ रहे हैं। उन्होंने कहा कि बिहार राज्य धार्मिक न्यास बोर्ड विष्णुपद को मंदिर मानते हुए, इसका प्रबंधन अपने हाथो में लेना चाह रहा है।  

मंदिर नहीं श्राद्ध स्थल है विष्णुपद मंदिर 

श्री पाठक ने कहा कि  विष्णुपद कोई मंदिर नहीं है। यह श्राद्ध स्थल है।उन्होंने कहा कि पौराणिक मान्यता के अनुसार गयासुर राक्षस ने वर्षों तपस्या कर भगवान विष्णु से मृत्यु के बाद आत्मा की मोक्ष की प्राप्ति के लिए स्वयं अपने वक्षस्थल पर उनका चरण मांगा था। जिसके बाद से भगवान विष्णु का चरण यहां पर स्थापित है। जहां लोग श्राद्ध कर्मकांड करते हैं। लेकिन बिहार राज्य धार्मिक न्यास बोर्ड इसे मंदिर मानने में लगा हुआ है। जितने भी श्राद्ध स्थल है, उन्हें मंदिर नहीं बल्कि श्राद्ध स्थल माना जाता हैं। ऐसे में न्यायालय के इस फैसले को लेकर हमलोग हाईकोर्ट जाएंगे और इंसाफ की लड़ाई अंतिम समय तक लड़ते रहेंगे। उन्होंने कहा कि अभी न्यायालय का जो फैसला आया है, उसे हमलोगों ने ठीक से पढ़ा नहीं है। लेकिन पढ़ने के बाद हमारे समिति के सदस्य एवं हमारे वकील इस पर निर्णय लेंगे। इसके लिए हमारा एक शिष्टमंडल पटना गया हुआ है। उन्होंने कहा कि लगभग 10 हजार से भी अधिक पंडों का परिवार इस विष्णुपद से जुड़ा हुआ है। ऐसे में हमारे लिए विष्णुपद काफी महत्वपूर्ण है। अपने इंसाफ की लड़ाई हमलोग मरते दम तक लड़ते रहेंगे।

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