आधुनिकता की दौड़ में भी आखिर क्यों पिछड़ गई आधी आबादी ? समझिए ऐतिहासिक व सामाजिक कारण

आधुनिकता की दौड़ में भी आखिर क्यों पिछड़ गई आधी आबादी ? समझिए ऐतिहासिक व सामाजिक कारण

Desk. 8 मार्च को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाया जाता है। यह इसलिए मनाया जाता है, ताकि सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक क्षेत्र में महिलाओं को सशक्त बनाया जा सकें, लेकिन अधुनिकता के तमाम साधन उपलब्ध होने के बावजूद भी महिलाओं की स्थिति संतोषजनक नहीं है। ऐसा नहीं है कि कोई एक समाज या देश में इनकी स्थिति अच्छी नहीं हो, बल्कि पूरी दुनिया में ही इसे भोग और विलासता की वस्तु समझी जाती है और पुरुषों द्वारा इस पर अधिकार जमाया जाता है। आधी आबादी होते हुए भी इन्हें सभी क्षेत्रों में पीछे रखा गया है।

क्यों पिछड़ गई आधी आबादी?

मानव सभ्यता की वजूद बचाने वाली आधी आबादी पुरुषों के समानांतर जिंदगी शुरुआत करते हुए भी पुरुषों से पीछे क्यों रह गई? भारतीय परिप्रेक्ष्य में इस पर ऐतिहासिक नजर डाले तो पाएंगे कि ऋगवैदिक काल में नारियों की स्थिति अच्छी थी और इसे देवी और दूर्गा का रूप माना जाता था। हड़प्पा सभ्यता में तात्कालीन समाज मातृसत्तात्मक था और डिशिजन मेकिंग में पुरुष-महिला की समान भागीदारी थी। जैसे ही उत्तरवैदिक काल आता है, राजा-महाराजाओं की अवधारणा आती है और जैसे-जैसे इसका विस्तार होता है, वैसे-वैसे महिलाओं की स्थिति में गिरावट और पुरुषों की शक्ति में वृद्धि होती चली जाती है। यह सिलसिला वर्तमान समय में भी जारी है और महिलाओं की बदतर हालत के लिए जिम्मेदार है।

परिवार से समाज तक सभी है जिम्मेदार

महिलाओं की इस स्थिति के लिए कोई एक कारक जिम्मेदार नहीं है, बल्कि पूरे सामाजिक ढांचा और व्यवस्था जिम्मेदार है। जब महिला के रूप में बच्ची का जन्म होना होता है, तो या तो उसे जन्म से पहले ही मार देने की कोशिश होती है या फिर जन्म के बाद पालन पोषण में लड़कों की अपेक्षा त्रुटी की जाती है। जब थोड़ी बड़ी होती है, तो तमाम बंदिशे- क्या पहनना है, कहां जाना है, कब जाना है, कैसे रहना है आदि जैसे स्वतंत्रता पर लगाम लगा दी जाती है। खेलने की उम्र में तमाम बंदिशों की कैद में जिंदगी गुजारनी पड़ती है। शादी होने के बाद पति और परिवार की सेवा ही एकमात्र ध्येय रह जाता है।

हाई सोसायटी की अपेक्षा लोअर की स्थिति है ज्यादा बदतर

वैसे तो हर समाज में महिलाओं की स्थिति पुरुषों की तुलना में निम्न कोटी की है, लेकिन हाई सोसायटी की अपेक्षा निम्न सोसायटी में यह खाई और भी चौड़ी है। हाथरस-उन्नाव जैसे तमाम मामले यह साबित करता है कि निम्न परिवेश में जीवन यापन करने वाली महिलाओं की स्थिति एक जानवर की तरह है। ग्रामीण क्षेत्रों में मजदूरी करते महिलाओं को देखेंगे, तो पता चलेगा कि किस तरह महिला जिंदगी जीने को मजबूर है। अपराध के आकड़ों पर अनुसंधान किया जाए, तो पता चलता है कि ज्यादातर हिंसक वारदातें और क्रूरता का सामना निम्न सोसायटी की महिलाओं को ही करना पड़ता है।

बढ़ता वुमन क्राइम पुरुषवादी मानसिकता का द्योतक

पुरुष अपना धाक जमाने के लिए महिलाओं पर तरह तरह के अत्याचार करते हैं, जैसे वो मानव नहीं अभिशापित जानवर हो। महिलाओं की हत्या, बलात्कार, क्रुरता आदि हैवानी मानसिकता यह दर्शाता है कि इसके साथ कुछ भी किया जा सकता है। एनसीआरबी के आकड़ों में बढ़ता वुमन क्राइम यह प्रमाणित करता है कि महिलाओं के प्रति पुरुषों का नजरिया घिनौना है। महिला सशक्तिकरण के तमाम दावे अनेकों योजनाओं के बावजूद भी यदि वुमन क्राइम ग्राफ बढ़ रहा है, तो ये पुरुषवादी मानसिकता का द्योतक है।

स्वस्थ्य, शिक्षा और सोच बदलने पर देना होगा बल

ऐसा माना जाता है कि महिल पुरुष की अपेक्षा कमजोर होती है, इसलिए उन्हें अत्याचार का सामना करना पड़ता है, लेकिन ऐसा कोई साइंटिफिक रिजन या बायोलॉजिकल कारक समने नहीं आया है, जिससे पता चले कि महिला पुरुष की तुलना में कमजोर होती। जरूरत है स्वस्थ्य और प्रशिक्षण की, यदि इस पर बल दिया जाए, तो महिलाओं को भी पुरुष के समानांतर खड़ा किया जा सकता है। जरूरत है, अपनी सोच बदलने की और महिलाओं को आगे लाने के लिए सहायता करने की। कोई जरूरी नहीं है कि घर, समाज और देश का मुखिया सिर्फ पुरुष ही बने महिला भी इसे बखूबी निभा सकती है।

क्या है महिला दिवस का इतिहास

1908 में अमेरिका की महिलाओं ने वेतन वृद्धि, काम की समय अवधि कम करने और मतदान के अधिकार के लिए प्रदर्शन किया था। तब से अमेरिका में महिला दिवस मनाया जाने लगा। इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मनाने के लिए 1910 में कॉपहेगन में विश्व स्तरीय कामकाजी महिलाओं की मीटिंग में मांग की गई। इसके बाद 1911 में पहला अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाया गया, लेकिन इसकी तारिख निश्चित नहीं थी। 1917 में रूस क्रांति के दौरान महिलाओं ने शांति और रोटी नाम से प्रदर्शन किया, यह प्रदर्शन अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार 8 मार्च को किया गया था। तब से 8 मार्च को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाया जाने लगा। फिर 1975 में यह दिवस संयुक्त राष्ट्र संघ के अधीन आ गया। तब से संयुक्त राष्ट्र संघ की थीम पर 8 मार्च को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाया जाने लगा।

@pankaj

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