131 दिन बाद खामेनेई को अंतिम विदाई,जनाजा हुआ, लेकिन उत्तराधिकारी नहीं दिखे, मोजतबा की गैरहाजिरी ने बढ़ाई हलचल
Ayatollah Ali Khamenei: ईरान की सियासत और पश्चिम एशिया की बदलती तस्वीर के बीच पूर्व सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई के अंतिम संस्कार ने एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय हलकों में नई बहस छेड़ दी।...
Ayatollah Ali Khamenei: ईरान की सियासत और पश्चिम एशिया की बदलती तस्वीर के बीच पूर्व सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई के अंतिम संस्कार ने एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय हलकों में नई बहस छेड़ दी। 131 दिनों के लंबे इंतजार के बाद शुक्रवार तड़के उन्हें उनके पैतृक शहर मशहद स्थित इमाम रजा दरगाह के दार-अल-जिक्र परिसर में सुपुर्द-ए-खाक किया गया। हालांकि पूरे जनाज़े की सबसे बड़ी चर्चा उनके बेटे और उत्तराधिकारी मोजतबा खामेनेई की गैरमौजूदगी को लेकर रही, जिसने सियासी गलियारों में कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
बताया जा रहा है कि अयातुल्ला खामेनेई की मौत 28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इज़रायल के संयुक्त हवाई हमले में हुई थी। क्षेत्र में छिड़े युद्ध और सुरक्षा हालात के चलते उनका अंतिम संस्कार कई महीनों तक टलता रहा। शुक्रवार को हजारों लोगों की मौजूदगी में उन्हें पूरे एहतराम के साथ दफनाया गया। अंतिम यात्रा के दौरान मातम, नौहाख्वानी और ग़म का माहौल देखने को मिला। समारोह में संसद अध्यक्ष मोहम्मद बाघेर कालिबाफ, मुख्य न्यायाधीश गुलामहुसैन मोहसेनी एजेई और खामेनेई के बड़े बेटे मुस्तफा खामेनेई समेत कई वरिष्ठ ईरानी हस्तियां मौजूद रहीं।
पूरे कार्यक्रम में नए सुप्रीम लीडर मोजतबा खामेनेई का नज़र नहीं आना सबसे बड़ी चर्चा का विषय बना रहा। 28 फरवरी के हमले के बाद से वह सार्वजनिक मंच पर दिखाई नहीं दिए हैं। उनके नाम से लिखित संदेश जारी होते रहे हैं, लेकिन अब तक उनकी कोई तस्वीर, वीडियो या ऑडियो सामने नहीं आई है। इसी वजह से उनके स्वास्थ्य और सुरक्षा को लेकर तरह-तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं।
ईरानी मीडिया में यह भी चर्चा है कि मोजतबा खामेनेई जल्द ही क़ोम में आयोजित एक श्रद्धांजलि कार्यक्रम में सार्वजनिक रूप से शामिल हो सकते हैं। यदि ऐसा होता है, तो यह हमले के बाद उनकी पहली सार्वजनिक मौजूदगी होगी। वहीं, मशहद स्थित इमाम रजा दरगाह, जहां अयातुल्ला खामेनेई को दफनाया गया, शिया मुसलमानों के सबसे पवित्र धार्मिक स्थलों में शुमार है। यही वजह है कि इस स्थान पर दफनाए जाने को केवल धार्मिक सम्मान ही नहीं, बल्कि ईरान की सियासत और प्रतीकात्मक विरासत से भी जोड़कर देखा जा रहा है।