Anand Mohan Release Case: आनंद मोहन की रिहाई पर घिर गई बिहार सरकार! आनंद मोहन की रिहाई पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी से बढ़ी सरकार की मुश्किलें, फैसला सुरक्षित, सियासत बेचैन

पूर्व सांसद आनंद मोहन की वक्त से पहले हुई रिहाई को चुनौती देने वाली याचिका पर गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में जोरदार बहस हुई। सुनवाई के दौरान जो तल्ख सवालात उठे, उन्होंने सूबे के सियासी गलियारों में खलबली मचा दी है।..

आनंद मोहन की रिहाई पर अदालती कठघरे में सियासत का अध्यादेश- फोटो : social Media

Anand Mohan Release Case: बिहार की सियासत में बाहुबल और कानून की जंग एक बार फिर देश की सबसे बड़ी अदालत के दहलीज पर नुमाया हुई है। पूर्व सांसद आनंद मोहन की वक्त से पहले हुई रिहाई को चुनौती देने वाली याचिका पर गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में जोरदार बहस हुई। अदालत ने तमाम पक्षों की जिरह सुनने के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है, लेकिन सुनवाई के दौरान जो तल्ख सवालात उठे, उन्होंने सूबे के सियासी गलियारों में खलबली मचा दी है।

इंसाफ की तराजू और हुकूमत की पैरवी

जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ के सामने याचिकाकर्ता उमा कृष्णैया, बिहार सरकार और आनंद मोहन के वकीलों ने अपनी-अपनी दलीलें पेश कीं।सरकार ने साल 2023 में जेल मैनुअल में किए गए फेरबदल को जायज ठहराने की पुरजोर कोशिश की, जिसके तहत आनंद मोहन को 16 साल की बामुशक्कत कैद के बाद 27 अप्रैल 2023 को सहरसा जेल से रिहा किया गया था। लेकिन अदालत के तेवरों से साफ था कि वह महज कागजी दांव-पेच से संतुष्ट नहीं है।

अदालत की तल्ख टिप्पणी

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने बेहद संजीदा और तीखे सवाल किए। पीठ ने पूछा कि अपनी ड्यूटी पर तैनात एक लोकसेवक (जी. कृष्णैया) की सरेआम हत्या को 'दुर्लभ से दुर्लभतम' (Rarest of Rare) मामलों की फेहरिस्त में क्यों नहीं रखा गया? अदालत ने अंदेशा जताया कि अगर ऐसे संगीन मामलों में मुजरिमों को सियासी रहमो-करम या कानूनी फेरबदल के जरिए राहत दी जाएगी, तो समाज में एक बेहद गलत संदेश जाएगा। इससे सरकारी मुलाजिमों का हौसला पस्त होगा और अपराधियों के हौसले बुलंद होंगे।

सियासी नफे-नुकसान और कानूनी कसौटी

बता दें  कि साल 2007 में मुजफ्फरपुर की निचली अदालत ने आनंद मोहन को सज़ा-ए-मौत सुनाई थी, जिसे बाद में पटना हाईकोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट ने उम्रकैद में तब्दील कर दिया था। अब सवाल यह है कि क्या वोट बैंक की सियासत और कानूनी संशोधनों के सहारे किसी मुजरिम की रिहाई को जायज ठहराया जा सकता है? अदालत का महफूज फैसला यह तय करेगा कि सूबे में 'कानून का इकबाल' बुलंद रहेगा या फिर सियासी मसनद (सत्ता) के फैसले अदालती इंसाफ पर भारी पड़ेंगे। पूरे मुल्क की नजरें अब इस बड़े फैसले पर टिकी हैं।