T20 World Cup: टी-20 विश्व कप की जीत पर पूर्व क्रिकेटर का विस्फोटक बयान- टीम इंडिया पर शर्म आती है, जश्न के बीच छिड़ा नया विवाद, जान लीजिए कारण

टी-20 विश्व कप की इस शानदार जीत की खुशबू अभी हवा में ही थी कि अचानक एक नया बखेड़ा खड़ा हो गया।...

'टीम इंडिया पर शर्म आती है'- फोटो : social Media

T20 World Cup: अहमदाबाद के भव्य मैदान में जब टीम इंडिया ने न्यूजीलैंड को धूल चटाकर टी-20 विश्व कप अपने नाम किया, तो पूरे मुल्क में जश्न का माहौल था। पटाखे फूटे, ढोल बजे, और क्रिकेट के दीवानों ने रातभर भारत माता की जय के नारे लगाए। कप्तान सूर्यकुमार यादव की अगुवाई में टीम ने ऐसा कमाल दिखाया कि हर हिंदुस्तानी का सीना फख्र से चौड़ा हो गया।  क्रिकेट की इस शानदार जीत की खुशबू अभी हवा में ही थी कि अचानक एक नया बखेड़ा खड़ा हो गया।

दरअसल, फाइनल जीतने के अगले ही दिन कप्तान सूर्यकुमार यादव, आईसीसी अध्यक्ष जय शाह और टीम के मुख्य कोच गौतम गंभीर अहमदाबाद के एक हनुमान मंदिर पहुंच गए। अब यहां तक तो सब ठीक थाहर किसी को अपनी आस्था निभाने का हक है।असली चर्चा तब शुरू हुई जब विश्व कप की चमचमाती ट्रॉफी भी मंदिर में हाजिरी देने पहुंच गई। बस फिर क्या था, सोशल मीडिया पर तस्वीरें और वीडियो ऐसे दौड़े जैसे टी-20 में चौके-छक्के बरसते हैं।

कुछ लोग बोले “भई, ये तो खिलाड़ियों की श्रद्धा है, इसमें हंगामा कैसा?” मगर दूसरी तरफ कुछ आवाजें ऐसी भी उठीं जिन्होंने इसे खेल और धर्म के खतरनाक मिक्सचर का नाम दे दिया। इसी सिलसिले में पूर्व क्रिकेटर और तृणमूल कांग्रेस के सांसद कीर्ति आजाद ने भी तल्ख अंदाज में अपनी राय पेश कर दी।

कीर्ति आजाद, जो 1983 की ऐतिहासिक विश्व कप विजेता टीम का हिस्सा रहे हैं, उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा-“टीम इंडिया पूरे भारत की नुमाइंदगी करती है, किसी एक धर्म या खानदान की नहीं।” उन्होंने याद दिलाया कि 1983 की टीम में हर मजहब के खिलाड़ी थे, हिंदू, मुस्लिम, सिख और ईसाई और उस वक्त ट्रॉफी पूरे देश की जीत मानी गई थी, किसी धार्मिक पहचान की नहीं।

आजाद ने सवाल भी दाग दिया “अगर ट्रॉफी मंदिर गई तो मस्जिद, चर्च या गुरुद्वारे क्यों नहीं?” उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि अगर मोहम्मद सिराज ट्रॉफी को मस्जिद ले जाते या संजू सैमसन चर्च लेकर जाते, तो क्या वही तालियां बजतीं?

अब इस पूरे मामले पर बहस जारी है कोई इसे आस्था का मामला बता रहा है, तो कोई खेल को धर्म से दूर रखने की नसीहत दे रहा है। मगर एक बात तय है, जनाब—क्रिकेट का मैदान जितना शांत दिखता है, उसके बाहर उतनी ही तेज सियासी और सामाजिक गेंदबाजी चलती रहती है।