Fake Paneer Crisis: पनीर का खौफनाक अर्थशास्त्र, मुनाफे का जहर या खाद्य सुरक्षा से खिलवाड़,नकली और एनालॉग पनीर का सच जानकर खाना छोड़ देंगे

Fake Paneer Crisis: विशिष्ट खाद्य पदार्थ के रूप में पहचाने जाने वाले पनीर को लेकर गहराता अविश्वास और मिलावट का धंधा आज एक गंभीर चुनौती बन चुका है।

पनीर का खौफनाक अर्थशास्त्र- फोटो : social Media

Fake Paneer Crisis: विशिष्ट खाद्य पदार्थ के रूप में पहचाने जाने वाले पनीर को लेकर गहराता अविश्वास और मिलावट का धंधा आज एक गंभीर चुनौती बन चुका है। हाल ही में दिल्ली और देश के अन्य हिस्सों में सामने आए नकली पनीर के मामलों ने हमारी खाद्य सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोल दी है। मुनाफे की हवस में उपभोक्ताओं की सेहत के साथ किया जाने वाला यह खिलवाड़ अब आम बात हो गई है।

दूध की कीमत के साथ लेबर चार्ज, ईंधन, परिवहन और अन्य खर्च जोड़ें दिए जाएं  तो पनीर की उत्पादन लागत करीब 300 रुपये किलो तक पहुंच जाती है।इसके बावजूद बाजार में 200 से 250 रुपये किलो तक पनीर आसानी से उपलब्ध है। ऐसे में सवाल है कि लागत से भी कम कीमत पर बिक रहा यह पनीर आखिर तैयार कैसे हो रहा है?

असली दूध के पनीर की जगह वेजिटेबल फैट, स्टार्च, प्लांट प्रोटीन और गैर-डेयरी उत्पादों से बने 'एनालॉग पनीर' का धड़ल्ले से इस्तेमाल किया जा रहा है।असली और नकली पनीर की लागत में 40 से 50 फीसदी तक का अंतर होता है, जो रेस्टोरेंट, कैटरर्स और कारोबारियों को अधिक मुनाफे का लालच देता है।

एनालॉग पनीर अपने आप में असुरक्षित नहीं है, लेकिन केमिकलयुक्त दूध और उससे तैयार होने वाला पनीर तो स्वास्थ्य के लिए बेहद हानिकारक हैं हीं। खाद्य सुरक्षा नियमों के बावजूद होटल और रेस्टोरेंट ग्राहकों को सही जानकारी दिए बिना सस्ते विकल्प परोस रहे हैं, जिससे उन्हें असली पनीर वाली पौष्टिकता नहीं मिलती।

इस गंभीर समस्या से निपटने के लिए केवल प्रतिबंध लगाना काफी नहीं है, बल्कि इसके अर्थशास्त्र और आर्थिक कारणों पर भी गौर करना होगा। एनालॉग पनीर के पैकेट पर स्पष्ट रूप से उसका सच लिखना अनिवार्य होना चाहिए। साथ ही, मिलावटखोरों पर सख्त कानूनी शिकंजा कसने के साथ-साथ उपभोक्ताओं को भी जागरूक होना होगा ताकि वे अपने अधिकारों के प्रति सजग रह सकें।