Prateek- Aparna Yadav Controversy: प्रतीक यादव से तलाक होने पर अपर्णा यादव को कितनी मिलेगी एलिमनी, जानिए क्यों हो रहा है चर्चा, क्या है इसके नियम
Prateek- Aparna Yadav Controversy: अगर पति-पत्नी दोनों की आय लगभग समान है, जैसे दोनों एक-एक लाख रुपये मासिक कमाते हैं, तो सामान्य स्थिति में गुजारा भत्ता जरूरी नहीं माना जाता। हालांकि इन मामलों में कोर्ट एलिमनी देने का आदेश दे सकता है।
Prateek- Aparna Yadav Controversy: समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव के भाई प्रतीक यादव ने सोमवार को हैरान कर देने वाला ऐलान किया। प्रतीक यादव ने सोशल मीडिया पर पोस्ट कर लिखा कि वो अपनी पत्नी अपर्णा यादव को जल्द ही तलाक देने वाले हैं। प्रतीक यादव द्वारा अपने वैवाहिक जीवन को लेकर सार्वजनिक बयान देने के बाद यह मामला सुर्खियों में है। प्रतीक यादव ने इंस्टाग्राम पोस्ट के जरिए संकेत दिया है कि वह पत्नी अपर्णा यादव से अलग होने और जल्द ही कानूनी रूप से तलाक की प्रक्रिया शुरू करने जा रहे हैं। इसके बाद स्वाभाविक रूप से सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि अगर तलाक होता है तो एलिमनी (गुजारा भत्ता) का क्या होगा?
एलिमनी का सवाल क्यों अहम है?
भारत में तलाक के मामलों में एलिमनी कोई स्वतः मिलने वाली चीज नहीं है। इसका मकसद किसी एक पक्ष को दंडित करना नहीं, बल्कि उस जीवनसाथी को आर्थिक सुरक्षा देना है जो तलाक के बाद कमजोर स्थिति में आ सकता है। यही वजह है कि प्रतीक–अपर्णा यादव के मामले में भी यह सवाल चर्चा में है।
क्या एलिमनी तय करने का कोई फॉर्मूला है?
भारतीय कानून में एलिमनी के लिए कोई तय गणितीय फॉर्मूला नहीं है। हर मामला उसके तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर देखा जाता है। फैमिली कोर्ट और हाईकोर्ट दोनों ही पति-पत्नी की आर्थिक स्थिति, कमाई की क्षमता और शादी के दौरान निभाई गई भूमिकाओं को ध्यान में रखती हैं।
अदालत किन बातों को सबसे ज्यादा महत्व देती है?
कोर्ट सबसे पहले यह देखती है कि पति और पत्नी की वर्तमान आय क्या है ? भविष्य में कमाने की क्षमता कितनी है? शादी के दौरान किसने क्या त्याग किया? क्या किसी एक ने परिवार या बच्चों के लिए अपना करियर छोड़ा? उद्देश्य यह होता है कि तलाक के बाद भी कमजोर पक्ष सम्मानजनक जीवन जी सके।
जीवनशैली और सामाजिक स्तर की भूमिका
अदालतें सिर्फ आय नहीं देखतीं, बल्कि यह भी परखती हैं कि शादी के दौरान दोनों किस तरह की जीवनशैली जी रहे थे। कोशिश रहती है कि तलाक के बाद जीवन स्तर में अत्यधिक गिरावट न आए। हालांकि इसका मतलब यह भी नहीं कि किसी एक पक्ष पर उसकी क्षमता से ज्यादा आर्थिक बोझ डाल दिया जाए।
सुप्रीम कोर्ट का रुख क्या कहता है?
सुप्रीम कोर्ट ने 2024 के परवीन कुमार जैन बनाम अंजू जैन मामले में साफ किया कि स्थायी एलिमनी तय करते समय कई फैक्टर्स देखे जाने चाहिए, जैसे- पति-पत्नी की सामाजिक और आर्थिक स्थिति, पत्नी और बच्चों की जरूरतें, दोनों की नौकरी, योग्यता और आय, शादी के दौरान का जीवन स्तर, परिवार के लिए किए गए त्याग और भुगतान करने की क्षमता। कोर्ट ने यह भी कहा कि एलिमनी का उद्देश्य संरक्षण है, सजा नहीं।
महिला-केंद्रित कानूनों के दुरुपयोग पर भी चेतावनी
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी माना है कि कुछ मामलों में महिला-केंद्रित कानूनों का दुरुपयोग हुआ है। इसलिए अगर पत्नी खुद आर्थिक रूप से मजबूत है और पति के बराबर या उससे ज्यादा कमाती है, तो जरूरी नहीं कि एलिमनी दी ही जाए।
कब एलिमनी जरूरी नहीं मानी जाती?
अगर पति-पत्नी दोनों की आय लगभग समान है, जैसे दोनों एक-एक लाख रुपये मासिक कमाते हैं, तो सामान्य स्थिति में गुजारा भत्ता जरूरी नहीं माना जाता। हालांकि बच्चों की देखभाल, मेडिकल खर्च या अन्य जिम्मेदारियों का भार अगर किसी एक पर ज्यादा है, तो कोर्ट सहायता का आदेश दे सकती है। यानी प्रतीक यादव और अपर्णा यादव के मामले में एलिमनी कितनी होगी या होगी भी या नहीं-यह पूरी तरह अदालत के फैसले पर निर्भर करेगा।