Bhojpur Encounter:एनकाउंटर या इंसाफ का कत्ल? भोजपुर में उबल पड़ा जनाक्रोश, न्याय मार्च में गूंजी जवाबदेही और कार्रवाई की मांग

Bhojpur Encounter: भोजपुर में कथित फर्जी एनकाउंटर को लेकर सियासी और सामाजिक तापमान लगातार बढ़ता जा रहा है।..

एनकाउंटर या इंसाफ का कत्ल? - फोटो : reporter

Bhojpur Encounter: भोजपुर में कथित फर्जी एनकाउंटर को लेकर सियासी और सामाजिक तापमान लगातार बढ़ता जा रहा है। शाहपुर थाना क्षेत्र के बिलौटी गांव निवासी भरत भूषण तिवारी की पुलिस मुठभेड़ में हुई मौत के खिलाफ अब लोगों का गुस्सा सड़कों पर खुलकर दिखाई देने लगा है। इंसाफ की मांग को लेकर शहर में निकाले गए विशाल न्याय मार्च ने प्रशासन और पुलिस की कार्यशैली पर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

शहर के पोस्ट ऑफिस चौक से शुरू होकर भगत सिंह चौक तक पहुंचे इस न्याय मार्च में बड़ी संख्या में युवाओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं और स्थानीय नागरिकों ने हिस्सा लिया। हाथों में तख्तियां और बैनर लिए प्रदर्शनकारी पूरे रास्ते कथित फर्जी एनकाउंटर के खिलाफ आवाज बुलंद करते रहे। मार्च के दौरान लोगों ने निष्पक्ष जांच, जवाबदेही और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की।

प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि 17 जून को हुई घटना को मुठभेड़ का नाम देकर असल तथ्यों पर पर्दा डालने की कोशिश की जा रही है। उनका कहना है कि भरत भूषण तिवारी की मौत की स्वतंत्र और पारदर्शी जांच होनी चाहिए, ताकि सच्चाई सामने आ सके। लोगों का दावा है कि यदि जांच निष्पक्ष हुई तो कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आ सकते हैं।

सामाजिक कार्यकर्ता  ने मार्च के दौरान कहा कि इस मामले में शामिल पुलिसकर्मियों पर हत्या का मुकदमा दर्ज किया जाए, उन्हें तत्काल निलंबित और गिरफ्तार किया जाए तथा स्पीडी ट्रायल के जरिए पीड़ित परिवार को न्याय दिलाया जाए। उन्होंने आरोप लगाया कि कानून के रखवालों पर यदि गंभीर आरोप हैं तो उनकी निष्पक्ष जांच और जवाबदेही तय होना जरूरी है।

हालांकि प्रदर्शन पूरी तरह शांतिपूर्ण रहा, लेकिन आंदोलनकारियों ने साफ संकेत दिया कि यदि उनकी मांगों को नजरअंदाज किया गया तो विरोध और व्यापक रूप ले सकता है। इस घटना ने भोजपुर में कानून व्यवस्था, पुलिस कार्रवाई और मानवाधिकारों को लेकर नई बहस छेड़ दी है।

फिलहाल मामले की सच्चाई जांच के दायरे में है, लेकिन एक बात साफ है कि भरत भूषण तिवारी की मौत अब सिर्फ एक पुलिस कार्रवाई का मामला नहीं रह गई है, बल्कि यह न्याय, जवाबदेही और व्यवस्था पर उठते सवालों का बड़ा प्रतीक बन चुकी है।

रिपोर्ट- नमोनारायण मिश्रा