छपरा की कालीबाड़ी में पारंपरिक 'सिंदूर खेला' के साथ मां दुर्गा को दी गई विदाई, गूंजी उलू ध्वनि और ढाक की थाप
छपरा स्थित ऐतिहासिक कालीबाड़ी में विजयादशमी के अवसर पर मां दुर्गा की विदाई बंगाली परंपरा और अपार धार्मिक उल्लास के बीच संपन्न हुई।सिंदूर खेला के दौरान बंगाली समुदाय की महिलाओं द्वारा निकाली गई पारंपरिक 'उलू ध्वनि' से पूरा वातावरण गूंज उठा...
Chapra : छपरा स्थित ऐतिहासिक कालीबाड़ी में विजयादशमी के अवसर पर मां दुर्गा की विदाई बंगाली परंपरा और अपार धार्मिक उल्लास के बीच संपन्न हुई। विधिवत पूजन, हवन और पुष्पांजलि के उपरांत बंगाली समुदाय की महिलाओं ने पारंपरिक 'सिंदूर खेला' का भव्य आयोजन किया। इस दौरान महिलाओं ने माता को सिंदूर अर्पित कर खोईचा दिया और अगले वर्ष फिर से आने का न्योता देते हुए भावभीनी विदाई दी।
बुजुर्ग महिला की अगुवाई में निभाई गई रस्म
विदाई की इस मुख्य रस्म की शुरुआत समुदाय की सबसे बुजुर्ग महिला द्वारा मां दुर्गा को सिंदूर और खोईचा अर्पित करके की गई। इसके बाद उन्होंने अन्य महिलाओं को सिंदूर लगाया। फिर क्या था, पूरा परिसर भक्ति और उत्साह से सराबोर हो गया। महिलाओं ने एक-दूसरे के माथे और गालों पर सिंदूर लगाकर इस सुहाग और उल्लास के पर्व 'सिंदूर खेला' की परंपरा को हर्षोल्लास के साथ निभाया।
उलू ध्वनि और ढाक की थाप से गूंजा परिसर
सिंदूर खेला के दौरान बंगाली समुदाय की महिलाओं द्वारा निकाली गई पारंपरिक 'उलू ध्वनि' से पूरा वातावरण गूंज उठा। शुभ अवसरों पर निकाली जाने वाली इस विशिष्ट ध्वनि और ढाक-ढोल की थाप के बीच महिलाओं ने एक-दूसरे को सिंदूर लगाकर मां दुर्गा से सुख, शांति और समृद्धि की कामना की। यह परंपरा आस्था, आपसी सौहार्द और गहरे सामुदायिक जुड़ाव का प्रतीक मानी जाती है।
105 वर्षों से चली आ रही है छपरा कालीबाड़ी की परंपरा
बंगाली समुदाय की सुजाता चक्रवर्ती ने जानकारी देते हुए बताया कि छपरा की यह कालीबाड़ी बिहार के सबसे प्राचीन कालीबाड़ी पूजा स्थलों में शुमार है। यहां पिछले 105 वर्षों से अनवरत मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित कर पूरी बंगाली रीति-रिवाज के साथ विधिवत पूजा-अर्चना की जाती है। इन नौ दिनों के दौरान हर शाम ढाक की थाप पर होने वाली विशेष आरती में शामिल होने के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु पहुंचते हैं।
अगले वर्ष के आगमन की प्रतीक्षा में डूबे श्रद्धालु
मां दुर्गा की प्रतिमा के विसर्जन और विदाई के इन पलों में श्रद्धालुओं की आंखें नम थीं, लेकिन साथ ही अगले साल मां के फिर से आने की उम्मीद का भाव भी उनके चेहरों पर साफ झलक रहा था। महिलाओं ने मां दुर्गा से अपने परिवार, समाज और राज्य की खुशहाली की प्रार्थना की और इसी के साथ विजयादशमी का यह पावन पर्व संपन्न हुआ।
धर्मेन्द्र की रिपोर्ट