Maharani Kamsundari Devi :मिथिला की विरासत की अमर प्रहरी महारानी कामसुंदरी देवी, महारानी ने दान कर दी थी महलों से भी कीमती पुस्तकालय, पढ़िए दरभंगा राजघराने की दूरदर्शी सोच की कहानी
Maharani Kamsundari Devi :दरभंगा राज का वैभव भले ही अब सत्ता और रियासतों तक सीमित न हो, लेकिन उसकी रूह आज भी किताबों, पांडुलिपियों, चित्रों और सांस्कृतिक स्मृतियों में सांस लेती है।
Maharani Kamsundari Devi : दरभंगा की ऐतिहासिक धरती आज एक युग के अवसान की गवाह बनी, जब दरभंगा राजघराने की अंतिम महारानी कामसुंदरी देवी का अंतिम संस्कार मां श्यामा माई मंदिर परिसर में पूरे राजसी सम्मान और पारंपरिक विधि-विधान के साथ संपन्न हुआ। उनके पोते रत्नेश्वर सिंह ने मुखाग्नि दी। इस मौके पर सिर्फ एक शाही व्यक्तित्व का नहीं, बल्कि मिथिला की जीवित स्मृति का भी विदा होना महसूस किया गया।
लगभग 94 वर्ष की आयु में महारानी कामसुंदरी देवी ने इस संसार को अलविदा कहा। वे कुछ समय से अस्वस्थ चल रही थीं। दरभंगा राज का वैभव भले ही अब सत्ता और रियासतों तक सीमित न हो, लेकिन उसकी रूह आज भी किताबों, पांडुलिपियों, चित्रों और सांस्कृतिक स्मृतियों में सांस लेती है। इस धरोहर को समय की गर्द से बचाने का श्रेय अगर किसी एक नाम को जाता है, तो वह नाम महारानी कामसुंदरी देवी का है।
महारानी ने यह भली-भांति समझ लिया था कि यदि वक्त रहते पहल नहीं की गई, तो मिथिला की अनमोल विरासत बिखर जाएगी। इसी दूरदर्शी सोच के साथ उन्होंने वर्ष 1989 में ‘महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह कल्याणी फाउंडेशन’ की स्थापना की। यह कदम महज एक ट्रस्ट बनाना नहीं था, बल्कि इतिहास को आने वाली नस्लों तक सौंपने का संकल्प था। उन्होंने अपनी निजी संपत्ति, दुर्लभ पुस्तकें, संस्कृत पांडुलिपियां, चित्र, फोटोग्राफ, फिल्में और दस्तावेज फाउंडेशन को दान कर दिए।
कल्याणी फाउंडेशन आज दरभंगा राज की सांस्कृतिक धरोहर का मजबूत किला है। कल्याणी निवास में स्थित यह संस्था दुनिया भर के विद्वानों, शोधकर्ताओं और छात्रों के लिए एक अनमोल खजाना है। यहां 15 हजार से अधिक किताबें और पांडुलिपियां, 12 हजार से ज्यादा फोटोग्राफ, 18 दुर्लभ कोडक फिल्में, ग्रामोफोन रिकॉर्ड्स, 18वीं–19वीं सदी के आर्टिफैक्ट्स और ऐतिहासिक दस्तावेज सुरक्षित हैं। यह लाइब्रेरी मिथिला की भाषा, साहित्य और परंपरा की धड़कन है।
फाउंडेशन ने अब तक 30 से अधिक व्याख्यान श्रृंखलाएं और सांस्कृतिक आयोजन किए हैं, हजारों महत्वपूर्ण पुस्तकों का प्रकाशन हुआ है और सामाजिक-सांस्कृतिक चेतना को लगातार मजबूत किया गया है। कानूनी विवाद और संसाधनों की चुनौतियों के बावजूद यह संस्था आज भी मजबूती से खड़ी है और डिजिटलीकरण जैसे नए प्रोजेक्ट्स पर काम कर रही है।
महारानी कामसुंदरी देवी भले ही आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनका किया हुआ कार्य जीवित विरासत बनकर सामने खड़ा है। दरभंगा राज का इतिहास, मिथिला की पहचान और सांस्कृतिक अस्मिता सब कुछ उनकी दूरदृष्टि का साक्ष्य है। सियासत और सत्ता से परे, उन्होंने जो छोड़ा, वह एक ऐसी अमानत है जो आने वाली पीढ़ियों को अपनी जड़ों से जोड़े रखेगी।