गया जी में कभी लगता था पिंडदान पर जजिया कर, शहरचंद्र चौधरी की पहल से औरंगजेब ने किया था खत्म
गया जी में पिंडदान करने पर मुगल बादशाह औरंगजेब ने जजिया टैक्स लगाया था, हालांकि गयापाल पंडा समाज के विरोध करने और समाज के मुखिया शहरचन्द्र चौधरी की पहल पर औरंगजेब ने ही इसे खत्म भी किया था......
Gayaji : विश्व प्रसिद्ध मोक्ष नगरी गया जी में 17वीं शताब्दी (लगभग 1679 ई.) के दौरान मुगल शासक औरंगजेब के शासनकाल में पिंडदानियों और तीर्थयात्रियों पर जजिया कर लगा दिया गया था। गैर-मुस्लिमों पर लगाए गए इस धार्मिक कर के कारण गया जी आने वाले श्रद्धालुओं को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ता था। परिणामस्वरूप, देश-विदेश से आने वाले पिंडदानियों की संख्या में भारी गिरावट आ गई, जिससे तीर्थयात्रियों के दान-दक्षिणा पर निर्भर रहने वाले गयापाल पंडा समाज के सामने आजीविका का गंभीर संकट खड़ा हो गया।
शहरचंद्र चौधरी का दिल्ली दरबार की ओर प्रस्थान
पिंडदानियों के घटने और आजीविका प्रभावित होने की समस्या को लेकर गयापाल पंडा समाज ने कड़ा विरोध दर्ज कराया। पंडा समाज के मुखिया शहरचंद्र चौधरी ने स्थिति की गंभीरता को देखते हुए सीधे औरंगजेब के दिल्ली दरबार का रुख किया। उन्होंने शाही दरबार में उपस्थित होकर गया जी (विष्णु नगरी) की धार्मिक महत्ता, पितरों के मोक्ष की परंपरा और जजिया कर के कारण तीर्थ व्यवस्था पर पड़ रहे प्रतिकूल प्रभावों को अत्यंत तर्कसंगत एवं प्रभावी ढंग से रखा।
औरंगजेब ने वापस लिया कर, आलमगीरपुर की सौंपी जागीर
शहरचंद्र चौधरी के तर्कों और गया जी की पवित्रता से औरंगजेब इस कदर प्रभावित हुआ कि उसने तत्काल प्रभाव से पिंडदान पर से जजिया कर हटाने की घोषणा कर दी। इतना ही नहीं, उसने पंडा समाज के सम्मान और आवास के लिए 'आलमगीरपुर' की जागीर भी दान में सौंप दी। विष्णुपद प्रबंध कारिणी समिति के अध्यक्ष शंभू लाल विट्ठल के अनुसार, यही आलमगीरपुर आज 'अंदर गया' के नाम से जाना जाता है, जहाँ पंडा समाज के लोग सुरक्षित रूप से निवास करते हैं।
मुगल काल में भी अक्षुण्ण रहा गया जी धाम
मुगल काल के दौरान जहाँ देश भर में कई मंदिरों और देव प्रतिमाओं को नुकसान पहुँचाया गया, वहीं गया जी और विष्णुपद धाम पूरी तरह सुरक्षित एवं अक्षुण्ण रहे। पंडा समाज के मुखिया के शिष्टाचार और प्रभावशाली पक्ष के कारण औरंगजेब ने न केवल कर माफ किया, बल्कि जमीन भी दान में दी। चार फाटकों से घिरे 'अंदर गया' क्षेत्र में ग्रामीण इलाकों से आकर पंडा समाज के लोग पूरी तरह से बस गए, जो आज भी वहीं निवास करते हैं।
ब्रह्म कल्पित ब्राह्मण हैं गयापाल पंडा समाज
विष्णुपद प्रबंध कारिणी समिति के अध्यक्ष शंभू लाल विट्ठल ने गयापाल पंडा समाज की उत्पत्ति के बारे में बताया कि ब्राह्मण समाज में विभिन्न शाखाओं की तरह गयापाल पंडा भी एक विशिष्ट अंग हैं। इनकी उत्पत्ति स्वयं सृष्टि के रचयिता भगवान ब्रह्मा जी द्वारा की गई थी, जिसके कारण गयापाल पंडा समाज को 'ब्रह्म कल्पित ब्राह्मण' कहा जाता है। इतिहास की यह अनूठी घटना गया जी की पवित्रता और पंडा समाज के ऐतिहासिक योगदान को दर्शाती है।
मनोज की रिपोर्ट