18 साल की उम्र, फांसी का फंदा और ब्रिटिश साम्राज्य को चुनौती, मुजफ्फरपुर जेल में शहादत को सलाम, नम आंखों से याद किए गए अमर शहीद खुदीराम बोस

Bihar News:अमर शहीद खुदीराम बोस के शहादत दिवस पर 11 अगस्त 2026 की अलसुबह मुजफ्फरपुर की धरती एक बार फिर उस जांबाज क्रांतिकारी की शहादत की गवाह बनी।...

नम आंखों से याद किए गए अमर शहीद खुदीराम बोस- फोटो : reporter

Bihar News: 18 साल की उम्र… लेकिन हौसला पूरे साम्राज्य को चुनौती देने वाला। हाथ में गीता, दिल में मातृभूमि और जुबां पर आजादी का जज्बा अमर क्रांतिकारी खुदीराम बोस ने जिस उम्र में जिंदगी के सपने देखने शुरू किए थे, उसी उम्र में देश की आजादी के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए। अंग्रेजी हुकूमत के सामने झुकने के बजाय उन्होंने हंसते-हंसते फांसी का फंदा स्वीकार किया और शहादत की ऐसी अमिट इबारत लिख दी, जिसे हिंदुस्तान कभी भुला नहीं सकता।

अमर शहीद खुदीराम बोस के शहादत दिवस पर 11 अगस्त 2026 की अलसुबह मुजफ्फरपुर की धरती एक बार फिर उस जांबाज क्रांतिकारी की शहादत की गवाह बनी। प्रातः करीब 4:30 बजे मुजफ्फरपुर केंद्रीय कारा परिसर में प्रशासनिक एवं पुलिस अधिकारियों तथा बंगाल से पहुंचे खुदीराम बोस के परिजनों ने नम आंखों से अमर शहीद को श्रद्धा-सुमन अर्पित कर नमन किया।

श्रद्धांजलि कार्यक्रम में आयुक्त, तिरहुत प्रमंडल, पुलिस उपमहानिरीक्षक, तिरहुत प्रक्षेत्र, जिला पदाधिकारी, वरीय पुलिस अधीक्षक, अपर समाहर्त्ता (राजस्व), अनुमंडल पदाधिकारी पूर्वी, काराधीक्षक, उपाधीक्षक समेत अन्य काराकर्मी और जिले के वरीय पदाधिकारी मौजूद रहे। सभी ने उस सेल प्रकोष्ठ में जाकर श्रद्धांजलि अर्पित की, जहां खुदीराम बोस को संसीमित रखा गया था। इसके बाद फांसी स्थल, आखिरी रात वाले सेल और कारा परिसर स्थित उनकी प्रतिमा पर पुष्पांजलि अर्पित की गई।

बंगाल के मिदनापुर जिले में जन्मे खुदीराम बोस ने वर्ष 1905 में बंगाल विभाजन के बाद अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ क्रांतिकारी आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई। ब्रिटिश न्यायाधीश डगलश किंग्सफोर्ड की कथित बर्बरता से आक्रोशित होकर उन्होंने उसे निशाना बनाने का फैसला किया। 30 अप्रैल 1908 को किंग्सफोर्ड की बग्गी समझकर उस पर बम फेंका गया, लेकिन संयोग से किंग्सफोर्ड उस बग्गी में नहीं थे। घटना में दो महिलाओं की मृत्यु हो गई।

इसके बाद 1 मई 1908 को खुदीराम बोस गिरफ्तार कर लिए गए और मुजफ्फरपुर कारा में संसीमित किए गए। तीन माह से अधिक समय तक कारा में रहने के बाद 11 अगस्त 1908 को उन्हें फांसी दे दी गई। उस वक्त उनकी उम्र महज 18 वर्ष कुछ महीने थी।

खुदीराम की निडरता से अंग्रेजी शासन इस कदर भयभीत था कि इतनी कम उम्र के इस क्रांतिकारी को भी फांसी देने में उसने कोई रहम नहीं दिखाया। कहा जाता है कि वे हाथ में गीता लेकर बेहद निर्भीकता से फांसी के तख्ते की ओर बढ़े। उनकी शहादत ने बंगाल ही नहीं, बल्कि पूरे देश के युवाओं के भीतर आजादी की आग को और प्रचंड कर दिया।

उनकी लोकप्रियता का अंदाजा इसी से लगाया जाता है कि शहादत के बाद बंगाल के जुलाहों ने ऐसी धोती बुननी शुरू की, जिसकी किनारी पर खुदीराम लिखा होता था। नौजवान उस धोती को गर्व से पहनते और अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ संघर्ष में उतरते थे।

खुदीराम बोस केवल इतिहास के पन्नों में दर्ज एक नाम नहीं, बल्कि वह जज्बा हैं जो अन्याय के सामने सिर झुकाने से इनकार करता है। उनका अदम्य साहस, अटूट देशभक्ति और सर्वोच्च बलिदान आज भी हर भारतीय के लिए प्रेरणा का स्रोत है। मुजफ्फरपुर कारा का वह फांसी स्थल आज भी याद दिलाता है कि आजादी की कीमत चुकाने वालों में एक ऐसा नौजवान भी था, जिसने महज 18 साल की उम्र में अपने प्राण मातृभूमि के नाम कर दिए।

रिपोर्ट- मणिभूषण शर्मा