Bihar News : नालंदा का ‘फौजियों वाले गांव’, सकरौढ़ा और मोकरमपुर के हर घर में है देश का रखवाला, रग-रग में बसती है देशभक्ति

Bihar News : नालंदा के सकरौढ़ा और मोकरमपुर के हर घर में एक फौजी है. जहाँ लोगों के रग रग में देशभक्ति बसती है.........पढ़िए आगे

फौजियों का गाँव - फोटो : RAJ

NALANDA : जिले के नूरसराय प्रखंड के सकरौढ़ा और मोकरमपुर गांव आज पूरे इलाके के लिए प्रेरणा का स्रोत बन चुके हैं। यहां देशभक्ति सिर्फ एक भावना नहीं, बल्कि पीढ़ी दर पीढ़ी चलने वाली परंपरा है। यही कारण है कि इन गांवों के लगभग हर घर से कोई न कोई सदस्य सेना, अर्धसैनिक बल या पुलिस में सेवा दे रहा है। अनुशासन, मेहनत और देश सेवा के जुनून ने इन गांवों को ‘फौजियों का गांव’ की पहचान दिलाई है। मोकरमपुर गांव में कुल 65 घर हैं, जिनमें से 35 घरों के युवा या बुजुर्ग सेना और सुरक्षा बलों में कार्यरत हैं। वहीं, सकरौढ़ा गांव के करीब 600 घरों में से 100 से अधिक घरों के सदस्य एयरफोर्स, आर्मी, बिहार पुलिस, बीएसएफ और सीआईएसएफ में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। यह आंकड़ा अपने आप में इन गांवों की देशभक्ति की गहराई को दर्शाता है।

गांव का ‘दस्तूर फील्ड’ यहां के युवाओं के सपनों का केंद्र बन चुका है। हर सुबह यहां दर्जनों युवा अग्निवीर, टीए आर्मी और पुलिस भर्ती की तैयारी में जुटे रहते हैं। खास बात यह है कि रिटायर्ड फौजी ही युवाओं को ट्रेनिंग देते हैं। वे न सिर्फ दौड़-भाग और शारीरिक अभ्यास कराते हैं, बल्कि अनुशासन, समय-प्रबंधन और देश सेवा के मूल्यों का भी पाठ पढ़ाते हैं। ट्रेनिंग में शामिल होने के लिए युवाओं को फिजूलखर्ची और नशे से दूर रहने की शपथ लेनी होती है।

मोकरमपुर के ग्रामीण विपिन कुमार सिंह बताते हैं, “हमारे गांव की सबसे बड़ी पहचान देशभक्ति है। जब बच्चे फौजियों को वर्दी में घर आते देखते हैं, तो उनके अंदर भी देश सेवा का जुनून अपने आप पैदा हो जाता है।”वहीं, 2022 में रिटायर हुए आर्मी जवान शिवेंद्र कुमार सिंह कहते हैं, “हमारे दादा भी सीआरपीएफ में थे। यहां लगभग 95 फीसदी युवाओं का सपना फौज में जाना है। रिटायर होने के बाद हमलोग खुद युवाओं को ट्रेनिंग देकर उन्हें आगे बढ़ाने की कोशिश करते हैं।”

सकरौढ़ा गांव के 83 वर्षीय रिटायर्ड आर्मी कैप्टन कौशल किशोर प्रसाद (ललन सिंह) की कहानी आज भी युवाओं को प्रेरित करती है। वे बताते हैं, “1961 में मैंने सेना जॉइन की थी और 1965 व 1971 के युद्ध में हिस्सा लिया। उस समय जवानों की वर्दी देखकर ही मेरे अंदर देश सेवा का जुनून जागा था। आज मेरा बेटा भी कर्नल बनकर देश की सेवा कर रहा है।”इसी गांव के प्रमोद सिंह, जिन्होंने 22 साल 10 महीने तक सेना में सेवा दी, बताते हैं, “हमने सियाचिन जैसे दुर्गम इलाकों में भी ड्यूटी की है। पहले एक साथ कई युवाओं की भर्ती होती थी, और वही परंपरा आज भी जारी है।”

मोकरमपुर के अरविंद पांडे के अनुसार, “2017 के बाद से गांव के युवाओं में और अधिक जागरूकता आई है। हर साल 2 से 6 युवा फौज या अन्य सरकारी सेवाओं में चयनित हो रहे हैं, जो पूरे क्षेत्र के लिए मिसाल है।”सेना की तैयारी कर रहे युवा रघुवीर कुमार कहते हैं, “दस्तूर फील्ड हमारे लिए मंदिर जैसा है। यहां हम रोज अभ्यास करते हैं। गांव के बड़े हमें मार्गदर्शन देते हैं, जिससे हमारा आत्मविश्वास बढ़ता है। अब तक गांव से कई युवा अग्निवीर भी बन चुके हैं।”इन दोनों गांवों की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यहां देश सेवा सिर्फ नौकरी नहीं, बल्कि गर्व और परंपरा का विषय है। रिटायर्ड फौजियों का मार्गदर्शन, युवाओं की मेहनत और गांव का अनुशासित माहौल इसे पूरे जिले ही नहीं, बल्कि राज्य के लिए भी एक प्रेरणादायक मॉडल बनाता है।

राज की रिपोर्ट