Bihar News: आजादी के 79 साल बाद भी चचरी राज कायम, अंग्रेजों की निशानी बन रही मौत का पुल, सिस्टम बाखर होकर भी बेखबर

Bihar News: एक ओर दुनिया तरक्की की बुलंदियों को छूते हुए चांद तक पहुंच गई, वहीं औराई के लोग आज भी अपनी जान जोखिम में डालकर एक जर्जर ‘चचरी पुल’ पार करने को मजबूर हैं।

अंग्रेजों की निशानी बन रही मौत का पुल- फोटो : reporter

Bihar News: आजादी के 79 बरस गुजर जाने के बावजूद बिहार के मुजफ्फरपुर जिले का औराई प्रखंड अब तक विकास की बुनियादी राह पर पूरी तरह कदम नहीं रख पाया है। जहां एक ओर दुनिया तरक्की की बुलंदियों को छूते हुए चांद तक पहुंच गई, वहीं औराई के लोग आज भी अपनी जान जोखिम में डालकर एक जर्जर ‘चचरी पुल’ पार करने को मजबूर हैं। यह पुल अब सिर्फ एक रास्ता नहीं, बल्कि सिस्टम की नाकामी और जनप्रतिनिधियों की बेरुखी का जिंदा सबूत बन चुका है।

औराई प्रखंड के कोकिलवारा गांव में स्थित यह पुल अंग्रेजों के जमाने की आखिरी निशानी माना जाता है। हैरत की बात यह है कि इस ब्रिज पर पहले रेलवे ट्रैक बिछाया गया और उसके ऊपर लकड़ी-बांस से बनी चचरी रख दी गई, जिस पर आज भी लोग आवाजाही कर रहे हैं। यह नजारा किसी खतरे से कम नहीं, लेकिन मजबूरी ऐसी कि लोग रोज इसी रास्ते को अपनी किस्मत मानकर पार करते हैं।

यह मामला सिर्फ एक पुल का नहीं, बल्कि विकास के दावों की हकीकत का आईना है। यह पुल सीतामढ़ी और मुजफ्फरपुर को जोड़ने वाला एक अहम मार्ग है। एक तरफ उत्तर बिहार की अघोषित राजधानी कहा जाने वाला मुजफ्फरपुर, तो दूसरी ओर माता जानकी की जन्मभूमि के रूप में पहचान बना रहा सीतामढ़ी दोनों जिलों के बीच लाखों लोगों का रोजाना आवागमन इसी रास्ते से होता है।

इसके बावजूद, इतने महत्वपूर्ण मार्ग पर आज तक किसी ठोस पुल का निर्माण नहीं होना सियासी लापरवाही की बड़ी मिसाल बन चुका है। स्थानीय लोग अब इस हालात से इतने निराश हैं कि उन्होंने व्यंग्य में इस ‘चचरी पुल’ को ही “ग्लास ब्रिज” कहना शुरू कर दिया है। यह मजाक दरअसल उनके दर्द और सिस्टम के प्रति गुस्से का इज़हार है।

सवाल यह है कि आखिर कब तक लोग अपनी जान जोखिम में डालकर इस मौत के पुल से गुजरते रहेंगे? और कब तक सियासत सिर्फ वादों और दावों तक सीमित रहेगी?

रिपोर्ट- मणिभूषण शर्मा