Tej Pratap Yadav:तू हैं तो लगता है सब मिल गया है मुझे,... सियासत के शोर में तेजप्रताप का लालू के लिए छलका जज़्बात, राबड़ी के बड़े लाल का पिता के लिए उमड़ा मोहब्बत,सोशल मीडिया पर लिख दिया दिल की बात
Tej Pratap Yadav: बिहार की सियासत में जब भी भावनाओं का ज़िक्र होता है, राष्ट्रीय जनता दल के सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव और उनके बड़े बेटे तेज प्रताप यादव की कहानी खुद-ब-खुद ज़ुबान पर आ जाती है। ...
Tej Pratap Yadav: बिहार की सियासत में जब भी भावनाओं का ज़िक्र होता है, राष्ट्रीय जनता दल के सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव और उनके बड़े बेटे तेज प्रताप यादव की कहानी खुद-ब-खुद ज़ुबान पर आ जाती है। सत्ता, संगठन और परिवार के उलझे हुए ताने-बाने के बीच तेज प्रताप एक बार फिर पिता के प्रति अपने स्नेह और अकीदत को लेकर सुर्खियों में हैं। मकर संक्रांति के मौके पर आयोजित दही-चूड़ा भोज के बाद अब उनकी एक भावुक सोशल मीडिया पोस्ट ने राजनीति के गलियारों में नई चर्चा को जन्म दे दिया है।
करीब आठ महीने बाद दिल्ली में हुई पिता-पुत्र की मुलाकात तेज प्रताप के लिए किसी सियासी इत्तेफाक से ज़्यादा जज़्बाती लम्हा थी। उसी मुलाकात में उन्होंने लालू प्रसाद को दही-चूड़ा भोज का न्योता दिया। लालू यादव ने न सिर्फ इस आमंत्रण को कबूल किया, बल्कि सबसे पहले कार्यक्रम स्थल पर पहुंचकर लंबा वक्त भी गुज़ारा। जाते-जाते बेटे को दिया गया उनका आशीर्वाद तेज प्रताप के लिए किसी सियासी प्रमाण-पत्र से कम नहीं था।
हालांकि, इस आयोजन में लालू परिवार के अन्य बड़े चेहरे राबड़ी देवी, मीसा भारती और तेजस्वी यादव नज़र नहीं आए। इस गैर-मौजूदगी ने राजनीतिक विश्लेषकों को कयासों का मौका दिया। किसी ने इसे पारिवारिक दूरी से जोड़ा, तो किसी ने इसे सत्ता और संगठन के अंदर चल रही खामोश खींचतान का संकेत माना। मगर तेज प्रताप के लिए ये तमाम सियासी अटकलें बेमानी रहीं। उनका फोकस सिर्फ पिता के स्नेह और दुआ पर टिक गया।
कार्यक्रम के बाद तेज प्रताप ने X पर लिखा कि लंबे अरसे बाद पिता से मिलना उनके लिए किसी नेमत से कम नहीं है। अब एक बार फिर जनशक्ति जनता दल के X हैंडल से साझा की गई AI जनरेटेड तस्वीर को उन्होंने री-पोस्ट किया है। तस्वीर में लालू प्रसाद के साथ दिखते हुए भावुक पंक्तियां लिखी हैं—“तू है तो लगता है सब मिल गया है मुझे… तेरे अलावा दुनिया से और कुछ नहीं चाहिए मुझे।”
समर्थक इसे बेटे की मोहब्बत और वफादारी का इज़हार मान रहे हैं, जबकि सियासी जानकार इसे परिवार और राजनीति के जटिल रिश्तों की नई इबारत के तौर पर पढ़ रहे हैं। साफ है, तेज प्रताप यादव सियासत की सख्त ज़मीन पर भी जज़्बात की नरमी को ज़िंदा रखने से कभी गुरेज़ नहीं करते।