Bihar Bureaucracy: बिहार में संविदा का खेल, सेवा विस्तार या पसंदीदा अफसरों की सेटिंग?हो रही है लोकतंत्र के बड़े मंदिर में खेल की तैयारी!

Bihar Bureaucracy: बिहार की नौकरशाही और प्रशासनिक गलियारों में सेवा विस्तार,Extension और संविदा बहाली अब केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि पसंदीदा अफसरों को एडजस्ट करने का सबसे असरदार हथियार बन चुका है। ताजा मामला...

लोकतंत्र के बड़े मंदिर में एक्सटेंशन के खेल की तैयारी! - फोटो : social Media

Bihar Bureaucracy: बिहार की नौकरशाही और प्रशासनिक गलियारों में सेवा विस्तार,Extension और संविदा बहाली अब केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि पसंदीदा अफसरों को एडजस्ट करने का सबसे असरदार हथियार बन चुका है। सेवानिवृत्त हो रहे प्रभावशाली अधिकारियों को उनके पद पर बरकरार रखना या रिटायरमेंट के तुरंत बाद किसी बड़े पद से नवाजना, राज्य की शासन व्यवस्था में एक गहरी जड़ जमा चुका दस्तूर है।

पसंद का दायरा और वफादारी का इनाम

बिहार सरकार में कुछ गिने-चुने अधिकारियों की पैठ सत्ता के शीर्ष तक मानी जाती है। जब ये अफसर अपनी तय उम्र पूरी कर रिटायर होने की दहलीज़ पर पहुँचते हैं, तो सरकार अनुभवों की दुहाई देकर कभी विशेष मंज़ूरी तो कभी संविदा का रास्ता निकालकर इन्हें 6 महीने से 2 साल तक की मोहलत दे देती है। कई मामलों में तो सेवानिवृत्ति के अगले ही दिन मुख्य सलाहकार या किसी बड़े आयोग की कमान या उसी पद को सौंप दिया जाता है।

सचिवालय से लेकर पुलिस महकमे तक इसका असर साफ देखा जा सकता है। पूर्व मुख्य सचिव अंजनी कुमार सिंह और दीपक कुमार इसके सबसे नुमायां मिसाल हैं। वहीं पुलिस विभाग की बात करें तो पी.के. ठाकुर, एस.के. सिंघल और के.एस. द्विवेदी जैसे पूर्व डीजीपी को रिटायरमेंट के बाद सरकार द्वारा उपकृत किए जाने के मामले भी चर्चा में रहे हैं। गृह, वित्त और सड़क निर्माण जैसे मलाईदार विभागों में भी बार-बार मिलने वाले एक्सटेंशन का यह सिलसिला बदस्तूर जारी है।

विधानसभा सचिव का संभावित नया खेल

इसी कड़ी में एक ताज़ा और संभावित मामला बिहार विधानसभा के वर्तमान सचिव से जुड़ा सामने आ रहा है। सूत्रों के मुताबिक, वर्तमान सचिव 31 अगस्त को सेवानिवृत्त हो रहे हैं। चर्चा गर्म है कि 2 सितंबर को ही उन्हें संविदा के आधार पर दोबारा उसी पद पर बहाल कर लिया जाएगा और इसके लिए कैबिनेट की मंज़ूरी की तैयारी भी की जा रही है। यहीं नहीं सतिव महोदय अनुकंपा  के जरिए दाखिल हुए थे और आज सचिव के रसूखदार पद पर काबिज हैं। अब तो कथित तौर पर रिटायरमेंट के बाद भी संविदा  के बहाने दोबारा कुर्सी हथियाने की पुरजोर जुगत जारी है।ऐसे में यह सवाल उठना लाज़िमी है कि आखिर सरकार की ऐसी कौन सी मजबूरी है जो एक ही चेहरे पर बार-बार दांव लगाया जा रहा है?

कड़वी हकीकत बेहद चिंताजनक

लोकतंत्र के जिस पवित्र ढांचे को हम व्यवस्था का स्तंभ मानते हैं, वहां की यह कड़वी हकीकत बेहद चिंताजनक है। जो निजाम प्रशासनिक पारदर्शिता और न्याय का दावा करता है, वहीं काबिलियत और नियम-कायदों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं।जिस शख्स की बहाली लेवल-1 यानी महज चपरासी के ओहदे पर हुई थी, वह अपनी रसूख और गहरी पैठ के बल पर प्रोन्नति पाते-पाते लेवल-12 यानी उपसचिव  के ऊंचे मुकाम तक पहुंच चुका है। बिहार लोक सेवा आयोग से सीधे चयनित होकर आने वाले  काबिल अफसर आज उसी पूर्व-चपरासी के मातहत काम करने को मजबूर हैं।

 रिटायर्ड अफसरों की बेहिसाब जायदाद और संपत्तियों की जांच क्यों नहीं?

सवाल है क्या सरकार ने इन संविदा पर टिके रिटायर्ड अफसरों की बेहिसाब जायदाद और संपत्तियों की कभी निष्पक्ष जांच कराई है?क्या बिहार के पूरे प्रशासनिक महकमे में नए और योग्य अफसरों का ऐसा अकाल पड़ गया है कि इन्हीं पुराने चेहरों पर निर्भर रहना मजबूरी बन चुका है?यह पूरी व्यवस्था पर एक बड़ा सवालिया निशान है। आखिर इस पूरे स्याह तंत्र की जवाबदेही किसकी होगी?

प्रशासनिक ढांचे पर नकारात्मक प्रभाव

इस एक्सटेंशन संस्कृति के कारण बिहार के प्रशासनिक ढांचे को गहरी चोट पहुँच रही है। जब शीर्ष पद पर बैठे अफसर को सेवा विस्तार मिलता है, तो पदोन्नति की कतार में खड़े योग्य और जूनियर अधिकारियों का रास्ता पूरी तरह बंद हो जाता है, जिससे नौकरशाही में अंदरूनी असंतोष और गुटबाज़ी पनपती है। वर्षों तक एक ही ढर्रे पर काम करने वाले अधिकारियों के कारण प्रशासनिक सुधार और नई नीतियों में नवाचार थम सा जाता है।

सरकार की मजबूरी या नीयत पर सवाल?

अदालतों ने भी कई बार नियमों को ताक पर रखकर दिए जाने वाले मनमाने एक्सटेंशन पर सरकार को फटकार लगाई है। बड़ा सवाल यह है कि क्या बिहार कैडर में योग्य और सक्षम अधिकारियों का अकाल पड़ गया है? या फिर राजनीतिक सहूलियत और वफादार तंत्र को बनाए रखने के लिए यह "एक्सटेंशन का खेल" जानबूझकर खेला जा रहा है?